July 24, 2024 |

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बहुजन बाजार के ये ब्राह्मण…

Sachchi Baten

 

दलित मुद्दों के छद्म ठेकेदारों को बहुजन मूवमेंट का ब्राह्मण घोषित कर देना चाहिए- दुर्गेश कुमार

 

कभी कभी ऐसा लगता है कि दलित मुद्दों के छद्म ठेकेदारों को बहुजन मूवमेंट का ब्राह्मण घोषित कर देना चाहिए। क्योंकि दलित मसले पर आप इन ठेकेदारों के प्रतिकूल बोले तो आपको मनुवादी घोषित कर दिया जाएगा। ऐसे लोगों के लिए बहुजन बाजार हो गया है और ये इस बाजार के ब्राह्मण हो गए है। बात बेबात पर ये ऐसे विक्टिम कार्ड खेलते हैं, जैसे ब्राह्मण प्रतिकूल बात कहने पर धर्मद्रोही कह देते हैं।
विडंबना यह है कि दलित समाज की आर्थिक, सामाजिक स्थिति पर चर्चा करने की जगह ये ब्राम्हणवाद का विपरीत ध्रुव स्थापित करने के लिए होड़ कर रहे हैं। ऐसे ठेकेदार जब भी अपनी ठेकेदारी का बखान करते हैं तो बाबा साहब को दलित समाज का शंकराचार्य बनाते हुए दिखते हैं और दलितों के लिए काम करने वाले बाकी लोगों को दरकिनार कर निकल जाते है। ये भारत का संविधान की जगह “बाबा साहब का दिया हुआ संविधान” शब्द  का प्रयोग ऐसे करते हैं, जैसे संविधान के निर्माण में और किसी का योगदान ही न हो। इन्हीं कारणों से लगता है कि बाबा साहब के नाम पर ये ब्राम्हणवाद का विपरीत ध्रुव तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं, जिसकी आलोचना पाप माना जाएगा।
बाबा साहब के विचारों पर ये कितना अमल करते हैं, इसे भी देखा जाना चाहिए। दलितों के अंदर ही कई जातियां हैं, इन जातियों के अंदर ब्राम्हणवाद की छाप है। यानि कि रविदास, पासवान समुदाय के लोगों का मेहतर, डोम के प्रति जो भेदभाव की मानसिकता है, उसे ही खत्म  करने की कवायद करते तो बात होती। बाबा साहब ने आचरण के संबंध में जो कहा था, उसे तो पूरा करना ही मुश्किल है। लेकिन दलित समाज के भीतर की इन बातों पर शायद ही कभी चर्चा होती है।
मनोज अभिज्ञान जी ने लिखा है कि बाबा साहब यदि 22 प्रतिज्ञाओं में से कम भी रखते तो ठीक रहता। यह व्यावहारिक नहीं है। लेकिन यही बात कोई मंच से कह दे तो इन छद्म ठेकेदारों को हाय तौबा मचाते आप देख लेंगे। इस देश में बुद्ध, गांधी, अंबेडकर, परशुराम सबकी आलोचना हो सकती है, किंतु कई लोगों की भावनाएं आहत हो जाती हैं। ऐसा लगता है कि ये हिंदू पाकिस्तान में जीना चाहते हैं। क्या हर बात में दलित कार्ड का इस्तेमाल करने की अगली तस्वीर कुछ यूं ही होगी। चूंकि ऐसा कई बार देखा गया है कि किसी दलित समाज में जन्मे व्यक्ति बड़े ओहदे पर जाते ही दलित समाज से कट जाता है, किंतु समय आने पर वह दलित होने का सहारा अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए लेता है।
हम गांव में रहते हैं। ओबीसी, दलित सामान्यतः एक जैसे रहते हैं। किंतु शायद ही कभी दलित को दलित होने के कारण अपमानित होना पड़ता है। यह अलग बात है कि झगड़ा हुआ तो एक दूसरे ने अलट पलट कर जाति को गाली दी। किंतु यह दलित अत्याचार का मामला नहीं हुआ। दलित समाज के किसी व्यक्ति को यदि उसकी जाति को नीचा दिखाने की वजह से जातिसूचक गाली दी जाए तो मामला बनता है। किंतु समाज से ज्यादा राजनीति में दलित कार्ड खेला जाता रहा है। दलित शब्द का प्रयोग भीड़ का भावनात्मक दोहन के लिए किया जा रहा है।
प्रोटेक्शन, अधिकार के लिए जिन शब्दों का इस्तेमाल किया जाता था, वो टर्म राजनीतिक प्रयोग के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। यह गलत है। यदि कोई कार्यकर्ता दलित समाज के लिए समर्पण के साथ काम करता है तो उसके मुंह से शोभा देता है। किंतु जिसने सिर्फ निजी अर्जन के लिए किया है उसका क्या। अब बहुजन आंदोलन से उभरी बहुजन समाज पार्टी कांशीराम के बाद मनुवाद के रसातल में गिरी तो किसी दलित ठेकेदार की आवाज नहीं सुनाई दी। किंतु इन्हें ओबीसी नेताओं को मनुवादी कहने में सुख की अनुभूति होती है।
बहुजन हिताय बहुजन सुखाय से सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय का नारा मायावती ने बदल दिया तो इसे मनुवाद की पराकाष्ठा नही तो और क्या करेंगे? तिलक तराजू और तलवार, उसको मारो जूते चार… के नारे से हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है… का साष्टांग दंडवत मायावती ने किया तो इसे क्या कहेंगे?
उत्तर प्रदेश में बीजेपी के साथ मिल कर सरकार बनाई तो बहुजन के लिए कौन सा काम किया? यदि मायावती ने कुछ काम किया होता तो उत्तर प्रदेश में अति पिछड़े वर्ग का वर्गीकरण हो गया होता। किंतु मायावती ने बहुजन के नाम पर दलित का तुष्टिकरण ही किया। उन्होंने कौन सी ऐसी पॉलिसी बनाई जिसे याद रखा जाना चाहिए? छद्म ठेकेदारों को बताना चाहिए कि यदि बहुजन के प्रति इतने ही हार्डकोर हो तो सतीश मिश्रा किस हैसियत से बीएसपी में दो नंबर बना हुआ है? ये यह भूल जाते हैं कि बिहार में बिना अंबेडकर के विचारों के दलितों का आंदोलन भी हुआ, अधिकार भी मिला है।
बिहार में यदि कर्पूरी ठाकुर ने हरिजनों के लिए हथियार देने का ऐलान किया और मास्टर जगदीश ने सामंती व्यवस्था के खिलाफ हरिजिस्तान की मांग की। कई दशक तक हिंसक संघर्ष हुआ तो न कोई बाबा साहब और न ही कोई कांशीराम का योगदान था।  ये लोग ओबीसी थे। दलित समाज के लोग भी शामिल थे। किंतु चूंकि सबका नाम लेने से दलित समाज का भावनात्मक दोहन नहीं होगा, इसलिए ये सिर्फ बाबा साहब का ही रट्टा मारते हैं। इतने भी बेगैरत क्यों हो जाते हो दोस्त?
(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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