July 24, 2024 |

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लोकसभा चुनाव में अब कोई चार्म नहीं बचा

Sachchi Baten

विपक्ष की हताशा ने इसे और भी नीरस और उबाऊ बना दिया !

-जयराम शुक्ल

चुनावी इतिहास में किसी भी राजनीतिक दल में ऐसी हताशा हर कोई पहली बार देख सुन रहा है। इंदौर के अक्षयकांति बम का धमाका खजुराहो और सूरत से एक कदम आगे का है। प्रत्याशी जाकर नामांकन खींच ले और प्रतिद्वंद्वी दल के पाले में जा बैठे, इसकी कल्पना बिरले ही की जा सकती है। उसके बाद का मामला रामनिवास रावत का है। छह बार के विधायक व पूर्व मंत्री रावत कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष थे, मंगलवार को भाजपा में शामिल हो गए। रावत मध्यप्रदेश में प्रथम श्रेणी के कांग्रेस नेता थे व नेता प्रतिपक्ष पद की रेस में भी शामिल रहे।
हम लोग बचपन में कबड्डी का मुकाबला देखते थे। मजबूत टीम की आक्रामक रेड और कैच से डरकर कई बार सामने की टीम के खिलाड़ी स्वयं फाउल या रेड डालने वाले को टच करके आऊट हो जाते। प्रायः ऐसा तब होता है जब कैप्टन कमजोर और दिशाहीन होता है। उसमें न मैदान में जान सटा देने वाले खिलाड़ियों के चयन की समझ होती और न ही रणनीति का कोई खाका। राहुल गांधी ऐसे ही कैप्टन के रूप में सामने दिख रहे हैं।
अभी दो चरण के मतदान हुए हैं। मध्यप्रदेश में दो चरण के चुनाव अभी शेष बचे हैं, जबकि देश के अन्य हिस्सों में पांच चरणों में मतदान बाकी है। आखिरी चरण 1 जून को है, परिणाम 4 जून को आने हैं।
26 अप्रैल को लोकसभा चुनावों के दूसरे चरण के लिए हुए 13 राज्यों की 88 सीटों पर 16 करोड़ वोटरों ने अपने मतदान का प्रयोग किया। वर्ष 2019 के मुक़ाबले इन सीटों पर वोटिंग में तीन फ़ीसदी की गिरावट दर्ज की गई। हालांकि 19 अप्रैल को हुए पहले चरण के मतदान के मुक़ाबले ये 4.5 फ़ीसदी कम था।
चुनाव आयोग के अनुसार दूसरे चरण में 66.7 फ़ीसदी तक वोटिंग हुई थी. इसे लेकर अब तक आयोग ने कोई स्पष्ट कारण नहीं दिया है। साल 2019 में इनमें से 83 सीटों पर 69.64 फ़ीसदी वोटिंग (असम की पांच सीटों पर परिसीमन के कारण उन्हें नहीं गिना गया है) हुई थी।
पहले चरण में 102 सीटों पर मतदान हुआ था जिसमें वोटर टर्नआउट 65.5 फ़ीसदी था। साल 2019 में इन सीटों पर 70 फ़ीसदी मतदान हुआ था।
दूसरे चरण में मध्य प्रदेश की छह सीटों पर मतदान हुआ जिसमें 58.59 फ़ीसदी वोटिंग हुई। ये पहले के मुक़ाबले 9.41 फ़ीसदी कम था। मध्यप्रदेश में पहले चरण की छह सीटों में 66.44 प्रतिशत वोटिंग हुई थी जो पिछले चुनाव से 8.79 प्रतिशत कम थी। 2019 के लोकसभा चुनाव में इन सीटों में लगभग 75.23 प्रतिशत वोटिंग हुई थी।
2019 के चुनाव में विपक्ष खासतौर पर कांग्रेस ने रफेल लड़ाकू विमान में घोटाले का मुद्दा उठाया था। और नरेन्द्र मोदी को लेकर एक नारा दिया ‘चौकीदार चोर है’। तो उसके जवाब में जनता सामने आ गई। उसने मोदी का पक्ष लेते हुए आवाज बुलंद की कि ‘मैं भी चौकीदार’ और वह चुनाव इतना गरम हुआ कि मतदाताओं ने मतदान का रिकॉर्ड ही रच दिया। इस दृष्टि से 2019 का चुनाव सामान्य नहीं था।
2024 जैसे नीरस और उबाऊ चुनाव से शायद ही पहले वास्ता पड़ा हो। विपक्ष इन्डी गठबंधन के नाम पर चुनाव लड़ रहा है लेकिन इस गठबंधन का नेता कौन? अभी तक स्पष्ट नहीं। इस पर मजाक भी चल रहा कि बाय द वे यदि सरकार बनी भी तो गठबंधन के हर दलों के नेताओं को बारी-बारी से प्रधानमंत्री पद दिया जाएगा।
