July 24, 2024 |

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लोकसभा चुनाव 2024 के लिए भाजपा में बैचेनी का दौर

Sachchi Baten

पुराने साथियों से हाथ मिलाएगी भाजपा

टीडीपी, अकाली और जनता दल एस संग बढ़ाई पीगें

उमर का विपक्ष का साथ छोड़ना भी सत्ता -संगठन के लिए शुभ संकेत

 छोटे-छोटे दलों की ओर भी है भाजपा नेतृत्व की नज़र

 

हरिमोहन विश्वकर्मा, नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव 2024 में 300+ सीटों की आस लगाए भारतीय जनता पार्टी अपना कुनबा बढ़ाने की फ़िराक़ में है। इसके लिए आलाक़मान पुराने दोस्तों की ओर देख रहा है। इनमें अकाली दल, टीडीपी आदि दलों पर नज़र है।

तेलुगू देशम पार्टी का भाजपा की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाना इसी दिशा में एक कदम है। पांच साल पहले तेलगु देशम के बॉस एन चंद्रबाबू नायडू ने आंध्र प्रदेश को विशेष दर्जा देने की मांग पर एनडीए से अपनी राह अलग कर ली थी। लेकिन पांच साल तक सत्ता से दूर रहने के बाद नायडू अपनी आइडियॉलाजी बदलने के लिए मजबूर होते दिख रहे हैं।

गृहमंत्री अमित शाह से नायडू की मुलाकात के बाद अब तय माना जा रहा है कि टीडीपी एक बार फिर एनडीए का हिस्सा बनेगी। कुछ ऐसी ही मज़बूरी भाजपा के साथ भी है।पहले हिमाचल और फिर कर्नाटक की हार ने पार्टी के आत्मविश्वास को हिला दिया है।

अगले कुछ महीनों में राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मिजोरम में भी उसकी चुनावी परीक्षा होनी है। ऐसे में वह अपनी रणनीति पर दोबारा गौर करने को मजबूर हो गई है। शायद यही वजह है कि वह अपने पुराने साथी शिरोमणि अकाली दल के साथ भी अलायंस की संभावनाएं तलाश रही है।

अटल बिहारी वाजपेयी के जमाने में दोनों दल सरकार के बाहर से मजबूत सहयोगी थे। चंद्रबाबू नायडू तब अपने राज्य के लिए तमाम तरह की योजनाएं और अनाज का विशेष और बड़ा कोटा उठा लेते थे। राम मंदिर और समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दों को लेकर भाजपा के रुख पर सवाल भी उठाते रहते थे।

तब की राजनीति में टीडीपी की स्थिति चित्त भी मेरी और पट भी मेरी वाली थी। अब आंध्र प्रदेश से अलग होकर बने तेलंगाना में भाजपा ने तेजी से पांव पसारे हैं। उसे राज्य में सत्ता के दावेदार के रूप में भी देखा जा रहा है। लेकिन भाजपा का संकट यह है कि उसके पास 119 सीटों के लिए उम्मीदवारों का टोटा है।

ऐसे में अगर टीडीपी से उसका समझौता होता है तो उसकी चुनौती कम होगी। दोनों दल मिलकर लड़ें तो तेलंगाना में चंद्रशेखर राव की सत्ता उखड़ सकती है। भाजपा सहयोगियों की तलाश में जिस तरह जुटी हुई है, उससे साफ है कि वह अपने राजनीतिक किले को मजबूत करने में कोई कसर बाकी रखना नहीं चाहती।

उधर शिरोमणि अकाली दल के साथ भाजपा के रिश्तों की बर्फ तब पिघली, जब प्रधानमंत्री अकाली नेता प्रकाश सिंह बादल के निधन के बाद शोकसभा में शामिल होने पहुंचे। किसान आंदोलन के समर्थन में अकाली दल ने एनडीए से अलग राह चुन ली थी। लेकिन पंजाब विधानसभा चुनावों में उसे खास फायदा नहीं मिला तो उसे भी अपनी रणनीति को लेकर सोचना पड़ा।

अब उसका भी रुख बदला नजर आ रहा है। इसी बीच बिहार की राजधानी पटना में 23 जून को विपक्षी दलों की बैठक होने जा रही है। उसमें जम्मू-कश्मीर की प्रमुख पार्टी नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने शामिल होने से मना कर दिया है। उन्होंने तर्क दिया है कि जब 370 हटाया जा रहा था, तो ये दल चुप थे।

पटना बैठक से दूरी रखने का ऐलान भाजपा के लिए सकारात्मक है। यानी उमर भी भाजपा के साथ जा सकते हैं। उधर उत्तर प्रदेश के ओमप्रकाश राजभर के भी भाजपा से जुड़ने की चर्चा है।

ऐसी चर्चाएं हर राज्य के उन छोटे दलों को लेकर है, जो कांग्रेस के साथ नहीं हैं। कर्नाटक में मौजूदा कांग्रेस सरकार की पांच गारंटी को लेकर जनता दल एस जिस तरह का बयान दे रहा है और जिस तरह नई संसद के उद्घाटन में एचडी देवेगौड़ा शामिल हुए, उससे साफ है कि भाजपा और जनता दल एस के बीच सहयोग के लिए समझ बन रही है। इन संकेतों से लगता है कि आने वाले दिनों में भाजपा का कुनबा बढ़ेगा, जो भाजपा के आत्मविश्वास के लिए संजीवनी का काम करेगा।

उधर हरियाणा में हाल ही में हुई रैली में गृह मंत्री अमित शाह ने इंडियन नेशनल लोकदल को लेकर कुछ नहीं कहा। ओमप्रकाश चौटाला भी हरियाणा के CM रहे। उनके बेटे अभय चौटाला विधायक हैं। इसके बावजूद शाह ने इनेलो पर कोई निशाना नहीं साधा। इससे कयास लगाए जा रहे हैं कि भाजपा को जरूरत पड़ी तो जननायक जनता पार्टी (जजपा) पर निर्भर नहीं रहेगी, बल्कि इनेलो से भी परहेज नहीं करेगी।

हरियाणा में भाजपा जजपा से गठबंधन कर सरकार चला रही है। 41 MLA भाजपा और जजपा के 10 MLA से मिलकर सरकार बनी है। इन दिनों दोनों दलों में चुनाव को लेकर गठबंधन में खटास की चर्चा है। शाह की इस रैली में जजपा का कोई नेता नजर नहीं आया। जजपा प्रमुख अजय चौटाला और डिप्टी CM दुष्यंत चौटाला भी नहीं दिखे। शाह के कार्यक्रम में में पिता-पुत्र का जिक्र तक न होने से ये चर्चा है कि BJP उन्हें बता रही है कि हरियाणा में वे भाजपा की मजबूरी नहीं हैं।

जिस सिरसा में अमित शाह की रैली थी, वह चौटाला परिवार का गढ़ है। खास तौर पर पूर्व उपप्रधानमंत्री स्व. चौधरी देवीलाल के लिए यहां के लोगों के मन में काफी सम्मान है। इसी वजह से शाह ने उनका जिक्र अपने भाषण में किया। चौधरी देवीलाल के बेटे हरियाणा सरकार में मंत्री रणजीत चौटाला के घर भी गए।


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