July 23, 2024 |

BREAKING NEWS

- Advertisement -

सच्ची बातेंः सपा मुखिया अखिलेश यादव के रुख से उप्र में मुसीबत में INDIA गठबंधन

Sachchi Baten

उत्तर प्रदेश में दोहरी चुनौतियों से जूझना होगा कांग्रेस को

-समाजवादी पार्टी का ड्राईविंग सीट पर रहने का दावा

-पार्टी संगठन को खड़ा करने और बूथ स्तर तक वर्कर की बड़ी चुनौती

-प्रदेश अध्यक्ष अजय राय क्षेत्रीय क्षत्रप जैसे, प्रदेश में खपना मुश्किल

हरिमोहन विश्वकर्मा,  लखनऊ। मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के चुनाव अभियान का शुभारम्भ रीवा से करते हुए पार्टीsa मुखिया अखिलेश यादव ने इंडिया गठबंधन को दरकिनार करते हुए कांग्रेस से सलाह किए बिना ही कुछ सीटों पर सपा के प्रत्याशी घोषित कर दिए। इतना ही नहीं, इससे पहले एक बयान में अखिलेश यह भी कह चुके हैं कि इंडिया गठबंधन के तहत वह उप्र में लोकसभा सीटें देने वाले पाले में हैं, न कि लेने वाले में।

अखिलेश का यह अंदाज उप्र के लोकसभा चुनाव में सफलताओं को तलाश रही कांग्रेस के लिए बड़ा झटका भी है और संकेत भी कि उप्र में वह खुद को ड्राइविंग सीट पर मानने की गलती न करे।

जाहिर है, उत्‍तर प्रदेश में भाजपा का मुकाबला कांग्रेस, सपा और रालोद मिलकर करेंगे या फिर अलग-अलग लड़ेंगे, यह अभी तय नहीं हुआ है। सीटों के बंटवारे को लेकर भी राह इतनी आसान नहीं रहने वाली है, क्‍योंकि राष्‍ट्रीय स्‍तर पर गठबंधन की कोशिश भले ही चल रही हो, लेकिन प्रादेशिक स्‍तर पर गठबंधन में शामिल कई दलों की सियासत एक दूसरे के विरोध पर टिकी हुई है और तीन बैठकों के बाद भी गठबंधन की तस्‍वीर साफ नहीं है।

ऐसे में विपक्षी गठबंधन कोई मजबूत शक्‍ल ले पायेगा, और सीटों का बंटवारा आसानी से हो पायेगा, यह बड़ा सवाल है। इस स्थिति के बाद भी कांग्रेस की राह उप्र में आसान नहीं है। भाजपा से लड़ने से पहले कांग्रेस के सामने यूपी में इंडिया गठबंधन की गतिविधियों को नियंत्रित करना तो है ही, पार्टी संगठन को जमीन पर खड़ा करने की असल चुनौती भी है।

हकीकत यह है कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पास इतनी ताकत नहीं बची है कि वह अपने बूते किसी भी चुनाव में चमत्‍कार कर सके। समाजवादी पार्टी अच्छी तरह यह बात समझती है। कांग्रेस को प्रदेश के सभी बूथों पर कार्यकर्ता मिलना तक मुश्किल है। जाहिर है, जब तक कांग्रेस बूथ स्तर पर खुद को मजबूत नहीं करेगी, उसकी स्थिति में किसी बदलाव की संभावना नहीं है और यूपी में सफलता के लिए गठबंधन के साथी दलों का मोहताज रहना ही है।

2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले भी तत्‍कालीन प्रदेश अध्‍यक्ष अजय कुमार लल्‍लू के नेतृत्‍व में कांग्रेस लगातार सड़कों पर रही। कांग्रेस आंदोलनों के जरिए भाजपा सरकार को बैकफुट पर धकेलने की कोशिश करती रही। ऐसा लगा कि सपा की बजाय कांग्रेस ही यूपी में मुख्‍य विपक्षी दल की भूमिका में है।

