July 24, 2024 |

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मणिपुर की मीराबाई चानू बनना चाहती हैं शाहजहांपुर की ये बेटियां

Sachchi Baten

पत्थरों को पाइप में बांधकर उठाकर भारोत्तोलक बन गईं, अब अन्य को भी सिखा रहीं ये गुर

एक सफाईकर्मी की बेटियों ने कायम की मिसाल, जीती हैं राज्यस्तरीय 6 गोल्ड मेडल

राजीव शर्मा, शाहजहांपुर (उत्तर प्रदेश)। उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले में रहने वाली दो बेटियां पत्थरों को पाइप में बांधकर वजन उठाकर वेटलिफ्टर बन गई और प्रदेश स्तर के छह स्वर्ण पदक जीत चुकी हैं। अब गांव की बेटियों तथा बेटों को भी वेटलिफ्टर बना रही हैं।

शाहजहांपुर जिले के सिधौली ब्लाक अंतर्गत महाऊ दुर्ग गांव में रहने वाले अजय पाल वर्मा सरकारी कर्मचारी के तौर पर सफाई कर्मी हैं। वह 1998 में राष्ट्रीय स्तर के वेट लिफ्टर रहे हैं। इन्होंने वेट लिफ्टिंग की शुरुआत पाइप में पत्थरों को बांधकर उठाने से की थी। बाद में शहर के हथौड़ा स्टेडियम में इन्हें इसी विधा के गुरु मिले। इससे सीखकर आगे बढ़ गए। इसके बाद इन्होंने अपनी बेटियों को भी गरीबी में यह विद्या सिखाई।

अजय पाल वर्मा ने बताया कि उनके पास मात्र नाम की खेती है, परंतु वेटलिफ्टिंग की इस विधा को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने शुरुआत अपनी बेटियों से ही की है। वही पुराने ढर्रे पर पाइप में पत्थरों को बांधकर वजन उठाना सिखाया। बाद में नौकरी लग जाने के बाद लोहे की प्लेट लाकर पूरा सिस्टम बना दिया। अब उनके द्वारा शुरू गई की गई इस विधा को उनकी बेटी निकिता (17) तथा रोली (15) आगे बढ़ा रही हैं।

वर्मा अपनी तनख्वाह का आधा पैसा बच्चों के प्रशिक्षण में ही प्रतिमाह खर्च कर देते हैं। इनकी बेटी रोली कक्षा 11 तथा निकिता स्नातक में पढ़ रही है। रोली वर्मा ने बताया कि वह अब इतना अभ्यस्त हो गई है कि 110 किलो वजन उठा लेती है। जबकि उसकी बड़ी बहन निकिता 80 किलो वजन ही उठा पाती है। वह बताती है कि पापा के सपने पूरे करने के लिए तथा मजबूत बनने के लिए उसने हाड़तोड़ मेहनत की और राज्यस्तरीय 6 स्वर्ण पदक जीत चुकी है।

वह बताती है कि वह लखनऊ, नोएडा, बनारस, सहारनपुर, इंदौर तथा आगरा “खेलो इंडिया यूथ” के तहत प्रतियोगिता में जा चुकी है, जहां से उसे यह मेडल मिले हैं। रोली का कहना है कि उसके पापा अजय पाल वर्मा उसका साथ देते हैं, परंतु अब लगभग एक दर्जन लड़कियां उसके गांव की तथा अन्य गांव की हैं एवं लगभग दो दर्जन लड़के भी वेट लिफ्टिंग उसके पास सीख रहे हैं ।वह किसी से भी प्रशिक्षण का कोई पैसा नहीं लेती है। 2 घंटे सुबह तथा शाम को 3 घंटे नियमित लोगों को प्रशिक्षित करती है।

वह बताती है कि वह अपने पापा का सपना जरूर पूरा करेगी और “मीराबाई चानू” की तरह एक बार अपने जिले का नाम रौशन करेगी।  उसे इस बात का मलाल है कि वह खुद 6 गोल्ड मेडल जीत चुकी है। उसके द्वारा प्रशिक्षित लड़कियां भी 3 से 5 मेडल जीत कर लायी हैं, परंतु जिले के किसी भी प्रशासनिक अधिकारी ने उनकी खैर खबर नहीं ली।

रोली के पास प्रशिक्षण देने के लिए कोई जगह नहीं है। ऐसे में गांव से एक किलोमीटर दूर एक विद्यालय में ही उसने अपना ठिकाना बनाया है। वहां वह प्रशिक्षण तथा अभ्यास का कार्य कराती है।

 


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