July 19, 2024 |

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सूप बोले तो बोले…भागवत, इन्द्रेश कुमार के बाद अब राजभर उवाच!

Sachchi Baten

मोदी-योगी को जनता ने वाकई नकार दिया?

-गठबंधन में रहने का पार्टी को नुकसान हुआ -राजभर

-31 जून को भाजपा-संघ क़ी समन्वय बैठक

-विश्व क़ी सबसे बड़ी पार्टी में मची है भारी उथलपुथल

हरिमोहन विश्वकर्मा, लखनऊ। मोहन भागवत, इन्द्रेश कुमार जैसे बड़े संघी नेताओं के बाद अब एनडीए गठबंधन के अहम हिस्सेदार ओमप्रकाश राजभर की भी जुबां खुली है। राजभर के बेटे अरविन्द राजभर पूर्वांचल की सीट से लोकसभा चुनाव हार गए हैं। इसी हार की समीक्षा बैठक करते समय राजभर ने मोदी -योगी के बारे में वह कह दिया जिसकी उम्मीद नहीं करनी चाहिए थी।

राजभर ने कहा कि जनता ने मोदी योगी को नकार दिया है और उनकी पार्टी को गठबंधन में रहने का नुकसान ही हुआ है। राजभर पहले भाजपा में ही थे, फिर वे उप्र विधानसभा चुनाव 2022 के पहले समाजवादी पार्टी में चले गए। ज़ब 2022 विधानसभा चुनाव में सपा के साथ उनकी दाल नहीं गली तो वापस भाजपा में आ गए।

भाजपा ने उन्हें मंत्री बनाने के लिए लम्बा इंतजार भी कराया लेकिन राजभर डटे रहे। पर अब बेटे के लोकसभा चुनाव हारने के बाद उनका सब्र टूटता दिखाई दे रहा है। उधर महाराष्ट्र में भी संघ और भाजपा शिंदे शिवसेना+भाजपा और अजित पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी सरकार से नाराज नज़र आ रही है और इन संगठनों ने अपनी ही सरकार के खिलाफ आंदोलन तक की चेतावनी दे डाली है। कारण, महाराष्ट्र सरकार द्वारा राज्य वक़्फ़ बोर्ड को दिया गया 10 करोड़ का फंड है जिससे वक़्फ़ के कामकाज को डिजिटल किया जाना है।

वास्तव में अल्पमत की मोदी सरकार एनडीए की बैसाखी के सहारे सत्ता में जरूर आ गई है लेकिन जैसे कि मैंने अपने पिछले लेखों में कहा था कि उसे कदम -कदम पर अग्निपरीक्षा के दौर से गुजरना होगा, वैसा ही घटता भी दिखाई दे रहा है। सत्ता पाने के बाद भाजपा के बेहद अपने भी नरेंद्र मोदी और सरकार के खिलाफ़ मुखर हैं।

हालांकि संघ के नेता अब डैमेज कंट्रोल के मूड में हैं और इसके लिए 31 जून को भाजपा-संघ की समन्वय बैठक हो रही है। शुक्रवार को भाजपा के खिलाफ मुखर होने वाले इन्द्रेश कुमार भी 24 घंटे के अंदर अपने उस बयान से पीछे हट गए हैं जिसमें उन्होंने सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा था कि अहंकार 240 में सिमट गया।

बहरहाल, जो कुछ भाजपा के अंदर-बाहर घट रहा है, काफी कुछ उसके लिए भाजपा की रणनीति जिम्मेदार है जिसके तहत भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने बीच चुनाव में संघ को एक सांस्कृतिक मोर्चा बताते हुए दावा किया था कि भाजपा अब अपने पैरों पर ख़डी पार्टी है, और उसे संघ के सहारे की जरूरत नहीं है। जेपी नड्ढा का यह दृष्टिकोण साफ़ साफ़ चुनाव के दौरान संगठन की गतिविधियों में भी देखने में आया ज़ब ज्यादातर जिलों में रणनीति और चुनाव संचालन के मामले में संघ को किनारे किया गया। यह देखते हुए संघ स्वयंसेवक भी घरों में बंद हो गए। ज्यादातर भाजपा प्रत्याशी ‘मोदी है तो मुमकिन है’, के नारे के चलते संघ, पार्टी कार्यकर्ताओं और मतदाताओं की उपेक्षा तक करते दिखे।

यह बात अब चुनाव बाद बनी समीक्षा बैठकों में भी सामने आ रही है। हारे हुए केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान और भाजपा विधायक संगीत सोम के मध्य घमासान चल रहा है और अब तक पार्टी के किसी नेता का दोनों नेताओं को दायरे में रहने जैसा न तो कोई निर्देश आया और न कोई बयान आया। कुल मिलाकर उप्र में पूरब से पश्चिम तक हाहाकार मचा है। आने वाले समय में जल्द ही जिलों, मंडलों और राष्ट्रीय अध्यक्ष तक के चुनाव आने हैं, जाहिर है संगठन के नेता निस्पृह बने रहने की मुद्रा में हैं।

विश्व का सबसे बड़ा संगठन मतदाताओं के एक छोटे से झटके मात्र से हलकान है। उधर इंडिया गठबंधन लगातार ऐसे बयान दे रहा है जैसे वह कभी भी एनडीए 3.0 सरकार गिराकर अपनी सरकार फॉर्म करने की स्थिति में हो। बहरहाल, भाजपा संगठन और सरकार के लिए परिस्थितियां विकट हैं।

ऐसे में भाजपा के चाणक्य अमित शाह और भरोसेमंद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की साख दांव पर है। यह तय है कि भाजपा की हार उप्र को छोड़ दें तो उतनी बड़ी नहीं है, जितना कि बखान किया जा रहा है। भाजपा को उड़ीसा और अरुणाचल जैसी दो नई विधानसभाएं मिली  हैं। मप्र, गुजरात, छत्तीसगढ़ जैसे कुछ राज्यों में उसने विपक्ष का सूपड़ा साफ़ किया है। हां, राजस्थान, कर्नाटक आदि में उसे झटका लगा है लेकिन आंध्र, तेलंगाना आदि में सफलता भी तो हासिल हुईं है।

भाजपा और उसके जिम्मेदारों को यह देखना है कि उसके कार्यकर्त्ताओं का हौसला न टूटे, संगठन और संघ के अतिरिक्त ऐसे हिंदूवादी संगठनों से समन्वय बना रहे जिसके कारण भाजपा सत्ता के शिखर तक पहुंची। इस लिहाज़ से 31 जून को होने वाली भाजपा-संघ क़ी समन्वय बैठक अहम है। भाजपा को अपने कथित अहंकार से निकलकर इस बैठक में भविष्य पर विचार करना चाहिए।


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