कांग्रेस महासचिव एवं यूपी प्रभारी प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी राज्‍य में घटित तमाम घटनाओं पर योगी सरकार को घेरने का प्रयास किया, आंदोलन किया, राज्‍य के माहौल को गरमाने की पूरी कोशिश की, लेकिन जब विधानसभा चुनाव के नतीजे आये तो कांग्रेस अपने राजनीतिक इतिहास के सबसे खराब दौर में पहुंच गई।

विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के मात्र दो विधायक जीत पाये और कांग्रेस का वोट प्रतिशत सात फीसद से सिमटकर तीन फीसद पर पहुंच गया। दरअसल, कांग्रेस को यूपी में फिर से जिंदा करने के लिये केवल तेजतर्रार अध्‍यक्ष से काम नहीं बनने वाला है बल्कि इसके लिये जनता के एक बड़े वर्ग का भरोसा भी जीतना होगा, जो बहुत आसान नहीं है।

अजय राय कांग्रेस के सक्रिय नेताओं में गिने जाते हैं, लेकिन उनका प्रभाव क्षेत्र बनारस तक ही सीमित है तथा उनकी जाति के वोटरों की संख्‍या भी पूरे प्रदेश में सियासी रूप से अप्रभावी है। यह भी एक तथ्‍य है कि केवल आंदोलन से कार्यकर्ताओं को सक्रिय नहीं किया जा सकता है। संगठन को भी गति देनी होगी।

संगठन के स्‍तर पर अजय राय को काम करने का कोई विशेष अनुभव नहीं है, न ही उनके सांगठनिक कौशल की कभी परीक्षा हुई है। बीते वर्ष उन्‍हें जोनल अध्‍यक्ष बनाया गया था, लेकिन अपने जोन में कांग्रेस को फिर से खड़ा करने का प्रयास करते उन्‍हें नहीं देखा गया।

विधानसभा चुनाव से पहले प्रियंका गांधी वाड्रा भी यूपी में खासी सक्रिय रहीं, लेकिन विधानसभा में मिली करारी हार के बाद उन्‍होंने भी इस राज्‍य से मुंह मोड़ लिया है। अब कांग्रेस की मंशा 2009 को आधार मानकर प्रदेश में लोकसभा सीटों का बंटवारा करने पर है, लेकिन सपाध्यक्ष के मूड से लगता है कि वे 2014 के आधार पर कांग्रेस को सीट देने की पेशकश कर सकते हैं।

वास्तव में उप्र में सपा की महत्‍वाकांक्षा से निपटना कांग्रेस के लिए कड़ी चुनौती है। लोकसभा चुनाव में गठबंधन से पहले सपा मध्‍य प्रदेश एवं राजस्‍थान के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से गठबंधन चाहती है। अतीत में सपा इन दोनों राज्‍यों में कुछ सीटें जीतती रही है। इस बार उसे लग रहा है कि मध्‍य प्रदेश में सपा सरकार का हिस्‍सा बन सकती है।

सपा की कोशिश है कि कांग्रेस दोनों राज्‍यों में बड़ा दिल दिखाते हुए कुछ सीटें गठबंधन के तहत उसे भी दे, लेकिन इसके लिए वह इंतज़ार करने की स्थिति में नहीं है, इसीलिए उसने मप्र में अपने प्रत्याशी उतारने शुरू कर दिए हैं। यह उसकी कांग्रेस पर दबाव बनाने की रणनीति भी हो सकती है, ताकि जीत की स्थिति में वह भी सत्‍ता का हिस्‍सा बन सके। अब देखना है कि कांग्रेस इस पर क्‍या रवैया अपनाती है। उसके कदम पर ही यूपी में गठबंधन का भविष्‍य टिका हुआ है।


Sachchi Baten

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

Leave A Reply

Your email address will not be published.