July 23, 2024 |

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बालासोर रेल हादसे का मुजरिम कौन ? पढ़िए वरिष्ठ पत्रकार राजीव कुमार ओझा का आर्टिकल

Sachchi Baten

मिर्जापुर जनपद के अहरौरा रोड रेलवे स्टेशन के पास भी 2002 में हुई थी एक ट्रेन दुर्घटना

जवाबदेही से बचने के लिए इसके रिकॉर्ड को ही रेलवे ने नष्ट कर दिया

ओडिसा के बालासोर रेल हादसे मे पलटी ट्रेन की बोगी के नीचे से नमूदार होते देश के रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव का एक फोटो सेशन संभवतया यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है की जमीन से जुड़ा रेल मंत्री दुर्घटना स्थल पर पहंचा ही नहीं, दुर्घटना ग्रस्त बोगी के नीचे घुस कर उसने जांच भी की। यह वही रेल मंत्री है जिसने दावा किया था कि देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व मे ऐसा स्वदेशी सुरक्षा कवच तैयार किया गया है जो किन्ही कारणों से आमने सामने आई दो रेल गाड़ियों के सारे ब्रेक जाम कर देगा। इस स्वदेशी रक्षा कवच का सेंसर द्रूतगामी ट्रेन के ट्रैक पर कोई अवरोध भांप लेगा और उसके सारे ब्रेक जाम कर देगा और रेल दुर्घटना टाल देगा।

सच्ची बातेंं. बालासोर रेल हादसे की दिल दहला देने वाली तस्वीर।

रेलमंत्री से यह पूछा जाना चाहिए कि तीन तीन गाड़ियां उलट पलट गई,तीन सौ से ज्यादा रेल यात्री अपने गंतव्य की जगह यमलोक पहुंचा दिए गए, सैंकड़ों यात्री जिंदगी और मौत के बीच अस्पतालों में क्यों पड़े हैं? आत्म निर्भर भारत के शोर शराबे के बीच जिस स्वदेशी सुरक्षा कवच की लांचिंग की गई थी वह सुरक्षा कवच इन गाड़ियों मे क्यों नहीं था?

फिलहाल इस भयावह रेल हादसे के लिए सिग्नल प्रणाली के माथे ठीकरा फोड़ने की कोशिश की जा रही है।यह कहा जा रहा है कि अचानक कोरोमंडल एक्सप्रेस का ग्रीन सिग्नल चेंज हो गया और यह द्रूतगामी ट्रेन लूप लाईन मे खड़ी मालगाड़ी से जा भिड़ी और इसके छितराए कोच की चपेट मे आकर यशवंतपुर हावड़ा सुपर फास्ट एक्सप्रेस भी दुर्घटना की शिकार हो गई।यह बात गले से नीचे नहीं उतरती कि मेन लाइन से द्रूत गति से जा रही ट्रेन अचानक सिग्नल चेंज होने से लूप लाइन मे घुस जाएगी।

यदि सिग्नल चेंज होने को इस दुर्घटना की वजह बताया जा रहा है तब होना तो यह चाहिए था कि कोरोमंडल का पायलट सिग्नल ओवरशूट करता और ब्रेक लगाकर ट्रेन रोकता, वाकी टाकी या मोबाइल सीयूजी से स्टेशन को सूचित करता और वहां से अग्रिम आदेश की प्रतीक्षा करता। जानकार बताते हैं कि सिर्फ सिग्नल चेंज हो जाने से मेन लाइन की गाड़ी लूप लाइन मे नहीं घुस सकती है।

मैं यह बात बहुत जिम्मेदारी के साथ कह सकता हूं कि रेलवे की नौकरशाही रेल हादसों के बाद फंदा लेकर उसके नाप की गर्दन तलाशती है और किसी निरीह रेल कर्मी के गर्दन मे फंदा डालकर उसे टांग देती है,उसे चार्जशीट थमाती है और जांच की नौटंकी शुरू करती है। यह अंधेरगर्दी रेलवे के नीति निर्धारकों के पाप छिपाने के लिए की जाती है ताकि जबाबदेही का फंदा उनकी गर्दन न नाप दे।

उड़ीसा के बालासोर रेल दुर्घटना का सच सामने आएगा, कहना मुश्किल है। यहां अक्टूबर 2002 मे उत्तर मध्य रेलवे इलाहाबाद के अहरौरा रोड रेलवे स्टेशन पर हुई एक भीषण रेल दुर्घटना को उद्धृत करना प्रासंगिक है।

