July 23, 2024 |

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सच्ची बातेंः इस शिक्षक के बारे में जानेंगे तो याद आएंगे लौहपुरुष सरदार पटेल और  डॉ. राजेंद्र प्रसाद,  पढ़िए…

Sachchi Baten

कर्तव्यनिष्ठा की मिसालः 17 साल तक नहीं ली एक भी छुट्टी, छुट्टी के दिनों में भी जाते थे स्कूल

-मां का शव पड़ा था घर में, विद्यालय की छुट्टी होने के बाद ही गए राजनाथ उपाध्याय

-बेटी की शादी दिन में थी, स्कूल खुला होने के कारण कन्यादान करने नहीं गए

-एकमात्र बेटे का तिलकोत्सव भी दिन में था, उसमें भी शरीक नहीं हुए

-घर चलाने के लिए आधी तनख्वाह ही पत्नी को देते थे, आधी खर्च करते थे गरीब बच्चों की पढ़ाई  व गरीब बेटियों की शादी में

राजेश पटेल, जमालपुर (मिर्जापुर)। आज एक ऐसे सरकारी शिक्षक के बारे में बताने जा रहा हूं, जिसके लिए सबकुछ स्कूल और स्कूल के बच्चे ही थे। चाहे जितनी भी बड़ी घरेलू समस्या आई, स्कूल और वहां के बच्चों को ही प्राथमिकता दी। स्कूल और विद्यार्थियों के प्रति इनके समर्पण के भाव को जब जानेंगे तो आपको लौहपुरुष सरदार पटेल और देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के साथ की घटनाएं जरूर याद आएंगी। अपने स्कूल और वहां के बच्चों के साथ इनका ऐसा लगाव रहा कि सेवानिवृत्त होने के बाद जिस दिन इनको विदाई दी गई, उसी दिन ब्रेन स्टोक आया। इसके बाद वह बिस्तर से नहीं उठे। इसी साल बीते जनवरी में 24 तारीख को निधन हो गया।

ऐसे महान शिक्षक का नाम है पं. राजनाथ उपाध्याय। इनका मूल गांव नरायनपुर ब्लॉक के नियामतपुर कलॉ है। ननिहाल भुइली खास के पास रामपुर गांव में है। संपत्ति मिलने के कारण इनके पिता उमाचरण उपाध्याय यही रहने लगे। राजनाथ उपाध्याय प्राइमरी स्कूल में टीचर थे। मिडिल स्कूल में प्रमोशन होने के बाद पहली तैनाती उच्च प्राथमिक विद्यालय तेतरिया, जमालपुर में हुई। इसी समय से इनकी जीवनशैली पूरी तरह से बदल गई। संडे हो या मंडे, होली या दिवाली। 365 दिन स्कूल आने लगे। बच्चों को भी प्रतिदिन बुलाते थे और उनको पढ़ाते थे।

जून 2006 में इनकी मां तुलसी उपाध्याय का निधन हुआ तो भी स्कूल में ही थे

आमतौर पर जून में गर्मियों की छुट्टी के कारण स्कूल बंद रहते हैं। लेकिन राजनाथ उपाध्याय की पाठशाला खुली रहती थी। जून 2006 में एक दिन वह स्कूल में बच्चों को पढ़ा रहे थे। उसी समय घर से मां तुलसी उपाध्याय के निधन की दुखद खबर आई। राजनाथ उपाध्याय जरा भी विचलित नहीं हुए। पढ़ रहे बच्चों को भी आभास नहीं होने दिया कि उनकी मां का देहांत हो चुका है। करीब दो घंटे तक बच्चों को पढ़ाने के बाद वह घर पहुंचे, जहां मां का शव पड़ा था। इनके जाने के बाद अंत्येष्टि की प्रक्रिया शुरू हो सकी।

