July 16, 2024 |

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यूपी की राजनीतिः रोटी जली क्यों, घोड़ा अड़ा क्यों और पान सड़ा क्यों?

Sachchi Baten

अड़ जाना अखिलेश की अक्लमंदी या अज्ञानता

स्वामी प्रसाद मौर्य, पल्लवी पटेल, सलीम इकबाल शेरवानी का सवाल समीचीन

 

राजेश पटेल

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पहले एक कहानी बुझाई जाती थी-रोटी जली क्यों, घोड़ा अड़ा क्यों, पान सड़ा क्यों। जवाब- फेरा नहीं था। गधा उदासा क्यों और ब्राह्मण प्यासा क्यों? एक ही जवाब है। लोटा नहीं था। इसका मतलब यह है कि घोड़ा का शरीर हाथ फेरना जरूरी होता है। तभी वह आपका कहना सही तरीके से मानता है। पान को भी सड़ने से बचाने के लिए प्रतिदिन फेरना पड़ता है। इसी तरह से गधा भी धूल-मिट्टी में जब तक जमकर लोट नहीं लेता, वह उदास ही रहता है। रही बार ब्राह्मण की तो पहले लोग मीलों पैदल सफर करते थे। पीने के पानी के लिए रास्ते में सड़क किनारे कुएं खुदे होते थे, कुछ के अवशेष तो अभी भी देखने को मिल जाते हैं। साथ में लोटा और रस्सी रखते थे। क्योंकि वह किसी अन्य का छुआ पानी पीते नहीं थे, इसलिए खुद के लोटा और रस्सी से कुआं से खुद पानी निकालकर पीते थे। जिस तरह से उपरोक्त तीनों सवालों का जवाब एक ही है। उसी तरह से लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा को रोकने की जो हवा बन रही थी, वह फुस्स होती जा रही है। इसके लिए जिम्मेदार सीधे तौर पर समाजवादी पार्टी है। क्योंकि वही इस प्रदेश में दूसरे नंबर की पार्टी है।

एक बात तो साफ है कि कांग्रेस 2024 को लक्ष्य मान ही नहीं रही है। देश में जो माहौल है, वह समझ चुकी है। कांग्रेस की सारी कवायद 2029 के लिए है। उत्तर प्रदेश में नंबर दो की पार्टी कही जाने वाली समाजवादी पार्टी किस दिशा में सोच रही है, उसके नेता ही जानें। पर, यह स्पष्ट है कि सपा की वजह से ही फिर केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार लगातार तीसरी बार बनने जा रही है। गठबंधन की राजनीति में किसी बात पर एक दम अड़ना नहीं चाहिए। लेकिन अखिलेश यादव अड़ जा रहे हैं। अखिलेश भले ही इसे अपनी अक्लमंदी मान रहे हों, लेकिन देश की आधी से ज्यादा आबादी इसे अज्ञानता कह रही है।

किसान नेता पूर्व प्रधानमंत्री चौ. चरण सिंह को भारत रत्न से सम्मानित करने की घोषणा हुई तो उनके पोते रालोद अध्यक्ष जयंत चौधरी मोदी को दिल दे बैठे। इधर अपना दल कमेरावादी पार्टी आंख दिखा रही है। मां कृष्णा पटेल के लिए यदि पल्लवी पटेल ने टिकट मांग लिया तो गलत क्या किया? कृष्णा पटेल पार्टी की अध्यक्ष होने के साथ सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने वाले बोधिसत्व डॉ. सोनेलाल पटेल की पत्नी हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पल्लवी पटेल ने राज्यसभा चुनाव को लेकर विमर्श के लिए सपा प्रमुख अखिलेश यादव से समय मांगा था, आरोप है कि अखिलेश यादव ने समय नहीं दिया।

पल्लवी पटेल जिस विचारधारा के साथ पली-बढ़ी हैं, उनका गुस्सा होना लाजमी है। राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा में चंदौली जनपद में शामिल होकर संदेश भी दे दिया है। पिछड़े समाज के फायर ब्रांड नेता स्वामी प्रसाद मौर्य और सलीम इकबाल शेरवानी ने राष्ट्रीय महासचिव पद से इस्तीफा दे दिया। स्वामी प्रसाद मौर्य तो अब वापस नहीं लौटने वाले। उन्होंने राष्ट्रीय शोषित समाज पार्टी की राह पकड़ ली है।

