July 23, 2024 |

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बेटों के लिए अपनी खुशियों को कुर्बान करने वाले एक दंपत्ती का मार्मिक किस्सा

Sachchi Baten

बच्चों के लिए अपनी खुशी त्यागकर धन संचय करने वालों के लिए सच्ची नसीहत

हमारे बचपन में भी लोग ‘कमाने’ बाहर जाते थे, लेकिन उनकी  पत्नी और बच्चे आमतौर पर  गांव में संयुक्त परिवार में रहते थे। परिवार में कोई आकस्मिक समस्या आ जाय या बर – बीमारी की सूचना मिल जाय तो आदमी यथा शीघ्र गांव वापस आ जाता था। तब परिवार पहले था, कमाई बाद में। हालांकि संयुक्त परिवार के सदस्यों में आपसी खटपट भी खूब रहती थी।
समय बदला। देश की,  लोगों की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ। जरूरतें बढ़ीं। सुख के लिए संसाधन जुटाने की जद्दोजहद शुरू हुई। उन दिनों  ‘बाजार’ रोजमर्रा के जरूरत के सामान बेचता था। अब ‘बाजार’ पहले नये-नये प्रोडक्ट्स लांच करता है, फिर लोगों को उसके फायदे बताता है और लोग बिना जरूरत के ‘मार्केटिंग’ करते हैं। क्यों करते हैं, मालूम नहीं।
संयुक्त परिवार की जगह छोटे परिवार की अवधारणा लोगों को पसंद आने लगी, खासतौर पर पढे-लिखे लोगों के बीच। उसी अनुपात में  लालच  बढता गया, भावनाओं की जगह स्वार्थ हाबी होने लगा। रिश्ते दरकने लगे।
भृगुनाथ सिंह,  अपने माँ बाप की इकलौती औलाद थे। उनके पिता चार भाई थे। चारो का परिवार साथ साथ रहता था। यह परिवार  गांव में  अच्छे व्यवहार के चलते ‘भलेमानुष’  परिवारों  में गिना जाता था। भृगुनाथ सिंह पढ़ने लिखने में जहीन थे। उनके पिताजी ने कोई कंजूसी नहीं की। खूब पढा़या। भृगुनाथ सिंह इंजिनीयर बन गये। अच्छी नौकरी मिल गई। खूब पैसा और नाम कमाया भृगुनाथ सिंह जी ने। गाँव के और रिश्तेदारी के कई युवाओं की उन्होंने नौकरी लगवाई।
लेकिन कमाई बढ़ी तो रुतबा बढ़ा और उसी अनुपात में संयुक्त परिवार में खटपट बढ़ने लगी जो ‘बंटवारा’ कराके दम लिया। भृगुनाथ सिंह जी ने पुस्तैनी मकान छोड़ दिया और अपने लिए   गांव में बड़ा सा मकान बनवाया। कुछ  खेत भी खरीदे। फिर शहर में मकान बनवाया और एक एक कर  कई भूखंड खरीदे। दो बेटे और एक बेटी हुई। भृगुनाथ सिंह ने अपने दोनों बेटों को उच्च शिक्षा दिलवाई।
उन्होंने बेटी को, बेटों की तरह शिक्षा देना जरूरी नहीं समझा। भृगुनाथ सिंह खुद उच्च शिक्षित, उच्च स्तरीय नौकरी, लेकिन मानसिकता बहुत  पुरानी और तथाकथित पारंपरिक। बेटों को उच्च शिक्षा तो दिलाई लेकिन संस्कार वही पुराना और पारंपरिक। उनकी श्रीमती जी अक्सर बेटी को डांटती फटकारती रहती थीं,  बात बात पर नसीहतें देती रहती थीं। बेटी को पराये घर जाना था, इसलिए सारा संस्कार बेटी को ही देना जरूरी था।
बेटों को,  बेटी को दिया जाने वाला  संस्कार देना जरूरी नहीं समझती थीं। भृगुनाथ सिंह जी को भी ऐसा महसूस नहीं होता था कि बेटों को  बेहतर ‘आदमी’ होने की शिक्षा दिया जाना भी जरूरी है। बेटे चाहे जो करें, उनसे कुछ नहीं कहा जाता था। बच्चों की माँ कहती ‘समय’ आने पर खुद सुधर जाएंगे। किसी रिश्तेदार के आने पर बेटों की हजारों बड़कई बतियाते थकती नहीं  थीं श्रीमती भृगुनाथ सिंह।
बेटे बचपन से ही ‘धन’ ही सब कुछ है, पैसों से कुछ भी हासिल किया जा सकता है, जमीन, मकान, गहना गिठो, सब कुछ। ऐसी ही आबो-हवा में बेटे जवान हुए। बड़े बेटे की नौकरी एक MNC में लगी। जल्दी ही वो अमरीका चला गया. छोटे बेटे  की भी अच्छी  नौकरी हो गई।
