July 19, 2024 |

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सच्ची बातेंः राम लहर में कांग्रेस के सामने खुद को खड़ा करने की बड़ी चुनौती

Sachchi Baten

भारत जोड़ो यात्रा पार्ट-2 होगी भारत जोड़ो न्याय यात्रा

-14 जनवरी से आरम्भ हो रही 66 दिन लंबी यात्रा

-भारत जोड़ो पार्ट वन ने दिलाए थे कर्नाटक, हिमाचल जैसे राज्य

हरिमोहन विश्वकर्मा, नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस की जड़ों को खाद पानी देने के लिए अब राहुल गांधी 14 जनवरी से मणिपुर से भारत जोड़ो न्याय यात्रा निकालने जा रहे हैं। यात्रा का अंत महाराष्ट्र में होना है।

जहां एक ओर केन्द्र की भाजपा सरकार राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम के जरिये 2024 में लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने में जुटी है और सम्पूर्ण देश में राम लहर को धार देने में जुटी है, वहीं राहुल की न्याय यात्रा से कांग्रेस भी अधिसंख्यक राज्यों को कवर कर लोकसभा चुनाव की तैयारियों को अंतिम रूप देगी।

वास्तव में भारत जोड़ो यात्रा के बाद कांग्रेस ने जो लाभ हासिल किये थे, उनकी बदौलत उसने हिमाचल और कर्नाटक राज्यों की सत्ता भी पाई और साथी विपक्षी दलों के बीच भी अपने रुतबे को मजबूत किया था। लेकिन कांग्रेस के लिए हाल में सम्पन्न 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों ने स्थिति बिलकुल बदल दी।

वह न सिर्फ तीन बड़े हिंदी भाषी राज्य हार गई, जिनमें राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे उसके दो राज्य हैं, जहां वह सत्ता में थी। इस हार के बाद न सिर्फ भाजपा का मुकाबला करने के लिए बने इंडिया गठबंधन में कांग्रेस की स्थिति कमजोर ही नहीं हुई, बल्कि पार्टी को आंख दिखाने वाले नेताओं की संख्या भी बढ़ गई।

कांग्रेस को आशा थी कि वह छत्तीसगढ़, राजस्थान और मप्र जैसे राज्यों में जीत गई तो लोकसभा चुनाव में उसे उप्र में समाजवादी पार्टी, बिहार में राष्ट्रीय जनता दल और नीतीश कुमार, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और महाराष्ट्र में शिवसेना व राष्ट्रवादी कांग्रेस से सीटों को लेकर मोलतोल करने की आज़ादी मिल जाएगी।

इसी चक्कर में उसने समाजवादी पार्टी को मप्र में मात्र छह विधानसभा सीटें देने से गुरेज किया और अपने संबंध अखिलेश यादव से ख़राब कर लिए। अब स्थिति ये है कि ममता बनर्जी बंगाल में कांग्रेस को एक भी सीट देने को सहमत नहीं हैं। जबकि राष्ट्रीय स्तर पर वे इंडिया गठबंधन में होने का दावा कर रही हैं।

यही हाल उप्र में अखिलेश यादव का है, जो प्रदेश की 80 में से 65 सीटों पर अकेले लड़ना चाहते हैं और बाकी 15 में राष्ट्रीय लोकदल, कांग्रेस, अपना दल कमेरावादी और अन्य सहयोगी दल हैं। बिहार में 40 सीटों में से राष्ट्रीय जनता दल और नितीश की पार्टी ने 17- 17 सीटों पर लड़ने का ऐलान कर दिया है। अर्थात कांग्रेस व बिहार के महागठबंधन में शामिल बाकी दलों को मात्र छह सीटों में बंटवारा करना पड़ेगा।

लगभग यही हाल महाराष्ट्र का भी है। महाराष्ट्र में हालांकि एनसीपी व उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले दलों ने सीटों के बंटवारे का ऐलान नहीं किया है, पर इस मामले में वे कांग्रेस को हाशिये पर रखने के मूड में हैं। दिल्ली में आम आदमी पार्टी का भी कुछ ऐसा ही मूड है।

ऐसे में कांग्रेस न सिर्फ उत्तरी भारत में कमजोर पड़ती जा रही है, बल्कि उसे लोकसभा चुनाव बाद परिणामों में दूसरे दलों के रहमोकरम पर रहना पड़ेगा। कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दल के लिए ये बिल्कुल असहज स्थिति है। फिलहाल हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि जिस इंडिया गठबंधन के नेतृत्व को संयोजक के पद पर मल्लिकार्जुन खड़गे को बैठाकर कांग्रेस ड्राईविंग सीट पर बने रहना चाहती थी, वह संयोजक पद वापस नीतीश कुमार के पास जाता दिख रहा है।

कांग्रेस अब तक जिन राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद के लिए प्रोजेक्ट करती आ रही थी, गठबंधन की चौथी बैठक में ममता बनर्जी ने केजरीवाल से सांठगांठ कर उसके लिए दलित प्रधानमंत्री के तौर पर मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम आगे बढ़ा दिया। ऐसे में कांग्रेस के लिए हालात बेहद दुष्कर हैं। पार्टी अंदरूनी उठापटक से अलग जूझ रही है। एक निर्णय के तहत पार्टी को राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी से उप्र का प्रभार भी वापस लेना पड़ा। इन हालातों में 66 दिन लंबी, 6700 किमी की दूरी कवर करने वाली और 14 राज्यों के 110 जनपद कवर करने वाली भारत जोड़ो न्याय यात्रा कांग्रेस को कहां लाकर खड़ा कर पाएगी, यह बड़ा सवाल है।


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