दरअसल कुर्मी और कुशवाहा दोनों जातियों की कार्यसंस्कृति, आचार, व्यवहार और त्यौहार मिलते जुलते हैं। दोनों कृषक जाति हैं। ये फसल पकने का इंतजार करती हैं। बीच में नष्ट नहीं करतीं। इन दोनों जातियों में धैर्य कमाल का है। पहले घर की पूंजी मिट्टी में मिला देते हैं। अंकुरण  के बाद बच्चे जैसा पालते हैं। फसल पकती है, तभी काटते हैं।

इन नेताओं को जब लगा होगा कि पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) सपा के लिए सिर्फ नारा है। जैसे, हाथी के दो तरह के दांत होते हैं। खाने के और, दिखाने के और। यदि ऐसा न होता तो समाजवादी पार्टी ने जया बच्चन को लगातार पांचवीं बार राज्यसभा का टिकट क्यों दिया। जबकि इनके पति सदी के महानायक अमिताभ बच्चन अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा समारोह में शामिल होकर मोक्ष की कामना कर रहे थे।

आलोक रंजन। ये प्रदेश के मुख्य सचिव रहे हैं। इन्होंने अपने कार्यकाल में ऐसा कौन सा कालजयी कार्य कर दिया, जिससे उत्तर प्रदेश गौरवान्वित हुआ हो। स्वामी प्रसाद मौर्य, पल्लवी पटेल, सलीम इकबाल शेरवानी का सवाल समीचीन है।

कांग्रेस से भी अभी बात नहीं बन सकी है। राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा में शामिल होने के लिए अखिलेश यादव आमंत्रण का इंतजार कर रहे हैं। कांग्रेस तो 2024 के लिए लड़ ही नहीं रही है तो वह ज्यादा परेशान क्यों हो। सोनिया गांधी ने रायबरेली छोड़ ही दिया। समझा जा रहा है कि राहुल गांधी भी बायनाड को ही सुरक्षित समझ रहे हैं।

उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी को चुनौती देने की सबसे पहले जिम्मेदारी समाजवादी पार्टी की है। 2027 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश यदि सीएम बनने का सपना देख रहे हों, तो इस जिम्मेदारी को आगे बढ़कर अपने कंधों पर ले लेनी चाहिए। सीटों के विवाद को छोड़कर एक प्रत्याशी देने के लिए सबको सम्मान देना चाहिए। सम्मान नहीं मिलेगा तो वह दिन भी दूर नहीं होगा, जब अखिलेश यादव का साथ पिछड़ों में गैरयादव, दलित व अल्पसंख्यक समाज के नेता नाता छोड़ देंगे।

इसका दूसरा पहलू भी हो सकता है। वह यह है कि अखिलेश कांग्रेस को नही्ं बढ़ने देना चाह रहे होंगे। यदि कांग्रेस का जनाधार बढ़ेगा तो 2027 के विधानसभा चुनाव में यह भी एक धुरी रहेगी। वह खुद को पिछड़े वर्ग तथा किसानों का नेता समझते हैं। लेकिन दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे किसानों के समर्थन में अपने किसी पदाधिकारी को नहीं भेजा। स्वामी प्रसाद मौर्य के बयान को उनका निजी बताया जाने लगा। पल्लवी पटेल को समय नहीं दिया जाना, अखिलेश की अक्लमंदी है या अज्ञानता। यह तो वही जाने, लेकिन अड़ियलपन किसी स्तर पर ठीक नहीं होता। जब उद्देश्य सही में एक हो। जो स्थिति है, उसके अनुसार लगता है कि कांग्रेस 2029 की तैयारी कर रही है और सपा 2027 के मद्देनजर कांग्रेस को आगे बढ़ने से रोकने की कोशिश कर रही है।

(लेखक राजेश पटेल इस पोर्टल sachchibaten.com के प्रधान संपादक हैं।)

 


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