July 24, 2024 |

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उप्र: आंतरिक कलह का शिकार हो रही समाजवादी पार्टी

Sachchi Baten

अंतिम वक़्त में ताश के पत्तों की तरह फेंटे जा रहे प्रत्याशी

-राजभर, जयंत, पल्लवी, स्वामी मौर्य, केशव जैसे साथी नेता छोड़ चुके हैं साथ

-रेवतीरमण जैसे खांटी समाजवादी नेता भी हताश होकर उतर चुके साईकिल से

-उपेक्षित और हताश महसूस कर रहे कार्यकर्त्ता व मुलायम क़े समय क़े साथी

बृजनन्दन राजू, लखनऊ। उप्र में सबसे बड़े विपक्षी दल और भाजपा क़े 75+ अभियान में सबसे बड़ा रोड़ा मानी जा रही समाजवादी पार्टी और इसके मुखिया अखिलेश यादव क़े अबूझ निर्णयों क़े चलते पार्टी भंवर में फंसती नजर आ रही है। समाजवादी पार्टी क़े अंदर अखिलेश क़े निर्णयो को लेकर अंतरद्वन्द भी साफ़ दिख रहा है।

पार्टी ने 2017 के विधानसभा चुनाव क़े मुकाबले 2022 क़े विधानसभा चुनाव में अपनी ताकत जरूर बढ़ाई, लेकिन लोकसभा चुनाव आते आते पार्टी के कई बड़े नेता व विधायक सपा का साथ छोड़ गये। पीडीए को मजबूत करने का दंभ भरने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य, राष्ट्रीय लोकदल क़े जयंत चौधरी, अपना दल कमेरावादी की पल्लवी पटेल जैसे दिग्गज नेताओं ने जहाँ सपा से अपना पिंड छुड़ा लिया, वहीं यही सपा के अन्य सहयोगी दल, जिनमें सुभासपा क़े ओमप्रकाश राजभर और महान दल क़े केशव मौर्य भी एक-एक कर सपा से किनारा कर गये। ऐसे कठिन दौर में सपा नेतृत्व के टिकट वितरण की प्रक्रिया ने आम पार्टी कार्यकर्ताओं को असमंजस में डाल दिया है।

इस बार टिकट अदला बदली के मामले में सपा ने बसपा को भी पीछे छोड़ दिया है। सपा के इतिहास में शायद यह पहला अवसर होगा जब इतने बड़े पैमाने पर सपा ने उम्मीदवारों के नाम घोषित करने के बाद टिकट बदला हो। इसे पार्टी की अंदरूनी कलह कहें यह मजबूरी, इसका खामियाजा सपा को लोकसभा चुनाव में उठाना पड़ सकता है। क्योंकि जिसका टिकट घोषित होने के बाद पार्टी ने बदला वह प्रत्याशी भले ही विरोध न करे लेकिन उसके सजातीय वोटर जरूर विरोध में वोट करेंगे।

इस बदले परिदृश्य में सपा लोकसभा चुनाव में भाजपा संग लड़ाई से बाहर होती दिखाई दे रही है। जिस तरह से सपा ने प्रथम व दूसरे चरण के प्रत्याशियों के टिकट नामांकन के अंतिम समय में काटे हैं उससे तो यही प्रतीत होता है कि बाकी चरणों में भी सपा कई लोकसभाओं के टिकट में फेरबदल अवश्य करेगी। सपा नेतृत्व के इस कदम से प्रदेश की अन्य सीटों के घोषित पार्टी प्रत्याशी संशय में हैं। इस वजह से वह ठीक से चुनाव प्रचार भी नहीं कर पा रहे हैं। उन्हें चिंता सता रही है कि कहीं अंतिम समय में पार्टी हमारा टिकट न काट दे। इसलिए वह क्षेत्र में जनसम्पर्क न कर लखनऊ का चक्कर लगा रहे हैं।

और तो और सपा के वरिष्ठ नेता शिवपाल यादव भी पुत्रमोह में स्वयं लोकसभा चुनाव न लड़कर बेटे आदित्य यादव को लड़ा रहे हैं। सपा के दोनों प्रमुख नेताओं अखिलेश व शिवपाल यादव के लोकसभा चुनाव न लड़ने से भी कार्यकर्ताओं में गलत संदेश जाना तय है। कभी सपा के नीति नियंता रहे आजम खाँ व अखिलेश यादव के बीच मनमुटाव भी खुलकर सामने आ गये है। मनमुटाव दूर करने के लिए अखिलेश यादव आजम खां से मिलने सीतापुर जेल जरूर गये लेकिन बात बनी नहीं।