स्कूल खुला होने के कारण बेटी का कन्यादान नहीं कर सके

मई 2005 में राजनाथ उपाध्याय की बेटी विद्या पांडेय की शादी थी। वर वक्ष जमालपुर के पास  मदरा गांव का है। दामाद अरविंद पाडेय ने  बताया कि उस समय ससुर राजनाथ उपाध्याय तेतरिया में ही पढ़ाते थे। शादी दिन में ही थी। स्कूल खुला था। इस कारण वे शादी में शरीक नहीं हो सके। कन्यादान की रस्म राजनाथ उपाध्याय के नाना राममूरत मिश्रा ने पूरी की। बारात विदा भी हो गई, लेकिन वह घर नहीं पहुंचे थे। स्कूल की छुट्टी होने के बाद ही घर पहुंचे थे।

एकमात्र पुत्र नीरज के तिलकोत्सव में भी शामिल होने के लिए स्कूल से छुट्टी नहीं ली

राजनाथ उपाध्याय के एकमात्र पुत्र का नाम नीरज उपाध्याय है। नीरज की शादी 2015 में हुई। उच्च प्राथमिक विद्यालय चकलठिया शेरवा में पढ़ाते थे। तिलकोत्सव दिन में था। तिलकोत्सव में भी वह इसलिए शामिल नहीं हो सके, क्योंकि स्कूल के टाइम में था। उनकी अनुपस्थिति में दामाद अरविंद पांडेय ने सारी जिम्मेदारी संभाली थी। इतना ही नहीं, 2015 में जब अपने बेटे नीरज की शादी की तो बारात में उनके स्कूल चकलठिया के करीब डेढ़ सौ बच्चों को भी ले गए थे। बारात इमिलिया चट्टी के पास तेतारपुर गांव में गई थी। इतनी भारी संख्या में बच्चों को देखकर घराती चौंक गए थे।

आधी तनख्वाह खर्च करते थे गरीब बच्चों की पढ़ाई व गरीब बेटियों की शादी में

राजनाथ उपाध्याय घर चलाने के लिए पत्नी के  हाथ में आधी  तनख्वाह ही देते थे। आधी को गरीब बच्चों की पढ़ाई व गरीब बेटियों की शादी में खर्च करते थे। उनको पता भर चलने की देर थी कि अमुक गरीब व्यक्ति की बेटी की शादी है। वह बिन बुलाए मेहमान की तरह पहुंच जाते थे। बेटी के पिता से पूछते कि क्या  जरूरत है। वह पूरी करके ही वापस लौटते थे। आज भी लोग उनको बहुत ही श्रद्धा के साथ याद करते हैं।

समय की पाबंदी कोई इनसे सीखे

उच्च प्राथमिक विद्यालय चकलठिया शेरवां के प्रभारी प्रधानाध्यापक आनंंद विक्रम सिंह व सहायक अध्यापक राजेश सिंह ने बताया कि मान लीजिए कि स्कूल खुलने का समय साढ़े आठ बजे है तो उनको आप सुबह सात बजे भी देख सकते थे, आठ बजे भी। हमेशा स्कूल खुलने से पहले ही वह आ जाते थे। उनके लिए कोई छुट्टी नहीं थी। रविवार की छुट्टी हो या कोई भी त्यौहार, 365 दिन विद्यालय आते थे।

नीलकंठ का दर्शन किए बिन भोजन नहीं करते थे

राजनाथ उपाध्याय बहुत ही धार्मिक प्रवृत्ति के थे। कम से कम पांच नीलकंठ का दर्शन प्रतिदिन करते थे। जब तक पांच नीलकंंठ देख नहीं लेते थे, भोजन नहीं ग्रहण करते थे। इसके लिए वह कभी-कभी दिन भर भूखे भी रह जाते थे। नीलकंठ को खिलाने के लिए दाने उनकी जेब में रहते थे।

नई साइकिल, काला बूट और सफारी सूट उनकी पहचान थी

हर साल नई साइकिल खरीदते थे। पुरानी को किसी को दे देते थे। हमेशा सफारी सूट ही पहनते थे। पैरों में काला बूट। साइकिल, सफारी सूट व काला बूट हर साल 15 अगस्त को ही बदलते थे। जाड़ा हो या कोई भी मौसम। उनके शरीर पर आधी बांह का सफारी सूट ही होता था। कोई स्वेटर आदि नहीं।