भृगुनाथ सिंह जी के पांव जमीन पर नहीं पड़ते  थे। जो भी मिलता वो अपने बेटों की प्रशंसा के पुल बांध देते। स्वाभाविक भी था। कोई भी माँ बाप अपने ऐसे बेटों पर नाज करेगा ही। बेटों की शादी के लिए एक से एक धनाढ्य और उच्च शिक्षित परिवारों से रिश्ते आने लगे।  बहुत चुन चान कर दोनों बेटों की शादियां धनी और  शिक्षित परिवारों की शिक्षित लड़कियों से  हुई। खूब दान-दहेज़ मिला। भृगुनाथ सिंह जी और उनकी श्रीमती जी की तो खुशी का ठिकाना ही नहीं था।
लेकिन, बेटी गांव के स्कूल के बाद किसी और बड़े स्कूल या कालेज का मुंह नहीं देख सकी। बेटी की शादी भृगुनाथ सिंह जी ने  एक समृद्ध किसान परिवार में बड़ी धूपधाम से खूब दान –  दहेज देकर कर दी। समय का पहिया धीरे-धीरे सतत आगे बढ़ता रहता है,  ठहरता कहां  है। लोग अपनी समृद्धि और उससे अर्जित संसाधनों की रजाई में मस्ती में आनंदित होते रहते हैं।
सेवानिवृत्ति के बाद, भृगुनाथ सिंह जी अपने गांव के आलीशान मकान में रहने लगे। खाना बनाने से लेकर  घर के सभी काम करने के लिए गांव में कामगारों की कमीं नहीं थी। उनके कई सहपाठी गांव में ही रहते थे। खेतों की ओर सैर करना उन्हें अच्छा लगता था। दोस्तों के साथ ताश खेलने, ठहाके लगाने में दिन कब बीता, पता ही नहीं चलता था।  उनका गांव पक्की सड़क से सटा हुआ था और शहर भी बहुत दूर नहीं था।
लेकिन छोटकी बहू को गांव में रहना अच्छा नहीं लगता था। पहले दबी जुबान  में, फिर खुल्लम-खुल्ला बहस होने लगी। भृगुनाथ सिंह जी की पत्नी बेहद सीधी सादी महिला थीं, फिर भी सेवा काल में लगातार शहर में रहते-रहते उन्हें भी शहर की चकाचौंध रास आ गई थी। बहू की आड़ लेकर उन्होंने एक दिन शहर के मकान में जाकर रहने की चर्चा छेड़ ही दी। शुरू में तो भृगुनाथ सिंह जी ने बात अनसुनी कर दी। लेकिन छोटी बहू ने अपनी सास का कान भरना बंद नहीं किया।
शहर के मकान के ऊपर वाले तल्ले के किरायेदार को हटाया गया और भृगुनाथ सिंह जी सपरिवार शहर में रहने आ गये। छोटा बेटा भी खुश हुआ। अब वो छुट्टियों में दूसरे शहर से रात – बिरात कभी भी शहर के इस मकान में आ सकता था। बड़की बहू को जल्दी ही उसका पति अपने साथ विदेश ले गया।
बड़ी बहू थोड़ी मान मर्यादा वाली थी। अपनी सास का कुछ  ख्याल रखती थी। छोटी बहू ज्यादा चंचल। अकेले बाजार घूमने और जब चाहे सिनेमा देखने चले जाने में उसे कोई बुराई नहीं दिखती थी। उसे इसकी परवाह नहीं थी कि बूढ़े सास-ससुर को समय पर नाश्ता-भोजन देने  की जिम्मेदारी उसकी है।  हालांकि वो गांव की पुराने परम्परागत परिवार की लड़की थी। बूढ़ी सास शुरू शुरू में छोटी बहू की तरफ हो जाती थीं और भोजन खुद ही बना देती थी।
छोटकी बहू ने इस स्थिति का भरपूर फायदा उठाया और भोजन बनाने से अपने आप को  पूरी तरह से अलग कर लिया। धीरे-धीरे छोटी बहू ने ऐसी परिस्थिति उत्पन्न कर दिया कि सास-ससुर एक दिन शहर का मकान छोड़ कर गांव आ गये।
इसी तरह समय बीतने लगा। बड़ा बेटा अमेरिका जाकर एकदम अमेरिकन हो गया। वहां की चकाचौंध भरी जिंदगी रास आने लगी। इसी बीच उसे बेटा हुआ। यहां उसकी माँ ने ‘सत्यनारायण भगवान की कथा’ सुनी और पूरे गांव को भोज दिया।
बार बार बेटे को चिट्ठी लिखवाती कि पोता को लेकर आ जाय ‘शीतलामाई’ के मंदिर पर मुंडन की मनौती मानी हूँ, उतारना जरूरी है। लेकिन बेटे-बहू को लगता था कि फालतू में 10-15 दिन की छुट्टी लेनी होगी, आने-जाने में ‘लाखों’ के वारे-न्यारे हो जाएंगे। बेटा नहीं आया तो नहीं आया।