इस दुर्घटना की एक खोजी पत्रकार की तरह मैंने सघन पड़ताल की थी। उत्तर मध्य रेलवे इलाहाबाद के अहरौरा रोड स्टेशन पर 4 अक्टूबर 2002 को डाउन लाइन से गुजर रही गेहूं लदी गुड्स ट्रेन बीडीसी अप लाइन से गुजर रही कोयला लदी पानीपत गुड्स ट्रेन पर पलट गई थी । दोनो‌ं ट्रेन के इंजन और वैगन गड्ड मड्ड हो गए थे। दुर्घटना की भयावहता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि हावड़ा दिल्ली के इस अति व्यस्त रेल रूट पर तकरीबन 58 घंटे अप और डाउन ट्रैक पर रेल परिचालन ठप्प रहा था और अनुमानित क्षति तकरीबन 100 करोड़ की हुई थी। एक स्थानीय नागरिक और अप पानीपत गुड्स ट्रेन के पायलट की दर्दनाक मौत हुई थी। गौर तलब है कि कुछ ही मिनट पहले अप ट्रैक से एक मेल एक्सप्रेस पैसेंजर ट्रेन गुजरी थी,यदि डाउन बीडीसी इस मेल एक्सप्रेस ट्रेन पर पलटी होती तब हादसा बालासोर जैसा हुआ होता।

यह दुर्घटना अपने डिवीजन से ज्यादा ट्रेन चलाने की होड़ मे जानबूझकर कराई गई थी। इसके ठोस दस्तावेजी सबूत आज भी मेरे पास मौजूद हैं। दस्तावेजी सबूत चीख चीख कर कहते हैं कि यह दुर्घटना उत्तर मध्य रेलवे इलाहाबाद के आला अफसरानों ने जानबूझकर कराई थी। यह दुर्घटना आला अफसरानों के दबाव मे रेल संरक्षा से हुए आपराधिक खिलवाड़ ने कराई थी।

कानपुर के जूही बी केबिन के यार्ड मास्टर ने परिचालन विभाग को 4 अक्टूबर 2002 की रात 8:15 बजे भेजे गए मेमो मे कहा था ” गाड़ी संख्या डाउन बीडीसी लाइन नंबर 15 में 8:05 पर आई है। इसका ओपीआरएस नंबर 0516174है। जो कि एन एच द्वारा दिनांक 29.9.2002 को इशु किया गया है। यह गाड़ी टीआरआर से 30.9.2002 को लोड होकर आ रही है। इसका ब्रेकवान प्लेन बियरिंग है तथा यह गाड़ी 800 किमी से अधिक चल चुकी है। इसका गहन तकनीकी परीक्षण ड्यू है। इसका गहन तकनीकी परीक्षण जीएमसी कराए।”

रेल संरक्षा और रेल यात्रियों की जान-माल से आपराधिक खिलवाड़ का जीवंत दस्तावेज है जूही बी केबिन के यार्ड मास्टर का यह मेमो। होना तो यह चाहिए था कि डाउन बीडीसी के गुड्स लोड मे मानक के विपरीत लगा गार्ड ब्रेकवान हटाकर मानक के अनुसार गार्ड ब्रेकवान लगता और गहन तकनीकी परीक्षण के बाद टीएक्सआर द्वारा फिट टू रन सर्टिफिकेट मिलने के बाद उसे गंतव्य की ओर रवाना किया जाता। इसके उलट हुआ यह कि बिना गार्ड ब्रेकवान बदले, बिना गहन तकनीकी परीक्षण कराए इस गाड़ी को चला दिया गया, ताकि उत्तर मध्य रेलवे इलाहाबाद के खाते मे एक और मालगाड़ी चलाने का रिकार्ड दर्ज हो जाए।

रेल संरक्षा से की गई यह आपराधिक लापरवाही सैंकड़ों यात्रियों की जान ले लेती यदि डाउन बीडीसी चंद मिनट पहले अप ट्रैक से गुजरी द्रूतगामी मेल एक्सप्रेस पैसेंजर गाड़ी पर पलटी होती। इस एक्सप्रेस ट्रेन के यात्री सौभाग्यशाली थे, वह बच गए लेकिन रेल अधिकारियों की आपराधिक लापरवाही से अहरौरा रोड स्टेशन पर यह भीषण रेल दुर्घटना हुई। आला अफसरानों ने जानबूझकर यह भीषण रेल दुर्घटना कराई। इसका जीवंत दस्तावेजी सबूत इस रेल दुर्घटना की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट भी है। जांच रिपोर्ट के पैरा पांच मे स्पष्ट उल्लेख है –” This train has given last intensive examination at NH ,SDAH/E.R. on 29.9.02 vide oprs no.0516174 and was running from TRR to SRP without any examination in Dli Div, as well not given at Gmc though memo was given.”
इन ठोस दस्तावेजी सबूतों के बावजूद अहरौरा रोड रेलवे स्टेशन पर हुई भीषण रेल दुर्घटना मामले में रेलवे की नौकरशाही का बाल बांका न हुआ।  आज‌‌ तक जबाबदेही तय नहीं हो सकी।