बहुत स्वाभिमानी थे राजनाथ उपाध्याय

राजनाथ उपाध्याय कर्तव्यनिष्ठ के साथ ही बहुत स्वाभिमानी भी थे।  साथी शिक्षक उनसे कहते थे कि आप इतना सबकुछ करते हैं तो अपने लिए पुरस्कार, सम्मान आदि के लिए विभाग में आवेदन कर दीजिए। इस पर वे जवाब देते थे कि वह किसी पुरस्कार या सम्मान  के लिए काम नहीं कर रहे हैं। आत्मसंतुष्टि के लिए समर्पित हैं। अपने काम से संतुष्टि है, यही सबसे बड़ा सम्मान व पुरस्कार है। उन्होंने अपने को पुरस्कृत या सम्मानित करने के लिए कभी भी विभाग को पत्र नहीं लिखा।

इनकी कहानी सुन क्यों याद आते हैं लौहपुरुष सरदार पटेल व पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद

लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की पत्नी झावेर बा कैंसर से जूझ रही थीं। उन्हें 1909 में बंबई के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वहां कुछ समय तक उनका इलाज चला। ऑपरेशन के दौरान उनका निधन हो गया। जिस समय निधन हुआ, उस समय पटेल कोर्ट में अदालती कार्यवाही में व्यस्त थे। कोर्ट में बहस के दौरान एक शख्स उनके पास आया और कागज की चिट पकड़ाई। उस चिट में उनकी पत्नी की मौत की खबर थी।

यह जानने के बाद भी उन्होंने उस चिट को चुपचाप अपनी कोट की जेब में रखा और बहस जारी रखी। उस दिन वो मुकदमा जीत गए। जब अदालती कार्यवाही खत्म हुई तो उन्होंने सबको पत्नी की मौत की सूचना दी। उनकी बात सुनकर हर कोई चौंक गया था।

इसी तरह की घटना आजाद भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के साथ की भी है। बात साल 1960 की है। राष्‍ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की बड़ी बहन भगवती देवी का 26 जनवरी से एक दिन पहले 25 जनवरी की देर शाम निधन हो गया। भगवती देवी व राजेंद्र प्रसाद में प्रगाढ़ स्नेह था। बहन की मृत्यु से राजेंद्र बाबू गहरे शोक में डूब गए। बेसुध होकर पूरी रात बहन के शव के निकट बैठे रहे।

रात के आखिरी पहर में घर के सदस्यों ने उन्हें स्मरण कराया कि सुबह 26 जनवरी है और उन्‍हें राष्ट्रपति होने के नाते गणतंत्र दिवस परेड की सलामी लेने जाना होगा। इतना सुनते ही उनकी चेतना जागृत हो गई और पल भर में आंसू पोंछ लिया। सुबह वे सलामी के लिए परेड के सामने थे।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने गणतंत्र दिवस के राजकीय समारोह में शिरकत की। इसके बाद वे घर लौटे और बहन की मृत देह के पास जाकर फफक कर रो पड़े। फिर, अंत्येष्टि के लिए अर्थी के साथ यमुना तट तक गए। वहां उन्‍होंने बहन का अंतिम संस्‍कार किया। कहा जा सकता है कि राजनाथ उपाध्याय इन दोनों महापुरुषों के पक्के अनुयायी थे।

2019 में हुए सेवानिवृत्त

राजनाथ उपाध्याय 2019 में उच्च प्राथमिक विद्यालय चकलठिया से सेवानिवृत्त हुए। साथी शिक्षकों व बच्चों द्वारा उनको भव्य विदाई दी गई। उन्होंने वादा किया कि जब तक शरीर साथ देगा, वह विद्यालय प्रतिदिन आएंगे, लेकिन विधि को कुछ और ही मंजूर था या वह स्कूल व बच्चों से वैधानिक रूप से अलग होने के सदमे को बर्दाश्त नहीं पाए। उसी दिन उनको ब्रेन स्ट्रोक आया। और, वह बिस्तर पर पड़ गए। इस वर्ष 2023 में 24 जनवरी को उनकी महान आत्मा अनंंत के सफर पर चली गई।

 

 

 

 

 

 

 


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