भृगुनाथ सिंह जी और उनकी श्रीमती जी अपना सा मुंह लेकर रह गयीं। इस बीच छोटका बेटा भी विदेश चला गया। अपनी पत्नी को भी साथ ले गया। छोटकी बहू ने शहर के मकान में रहने वाले तीनों किरायेदारों को अपने बैंक खाता का नंबर दे दी, इस ताकीद के साथ कि मकान किराया पांच तारीख तक खाते में जमा करके रसीद रखें। देर होने पर ब्याज लगेगा।
“जमाने की देखी यारी, बिछड़े सभी बारी-बारी” ढलती उम्र में ‘अकेलापन’ खाने को दौड़ता है। उम्र जनित रोगों की लाइन लग गयी। भृगुनाथ सिंह जी को ‘अल्जाइमर’ का तगड़ा असर हो गया। कंपन पहले हाथों में शुरू हुआ, फिर उसका असर गर्दन में भी दिखाई देने लगा। ‘भूलने’ की जबरदस्त समस्या आ गयी।’बाथरूम’ में गये हैं तो याद ही नहीं है कि ‘प्रक्षालन’ करके बाहर भी निकलना है।
न जाने कितनी चिट्ठियां भेजी गई बेटों के पास,  लेकिन एक का भी जवाब नहीं आया। बेटी क्या करती ? अपने गांव से आ गयी माँ बाप की देखभाल करने। आसाढ़ आ गया। खेतीबारी का समय। इधर माता-पिता की स्थिति संभलने के बजाय और खराब होती गई। अंततः बेटी माता-पिता को अपने साथ अपने गांव लेती गई।
इसके सिवा कोई चारा ही नहीं था। लगभग दो साल यही स्थिति बनी रही। बड़े बेटे को यूएस में ग्रीन कार्ड मिल गया। वो तो पूरा अमेरिकन हो गया। छोटी बहू बीच में भारत आई। पुराने किराएदारों को निकाल बाहर किया। नये किराएदार रखे, नये टर्म कंडीशन पर। गांव के बड़े से बाग को सफाया करवा दिया। उसकी सोच थी कि बाग के फल उसे तो मिलते नहीं। फल दूसरे खांय, यह उसे मंजूर नहीं। भृगुनाथ सिंह जी विरोध करने की स्थिति में नहीं थे। उनकी पत्नी तो छोटकी बहू से बहुत डरती थीं। अपनी ननद के विरोध को वो एक पैसे का भी भाव नहीं देती थी।
परिवार वालों ने दबी जुबान से सास-ससुर के इलाज और सेवा के बाबत सवाल उठाए। लेकिन उसे सुनना कहां था। एक दिन गांव वालों को मालूम पड़ा कि भृगुनाथ सिंह नहीं रहे। परिवार वाले बेटी के गांव गये। भृगुनाथ सिंह की लाश  गांव लाई गई। बेटों को सूचना दी गई। जाड़े के दिन थे। दो दिन इंतजार किया गया। बेटों के आने में बिलंब देख दाह संस्कार कर दिया गया। बेटी का बेटा यानि नाती ने मुखाग्नि दी और ‘दाह’ का लोटा लिया।
तीसरे दिन बेटे आए। आते ही खेती बारी के और बैंक के कागजात दुरुस्त कराने में व्यस्त हो गये। माँ को भरोसा था कि बेटे बहू उसे सहारा देंगे। लेकिन बेटों का व्यवहार देखकर उनका कलेजा फट गया। गोया उन्हें लगा कि जिन बेटों को उन्होंने अपनी कोख में नौ माह रखा। उन्हीं बेटों ने उनकी ‘कोख’ को गाली दी हो। संयोग देखिए कि तीन दिन बाद ही भृगुनाथ सिंह जी की श्रीमती जी भी चल बसीं। बेटों  पर कोई असर नहीं हुआ।
बेटे तो ‘रोबोट’ हो चुके थे। माँ की लाश जलाते समय श्मशान घाट पर ही वहां के ‘ब्राह्मण’ से बातचीत करके 13 दिनों का ‘अंत्येष्टि संस्कार’ ही नहीं, ‘गया जी’ का ‘पिंडदान संस्कार’ भी सम्पन्न करा दिया। गांव आकर तीसरे दिन एक सामूहिक ब्रह्मभोज का आयोजन कर दिया। गांव के बहुत से लोग उसमें हिस्सा नहीं लिए। अगले दिन बेटे शहर वाले मकान पर गये। फिर वापस विदेश।
बेटी को क्या मिला ? मेरे को एक बात नहीं समझ में आ रही है कि जब भृगुनाथ सिंह जी द्वारा कमाई गई करोड़ों की दौलत, उनके काम नहीं आई तो क्या उनके बेटों द्वारा कमाई जा रही दौलत, उनके काम आएगी ? और इन बेटों के बेटे, अपने पिताओं के साथ कैसा व्यवहार करेंगे ?
शायद ऐसी ही परिस्थितियों के लिए कहा गया है –
पूत सपूत त का धन संचों, पूत कपूत त का धन संचों”
-श्रीपति सिंह एम फार्म (बीएचयू)
लोढ़वां, जमालपुर, मिर्जापुर.

Sachchi Baten

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