July 19, 2024 |

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नव संवत्सर का क्या नाम है और कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त कब?

Sachchi Baten

पिंगल नामक नव संवत्सर में लाभान्वित होने के सरलतम आडंबर-विहीन उपाय


★चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (9 अप्रैल ’24) से शुरू संवत्सर का आध्यात्मिक नाम पिंगल है।
★पिंगल का अर्थ पीला होता है।
★पीला रंग ज्ञान तथा आत्मिक ऊर्जा का होता है।
★इस संवत्सर में पीले रंग के वस्त्र के साथ खाद्य पदार्थों का सेवन समय के साथ तालमेल बनाएगा।
★पिंगल संवत्सर के देवता इंद्र होते हैं।
★इंद्र की श्रेष्ठ कृपा ज्ञान-वृद्धि होती है। भोग-वृद्धि की कृपा निचले दर्जे की कृपा होती है।
★यश-वृद्धि के लिए पंच ज्ञानेंद्रियों को उन्नत तथा श्रेष्ठ बनाना खुद के हाथ में है। किसी दूसरे के हाथ में नहीं।
★मांगलिक संकल्पों में सबसे पहले ‘स्वस्ति न इन्द्रों वृद्धश्रवाः…’ का उल्लेख पंच ज्ञानेंद्रियों के कुशल मंगल के लिए किया गया है।

9 अप्रैल ’24 से को नवरात्र कलश-स्थापना का शुभ-समय- अभिजीत मुहूर्त पूर्वाह्न (11.35 से मध्याह्न 12.25) है ।

पंच ज्ञानेंद्रियों (आंख, कान, नासिका, जिह्वा और त्वचा) के जरिए मन रूपी अतीन्द्रिय शक्ति को उन्नत स्वरूप दिया जाना श्रेष्ठ है।

★इसके लिए व्यक्तिगत लाभ के बजाय समूह यथा परिवार के अलावा रिश्तेदार, मित्र, आसपास के पीड़ित लोगों के लिए भी धाम में हित की प्रार्थना जरूर करनी चाहिए।
★अपने अपराधों को स्वीकार कर पुनः उन गलतियों को नहीं दोहराने का कड़ा संकल्प लेना चाहिए।
★किसी मंदिर में दर्शन के लिए जाने पर जल्दबाजी, रुतबे और पैसे के बल जल्दी दर्शन की कोशिश नहीं करनी चाहिए।
★यह मान कर प्रसन्न हों कि जैसे माँ देर तक सन्तान को अपनी आँखों के सामने देखना चाहती है वैसे मन्दिर के देवी-देवता भी जिन्हें पसन्द करते हैं उन्हें देर तक मन्दिर में रोकते हैं और नापसन्द की हालत में जल्दी दर्शन देकर भगा देते हैं ।
★मन्दिर हो या तीर्थधाम हो, वहां पता लगाने की कोशिश करनी चाहिए कि सच में अभाव के चलते कोई भूखा तो नहीं। कोई बच्चा चाह कर अभाव में शिक्षा से वंचित तो नहीं हो पा रहा है ? किसी एक की ही सही मदद करनी चाहिए।
★सिर्फ मूर्ति-दर्शन तक सीमित न रहना चाहिए, वरन सदाचरण पर कदम के लिए प्रयत्न करना चाहिए ।
★जो भी कन्या-महिला सामने दिखे उसे मातृ-शक्ति का रूप ही मानना चाहिए।
★घर में जीवित माता-पिता या बुजुर्ग सदस्य को भी मंदिर आदि के लिए साथ ले जाना चाहिए । यदि नहीं जा सकते तो उनका चरण-स्पर्श कर, उनकी सारी सुव्यवस्था सुनिश्चित करके ही आएं । उन्हें दुत्कार के आने पर दर्शन व्यर्थ है ।
★दर्शन-पूजन तक बिजनेस, पद, प्रतिष्ठा का सौदा कदापि नहीं करना चाहिए। भले कुछ न चढ़ाएं ।
★निर्मल मन तथा पवित्र जीवन की ही कामना करनी चाहिए ।
★’साई इतना दीजिए, जामे कुटुंब समाय–‘ आदि की भी झूठी भावना न करनी चाहिए। सिर्फ गलतियों का प्रायश्चित करना चाहिए।★मन्दिर में प्रसाद श्रद्धा-भाव एवं सामर्थ्य के अनुसार करना चाहिए । सेल्फ असेसमेंट (स्वयं की हैसियत) इस मामले में दीन-हीन और अकिंचन का नही करना चाहिए।
-सलिल पांडेय, मिर्जापुर


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