July 23, 2024 |

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सच्ची बातेंः इस मंदिर में श्रीकृष्ण की 32 मन यानि 1280 किलो सोने की है प्रतिमा

Sachchi Baten

झारखंड के गढ़वा जिले के नगर उंटारी में है बंशीधर की 32 मन सोने की प्रतिमा

-नगर गढ़ की रानी शिवमणि देवी के स्वप्न में आए थे भगवान श्रीकृष्ण

-उन्होंने खुद बताया कि उनकी प्रतिमा कहां पर है, मंदिर बनवाने का दिया था निर्देश

 

रजनीश कुमार मंगलम, बंशीधर नगर (गढ़वा)। झारखंड के गढ़वा जिले के नगर उंटारी में स्थित श्री बंशीधर मंदिर एक ऐतिहासिक धरोहर है। मंदिर में पक्के  32 मन यानी 1280 किलोग्राम शुद्ध सोने से निर्मित भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा के साथ वाराणसी से मंगाई गई अष्टधातु की मां राधिका की प्रतिमा स्थापित है। झारखंड, छत्तीसगढ़ व उत्तर प्रदेश के संगम स्थल पर श्री बंशीधर मंदिर बांकी नदी के किनारे अवस्थित है।

 

                         32 मन सोने की श्रीकृष्ण व अष्टधातु की राधे की प्रतिमा।

 

श्री कृष्ण की यह अद्भुत प्रतिमा भूमि में गड़े शेषनाग के फन पर निर्मित 24 पंखुड़ियों वाले विशाल कमल पुष्प पर विराजमान है। श्री कृष्ण की प्रतिमा करीब साढ़े चार फीट की है। नगर उंटारी राजपरिवार के संरक्षण में यह मंदिर देश व विदेश के पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है, वहीं स्थानीय लोगों के लिए आस्था व विश्वास का केंद्र बना हुआ है।

यहां प्रतिवर्ष फाल्गुन महीने में एक माह तक आकर्षक एवं विशाल मेला लगता है। मंदिर के प्रस्तर लेख और पुजारी स्व. रिद्धेश्वर तिवारी के द्वारा लिखित इतिहास के अनुसार संवत 1885 में श्री कृष्ण की अनन्य भक्त नगर गढ़ के महाराज स्व. भवानी सिंह की विधवा रानी शिवमणि देवी श्री कृष्ण जन्माष्टमी को उपवास रख भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लीन थीं। मध्य रात्रि में भगवान श्री कृष्ण रानी के स्वप्न में आकर दर्शन दिए तथा रानी के आग्रह पर नगर उंटारी लाने की अनुमति दी।

                                           रानी शिवमणि की फोटो।

उन्होंने स्वप्न में रानी को बताया कि उनकी प्रतिमा कहां पर है। स्वप्न के अनुसार रानी सुबह की लाव लश्कर के साथ करीब 20 किलोमीटर पश्चिम सीमावर्ती उत्तर प्रदेश के दुद्धी थाना क्षेत्र के शिवपहरी नामक पहाड़ी पर पहुंची और स्वयं फावड़ा चलाकर खुदाई कार्य का शुभारंभ किया।

खुदाई में रात्रि में स्वप्न में आए भगवान श्री कृष्ण की वही अद्भुत प्रतिमा प्राप्त हुई। भगवान श्री कृष्ण की प्रतिमा को हाथी से नगर उंटारी लाया गया। नगर गढ़ के सिंह दरवाजे पर हाथी बैठ गया। लाख प्रयत्न के बावजूद हाथी नहीं उठा।

रानी ने राजपुरोहितों से मशविरा कर वहीं पर प्रतिमा रख पूजन कार्य प्रारंभ कराया। प्रतिमा सिर्फ भगवान श्री कृष्ण की थी। इसलिए वाराणसी से श्री राधा रानी की अष्टधातु की प्रतिमा बनवा कर मंगाई गई और उसे भी मंदिर में श्री कृष्ण के साथ स्थापित कराया गया।

इतिहासकार अनुमान लगाते हैं कि यह प्रतिमा मराठों के द्वारा बनवाई गई होगी। जिन्होंने वैष्णव धर्म का काफी प्रचार प्रसार किया था और मूर्तियां भी बनवाई थीं। मुगलों के आक्रमण से बचाने के लिए मराठों ने इस प्रतिमा को शिवपहरी नामक पहाड़ी के अंदर छुपा दिया होगा।

इस मंदिर में वर्ष 1930 के आसपास चोरी भी हुई थी, जिसमें भगवान श्री कृष्ण की बांसुरी और छतरी चोर चुरा कर ले गए थे। चोरी करने वाले चोर अंधे हो गए थे। उन्होंने अपना अपराध स्वीकार कर लिया था। परंतु चोरी की हुई वस्तुएं बरामद नहीं हो पाई।

बाद में राज परिवार ने दोबारा स्वर्ण बांसुरी और छतरी बनवा कर मंदिर में लगवाया। 60 – 70 के दशक में बिरला ग्रुप ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। आज भी श्री बंशीधर की प्रतिमा कला के दृष्टिकोण से अति सुंदर एवं अद्वितीय है। भगवान श्री कृष्ण की प्रतिमा की सबसे बड़ी विशेषता है कि आज तक इस प्रतिमा पर किसी तरह की पॉलिस नहीं की गई है। इसके बावजूद प्रतिमा की चमक धूमिल नहीं हुई है।

कहीं भी पहले मंदिर बनता है इसके बाद देवी-देवताओं की प्रतिमा स्थापित की जाती है। पर यहां पहले भगवान श्री कृष्ण आए, इसके बाद मंदिर का निर्माण हुआ। मंदिर के नाम पर झारखंड सरकार ने शहर का भी नाम श्री बंशीधर नगर कर दिया है, जो यहां के लोगों के लिए गौरव की बात है।


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