मैने इस प्रकरण की जानकारी ठोस दस्तावेजी सबूतों के साथ तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह एवं राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल को देकर रेल अधिकारियों द्वारा जानबूझकर कराई गई इस भीषण रेल दुर्घटना की जबाबदेही तय करने का निवेदन किया था।

मेरे ध्यानाकर्षण पर तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह एवं राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने दस्तावेजी सबूतों के साथ प्रेषित मेरा पत्र रेल मंत्रालय को भेजकर कार्यवाही करने का आदेश पारित किया। कार्यवाही न हुई तो मैने प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को रिमाइंडर भेजा।

रेल मंत्रालय को प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति ने रिमाइंडर भेजा, लेकिन न तो जबाबदेही तय हुई न रेल संरक्षा से आपराधिक खिलवाड़ करने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई हुई। मैने आरटीआइ भेज कर प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के पत्र और रिमाइंडर पर हुई कार्रवाई की जानकारी मांगी,तब जबाब मिला कि अहरौरा रेल दुर्घटना की फाईल नष्ट कर दी गई है।

मेरी यह रिपोर्ट दैनिक पंजाब केसरी में प्रमुखता से प्रकाशित हुई और पूर्वांचल संदेश के प्रवेशांक में (जिसका विमोचन महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ वाराणसी में पूर्वांचल प्रेस क्लब उत्तर प्रदेश के मीडिया सेमिनार मे तत्कालीन सूचना प्रसारण एवं संसदीय कार्यमंत्री श्री प्रिय रंजन दास मुंशी जी ने किया था ) प्रकाशित हुई थी।

रेल अधिकारियों द्वारा जानबूझकर कराई गई इस भीषण रेल दुर्घटना के दस्तावेजी सबूतों के साथ मैं 2002-2019 के कालखंड के रेलमंत्रियों को लिखता रहा, लेकिन जबाबदेही तय न हुई।

उक्त प्रसंग के आलोक मे इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि रेल हादसों के इतिहास का यह सबसे बड़ा हादसा आपराधिक लापरवाही का नतीजा नहीं हो सकता। रेल दुर्घटना के अतीत पर नजर डालें तब होता यही रहा है कि हादसे कुछ दिनों तक मीडिया की सुर्खियों मे रहते हैं, जनाक्रोश को शांत करने के लिए मृतकों घायलों के लिए मुआवजे की घोषणा होती है, दोषी बख्शे नहीं जाएंगे की रस्मी बयानबाजी होती है और हालात फिर बैतलवा डाल पर का होता है।

यदि रेल दुर्घटनाओं की जबाबदेही तय करने का काम चेयरमैन रेलवे बोर्ड से शुरू होकर नीचे तक हो, तब काफी हद तक रेल संरक्षा से आपराधिक खिलवाड़ पर अंकुश लगेगा और दुर्घटनाओं का सच सामने आएगा। होता यह है कि रेल हादसों के असली गुनहगार की गर्दन बची रहती है और आला अफसरान फंदा लेकर उसकी नाप की गर्दन तलाशते हैं।

इस भयावह हादसे के बाद रेलवे के प्रवक्ता अमिताभ शर्मा का यह कबूलनामा कि इस रूट पर ट्रेनों की टक्कर रोकने वाला स्वदेशी कवच उपलब्ध नहीं था, इस हादसे के लिए रेल मंत्रालय की जबाबदेही की मांग करता है। इस रेल हादसे के बाद देश में छोटे कद और हिमालय सी दृढ़ता वाले लालबहादुर शास्त्री की चर्चा हर जुबान पर है। 1956 के पंडित जवाहरलाल नेहरू मंत्रिमंडल मे शास्त्री जी रेल मंत्री थे। उनके कार्यकाल मे हुई एक रेल दुर्घटना मे 142 यात्रियों की मौत हुई थी। शास्त्री जी ने तत्काल इस्तीफा दिया और नेहरू जी से निवेदन किया कि इस्तीफा स्वीकार करें, ताकि आने वाले कल के रेल मंत्रियों को यह इस्तीफा जिम्मेदारी का एहसास कराए। नैतिकता की उम्मीद इवेंट मैनेजमेंट के इस कालखंड मे न तो रेलमंत्री अश्विनी वैष्णव से की जा सकती है न ही वंदेभारत ट्रेन को हरी झंडी दिखाकर श्रेय लूटने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से की जा सकती है।

-राजीव कुमार ओझा (लेखक चुनार मिर्जापुर के निवासी हैं तथा वरिष्ठ पत्रकार हैं। इनके द्वारा लिखे गए आर्टिकल देश के प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं। 

नोट- ये लेखक के अपने विचार हैं।


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