July 24, 2024 |

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प्रकृति से अलग अपने अस्तित्व की परिकल्पना नहीं कर सकते, पर्यावरण का जरा भी है ध्यान तो पढ़ें जरूर…

Sachchi Baten

पर्यावरण संरक्षण…

पर्यावरण संरक्षक को विशेष महत्व दिया गया है भारतीय चिंतनधारा में

डॉ. इंदुभूषण द्विवेदी
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प्राचीन भारतीय चिंतन धारा में पर्यावरण संरक्षक को विशेष महत्व प्रदान किया गया है। यहां पर इसे प्रकृति एवं सृष्टि दो रूपों में व्याख्यायित किया गया है। प्रकृति त्रिगुणात्मिका है तथा सृष्टि पंच-तत्वों से निर्मित है। इनमें तारत्मय स्थापित करना ही पारिस्थितिकीय संतुलन को बनाए रखना है।

सत्, रज तथा तम के साथ क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर का सामन्जस्य भारतीय मूल की मेधा की अपनी अलग विशेषता रही है तथा यह ज्ञान उसके तत्व चिंतन का ही परिणम था। भारतीय संस्कृति निश्चित रूप से प्राकृतिक अनुराग तथा प्राकृतिक संरक्षण की विधा है। यह प्रेम हमारी पुरानी संस्कृति में इस प्रकार समाहित हो गया कि हम प्रकृति से अलग अपने अस्तित्व की परिकल्पना ही नहीं कर सकते हैं। इस प्रकार हम यह धारणा व्यक्त कर सकते हैं कि बाह्य असंतुलन अपने अस्तित्व के लिए मानसिक असंतुलन पर आधारित होता है।

“पुमां पुमासं परिपातु विश्वत: – ऋग्वेद’। अर्थात मनुष्य, मनुष्य की सभी प्रकार से रक्षा करें। यही भारतीय चिंतन का मूल रहा है, जो वसुधैव कुटुम्बकम् एवं सर्वं विश्वं भवतयेकनीअम् की अवधारणा को दृढ़ करता है। प्रकृति के अद्भुत संतुलन को ही पर्यावरण कहा जाता है तथा यह हमारी सृष्टि का श्रेष्ठ जीवन तत्व है।

पर्यावरण शब्द परि-आवरण से व्युत्पन्न हुआ है, जिसका तात्पर्य है परित: आवृणोति इति पर्यावरणम्, अर्थात जो चतुर्दिक आवृत्त करता है, वह पर्यावरण है। पर्यावरण एवं प्राणी का संंबंध अन्योन्याश्रित है। यह वह परिवृत्ति है, जो मानव के दैनिक दिनचर्या एवं उसके क्रिया कलापों पर निरंतर प्रभाव डालता है।

वैदिक ऋषियों को मानव की शक्तियों एवं दुर्बलताओं का आभास था, इसीलिए उन्होंने वैदिक वांगमय में इस प्रकार की जीवन शैली की व्यवस्था की, जिससे पर्यावरण के अवयवों को संतुलित किया जा सके। यजुर्वेद के शांतिपाठ में पर्यावरण के इन्हीं अवयवों को संतुलित करने का उल्लेख प्राप्त होता है-
“द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षं शान्ति, पृथ्वीशान्तिराप:शान्तिरोषधय: शान्ति:।
वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा शान्तिर्बहम् शान्ति: सर्वशान्ति : शान्तिरेवशान्ति: सामाशान्तिररेधि।।’

आज नासा ने भी वेदों के आधुनिक विज्ञान का स्रोत स्वीकार कर लिया है। चारों वेदों में यज्ञ का अत्यंत महत्वपूर्ण वर्णन किया गया है। इसका मुख्य कारण यह है कि यज्ञ ही विधा है, जिसके द्वारा प्राकृतिक संतुलन बनाए रखा जा सकता है। यज्ञ के द्वारा पर्यावरण की सुरक्षा, वायुमंडल की पवित्रता, विविध रोगों का नाश, शारीरिक एवं मानसिक उन्नति तथा रोगों के निवारण के कारण दीर्घायुष्य की प्राप्ति होती है।

यज्ञ अथवा अग्निहोत्र वह विज्ञानी प्रक्रिया है, जिसके द्वारा वायुमंडल में आक्सीजन तथा कार्बन डाई आक्साइड का संतुलन बना रहता है। प्रकृति में एक चक्र की व्यवस्था है, जिसके अनुसार प्रत्येक पदार्थ अपने मूल स्थान पर पहुंचता है। इसी के आधार पर ऋतु चक्र, वर्ष चक्र, अहोरात्रचक्र, सौरचक्र, तथा चंद्रचक्र आदि परिवर्तित होते हैं। इस प्राकृतिक चक्र को ही परिभाषित शब्दावली में यज्ञ कहा गया है।

ऋग्वेद में कहा गया है कि यज्ञ के द्वारा धुलोक को प्रसन्न किया जाता है तथा धुलोक वर्षा के द्वारा पृथ्वी को तृप्त करता है। यज्ञ से मेघ व मेघ से वर्षा होती है। हालांकि वर्तमान में बहुत कुछ बदल गया है। बेमौसम बारिश, तेज धूप, समुद्र के तापमान में बढ़ोतरी, सूखा आदि गंभीर परिणाम देखने को मिल रहे हैं। यह पृथ्वी के साथ-साथ पर्यावरण व मानव जीवन के लिए खतरनाक है। आज कल हर कोई सुविधाजनक जीवन जीना चाहता है, लेकिन प्रकृति के जिस रूप को वह इस्तेमाल करता है, उसके बारे में वह जानने की कोशिश नहीं करता कि इससे पर्यावरण को कितना नुकसान होगा।

 

(लेखक केबीपीजी कॉलेज मीरजापुर में प्राचीन इतिहास, संस्कृति एवं

पुरातत्व विभाग में प्रोफेसर व विभागाध्यक्ष हैं।)


Sachchi Baten

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