July 20, 2024 |

BREAKING NEWS

- Advertisement -

World Health Day: घाघ-भड्डरी की कहावतों में हैं स्वस्थ रहने के संदेश

Sachchi Baten

घाघ की कहावतें खेती ही नहीं, स्वस्थ रहने की भी देती हैं सीख

 

चैते गुड़ बैसाखे तेल, जेठ मेें पंथ आषाढ़ में बेल।
सावन साग न भादों दही, क्वार दूध न कातिक मही।
मगह न जारा पूष घना, माघै मिश्री फागुन चना।
घाघ! कहते हैं, चैत (मार्च-अप्रेल) में गुड़, वैशाख (अप्रैल-मई) में तेल, जेठ (मई-जून) में यात्रा, आषाढ़ (जून-जुलाई) में बेल, सावन (जुलाई-अगस्त) में हरे साग, भादों (अगस्त-सितम्बर) में दही, क्वार (सितम्बर-अक्तूबर) में दूध, कार्तिक (अक्तूबर-नवम्बर) में मट्ठा, अगहन (नवम्बर-दिसम्बर) में जीरा, पूस (दिसम्बर-जनवरी) में धनियां, माघ (जनवरी-फरवरी) में मिश्री, फागुन (फरवरी-मार्च) में चने खाना हानिप्रद होता है।

जाको मारा चाहिए बिन मारे बिन घाव।
वाको  यही बताइये घुॅँइया  पूरी  खाव।।
घाघ! कहते हैं, यदि किसी से शत्रुता हो तो उसे अरबी की सब्जी व पूड़ी खाने की सलाह दो। इसके लगातार सेवन से उसे कब्ज की बीमारी हो जायेगी और वह शीघ्र ही मरने योग्य हो जायेगा।

पहिले जागै पहिले सौवे, जो वह सोचे वही होवै।
घाघ! कहते हैं, रात्रि मे जल्दी सोने से और प्रातःकाल जल्दी उठने से बुध्दि तीव्र होती है। यानि विचार शक्ति बढ़ जाती हैै।

प्रातःकाल खटिया से उठि के पिये तुरन्ते पानी।
वाके घर मा वैद ना आवे बात घाघ के  जानी।।
भड्डरी! लिखते हैं, प्रातः काल उठते ही, जल पीकर शौच जाने वाले व्यक्ति का स्वास्थ्य ठीक रहता है, उसे डाक्टर के पास जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

सावन हरैं भादों चीता, क्वार मास गुड़ खाहू मीता।
कातिक मूली अगहन तेल, पूस में करे दूध सो मेल
माघ मास घी खिचरी खाय, फागुन उठि के प्रातः नहाय।
चैत मास में नीम सेवती, बैसाखहि में खाय बसमती।
जैठ मास जो दिन में सोवे, ताको जुर अषाढ़ में रोवे
भड्डरी! लिखते हैं, सावन में हरै का सेवन, भाद्रपद में चीता का सेवन, क्वार में गुड़, कार्तिक मास में मूली, अगहन में तेल, पूस में दूध, माघ में खिचड़ी, फाल्गुन में प्रातःकाल स्नान, चैत में नीम, वैशाख में चावल खाने और जेठ के महीने में दोपहर में सोने से स्वास्थ्य उत्तम रहता है, उसे ज्वर नहीं आता।

आँखों में त्रिफला, दांतों में नोन,
भूखा राखै, चौथा कोन !!
र्थात—-त्रिफला, जो कि नेत्रों हेतु ज्योतिवर्द्धक एवं उनकी अन्य विभिन्न प्रकार के रोगों से बचाव हेतु रामबाण औषधी मानी जाती है। जो व्यक्ति त्रिफला के जल से आँखों का प्रक्षालन करता है, नमक से दाँत साफ करता है और सप्ताह में एक बार उपवास रखता है तो इन तीनों विधियों के अतिरिक्त उसे अन्य चौथा कार्य करने की कोई आवश्यकता ही नहीं है। सिर्फ इन तीन उपायों से ही वो अपने पूरे शरीर को निरोग रख सकता है।
मोटी दतुअन जो करै,
भूनी हर्र चबाय;
दूध-बयारी जो करै,
उन घर वैद न जाय्!!
नीम, कीकर इत्यादि कि मोटी लकड़ी (दातुन) को चबाकर करने से दाँत मजबूत होते हैं, भूनी हुई हर्र (हरड) के सेवन से पाचनतन्त्र मजबूत होता है और कच्चे दूध से नेत्र प्रक्षालन (नेत्रों को धोना) करने से नेत्रों की ज्योति बढती है। जो व्यक्ति इन तीन कार्यों को करता है, उसे फिर किसी चिकित्सक की कोई आवश्यकता ही नहीं रहती।
प्रात:काल करै अस्नाना,
रोग-दोष एकौ नई आना !
जो प्रात:काल नित्य कर्म से निवृत होकर स्नान कर लेते हैं, वे सदैव निरोग रहते हैं।
खाय कै मूतै, सूतै बाउं,
काय कौं वैद बसाबै गाउं !
भोजन करके के पश्चात जो मूत्र-त्याग करते हैं और बायीं करवट लेकर सोते हैं, उनको यह चिन्ता नहीं रहती कि उनके गाँव में वैद्य/डाक्टर रहता है या नहीं।
सावन ब्यारो जब-तब कीजे,
भादौं बाकौ नाम न लीजे;
क्वारं मास के दो पखवारे
जतन-जतन से काटौ प्यारे !!
श्रावण मास में रात्रि का भोजन कभी-कभी ही करना चाहिए, भाद्रपद में रात्रि का भोजन करना ही नहीं चाहिए, आश्विन मास के दोनों ही पक्ष सतर्कतापूर्वक व्यतीत करने चाहिए अन्यथा अस्वस्थ हो जाने की आशंका हो ही जाती है।
क्वार करेला, चेतै गुड़,
भादौं में जो मूली खाय;
पैसा  खोवै गांठ का
रोग-झकोरा खाय !
अश्विन मास में जो करेला, चैत्र मास में गुड़ और भाद्रपद मास में मूली का सेवन करते हैं, वें गाँठ का पैसा गंवाकर उससे रोग ही अपने पास में बुलाते हैं।
कातिक-मास, दिवाली जलाय;
जै बार चाभै,  तै बार खाय !
कार्तिक मास में दीपावली की पूजा करने के पश्चात ऎसी ऋतु आ जाती है कि भोजन का परिपाक भली प्रकार से होने लगता है, उन दिनों इच्छानुसार भोजन जितनी बार चाहें कर लिया करें। सब खाया-पिया अच्छी तरह से शरीर को लगेगा और चेहरे पर कांति रहेगी।


Sachchi Baten

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

Leave A Reply

Your email address will not be published.