जिस तरह आजम खां के दबाव में एसटी हसन का टिकट काटकर रुचि वीरा को प्रत्याशी बनाया गया इससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि सपा में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है।जहां उप्र में दूसरे चरण का नामांकन पूरा हो गया है और भाजपा ने धुंआधार प्रचार अभियान भी शुरू कर दिया है, वहीं सपा अभी टिकट वितरण में ही उलझी है। अखिलेश की ऐसी अबूझ नीतियों क़े कारण 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा व कांग्रेस के गठबंधन को जनता नकार चुकी है।

एटा, इटावा व मैनपुरी के आसपास के ही जिलों की ही अगर बात करें तो पूर्व मंत्री नरेन्द्र सिंह यादव, पूर्व मंत्री अवधपाल यादव, पूर्व सांसद देवेन्द्र सिंह यादव, एमएलसी आशु यादव व पूर्व विधायक शिशुपाल यादव समेत दर्जनभर नेता सपा का हाथ छोड़ चुके हैं। अखिलेश यादव जाति आधारित जनगणना का मुद्दा भी जोर शोर से उठाए थे, लेकिन उस पर वह अडिग नहीं रह पाये।

यही हाल पीडीए का भी है। स्वामी प्रसाद मौर्य, पल्लवी पटेल और चन्द्रशेखर ने पीडीए की हवा निकाल दी है। अखिलेश बात पीडीए की करते हैं लेकिन पीडीए की राजनीति करने वाले नेताओं ने भी उनसे दूरी बना ली। अयोध्या में सपा ने इस बार पीडीए फार्मूले के तहत पूर्व मंत्री अवधेश प्रसाद को टिकट दिया। लेकिन पूर्व सांसद मित्रसेन यादव के पुत्र आईपीएस अधिकारी रहे अरविन्द सेन यादव ने सीपीआई के टिकट से मैदान में आकर सपा प्रत्याशी की राह मुश्किल कर दी है। इससे यादव मतों में बिखराव होना तय है। ऐसे में यदि अवधेश प्रसाद का टिकट बदलते हैं तो एससी वोटर सपा से नाराज होंगे ही।

कमोबेश यही स्थिति प्रदेश की अन्य कई सीटों की है। पहले चरण के ही सात प्रत्याशियों के टिकट बदले जा चुके हैं। इसमें गौतमबुद्धनगर, मिश्रिख और मेरठ में तो अनेक बार परिवर्तन किये गये। पहली सूची में ही बदायूं से धर्मेन्द्र यादव को टिकट दिया गया था। फिर 20 फरवरी को धर्मेन्द्र यादव के स्थान पर शिवपाल यादव को मैदान में उतार दिया। मुरादाबाद में अंतिम समय में मौजूदा सांसद डॉ. एसटी हसन को मैदान में उतारा और उन्होंने अपना पर्चा भी दाखिल कर दिया। नामांकन के अंतिम दिन डॉ. एसटी हसन के बजाय रुचि वीरा को सिंंबल दे दिया गया।

मेरठ हापुड़ संसदीय क्षेत्र से सपा ने पहले अधिवक्ता भानु प्रताप सिंह को अपना प्रत्याशी घोषित किया। एक अप्रैल को उनका टिकट बदलकर सरधना से विधायक अतुल प्रधान को टिकट दे दिया। अतुल प्रधान ने जिस दिन नामांकन दाखिल किया उसी दिन रात में उनका टिकट काटे जाने की सूचना आ गयी। इसके बाद पार्टी ने पूर्व विधायक योगेश वर्मा की पत्नी सुनीता वर्मा को टिकट दे दिया।

इसी तरह गौतमबुद्धनगर में पहले डॉ. महेन्द्र नागर को प्रत्याशी घोषित किया गया। इसके बाद इस सीट पर राहुल अवाना को उम्मीदवार बनाया गया। बाद में पुन: डॉ. महेन्द्र नागर को प्रत्याशी घोषित किया गया। वहीं मिश्रिख में भी पहले रामपाल राजवंशी, फिर उनके बेटे मनोज कुमार राजवंशी और उसके बाद उनकी बहू संगीता राजवंशी को प्रत्याशी बनाया गया।

कमोबेश यही स्थिति बागपत में भी आई जहां पहले सपा के पूर्व जिलाध्यक्ष मनोज चौधरी को उतारा गया। नामांकन के अंतिम दिन टिकट बदलकर पूर्व विधायक अमरपाल शर्मा को दिया गया। इसी तरह बिजनौर में भी पूर्व सांसद यशवीर सिंह का टिकट काटकर दीपक सैनी को दिया गया। इसके अलावा कई अन्य सीटों पर भी प्रत्याशी बदलने की मांग को लेकर सपा कार्यकर्ता बगावत पर उतर आये हैं। आठ बार के विधायक व दो बार सांसद रहे कुंवर रेवती रमण सिंह भी सपा छोड़कर कांग्रेेस का हाथ थाम चुके हैं। कुल मिलाकर सपा नेतृत्व क़े इस रवैये क़े चलते पार्टी सांसत में नजर रही है।


Sachchi Baten

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