समाजवादी नेता रघु ठाकुर कहते कि- ऐसा पहली बार हो रहा है जब विपक्षी गठबंधन का कोई न्यूनतम साझा कार्यक्रम नहीं। एक ही मुद्दे पर सभी की दिशा अलग अलग है। सबके अपने-अपने घोषणा पत्र हैं जो एक दूसरे के विरोधाभासी हैं।
गठबंधन दो तरह से बनते आए हैं चुनाव से पहले और चुनाव के बाद। चुनाव से पहले- ऐसे गठबंधनों में सभी विपक्षी दल एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम के साथ चुनाव लड़ते हैं। इस साझे नेतृत्व में भी एक बड़ा चेहरा होता रहा है।
1977 में जयप्रकाश नारायण का चेहरा जनता के सामने था तो 1989 में वीपी सिंह का। एनडीए ने तीन चुनाव अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व में लड़ा तो पिछले तीन चुनावों से नरेन्द्र मोदी प्रमुख चेहरे हैं।
इधर इन्डी गठबंधन में कोई सर्वमान्य चेहरा नहीं। कांग्रेस और राहुल गांधी को पश्चिम बंगाल में टीएमसी की ममता बनर्जी नकार चुकी हैं। महाराष्ट्र में भी नेता के तौर पर राहुल की स्वीकार्यता नहीं। यूपी में ये समाजवादी पार्टी के लघु साझेदार हैं। तीन राज्यों राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में कांग्रेस का सीधे मुकाबला भाजपा से हैं और ले देकर यहीं राहुल गांधी अपना राजनीतिक कौशल दिखा रहे हैं। जिसका परिणाम यह कि कांग्रेस के नेताओं, कार्यकर्ताओं की बात क्या करें प्रत्याशी तक चुनाव मैदान छोड़कर भाजपा में शामिल होते जा रहे हैं।
जनता अभी तक समझ नहीं पा रही कि कांग्रेस कौन से मुद्दे लेकर चुनाव मैदान में हैं। कभी वे जातीय जनगणना की बात करते हैं तो कभी भारतीय नागरिकों के संपत्ति के सर्वेक्षण की। अभी एक और वायदा सुना कि हर महीने महिलाओं को 8700 रुपए मिलेंगे।
उनके एक नेता सैम पित्रोदा ने नया विचार ही दे दिया विरासत टैक्स का। यानी कि ज़िन्दगी भर की कमाई की पचपन प्रतिशत टैक्स सरकार लेगी। राहुल के बयान किताबी नोट्स के आधार पर आ रहे हैं इसलिए उनके तथाकथित न्याय पत्र से कभी जिन्ना झांकने लगते हैं तो कभी माओ स्ते तुंग।
राहुल गांधी के विचारों से कांग्रेस के नेता ही सबसे ज्यादा भ्रमित लगते हैं। हमने मध्यप्रदेश में देखा कि लोकसभा चुनाव की घोषणा के समानांतर यहां के कांग्रेस नेताओं की समानांतर घोषणाएं होने लगीं कि वे लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ेंगे। हताशा की स्थिति यह बनी कि कांग्रेस ने कहीं बिल्डर या भू माफिया को चुनाव में उतार दिया तो कहीं शराब कारोबारी को। जाहिर है दो नंबर के कामों में बिंधे ऐसे प्रत्याशी नैतिक तौर पर ज्यादा नहीं टिक पा रहे। परिणामस्वरूप एक एक करके कांग्रेस छोड़कर दूसरे पाले में जाने का सिलसिला जारी है। निष्ठावान कार्यकर्ता किंकर्तव्यविमूढ़ है।
इधर नरेन्द्र मोदी और एनडीए को लेकर वोटर स्पष्ट हैं। उसने अनुच्छेद 370 को तिरोहित होते देखा और रामलीला की भव्य प्राण-प्रतिष्ठा होते भी। वैश्विक स्तर पर भारत के नेतृत्व को मान्यता मिलने लगी। यूपीए शासनकाल में जहां पड़ोसी देश कभी भी कैसे भी सीमापार चढ़ आते थे अब उन्हें माकूल जवाब मिलने लगा। माकूल जवाब ही नहीं उनके घर के भीतर घुसकर प्रहार होने लगा। इन सबकी चर्चा गली चौराहों पर आम लोग भी करते मिल जाएंगे।
अब असल सवाल यह कि इतना सबकुछ है तो मतदान में गिरावट का ट्रैंड क्यों और कैसे? हमें पहले यह समझना होगा कि लोकसभा में मतदान का औसत ट्रेन्ड पचपन से पैंसठ प्रतिशत के बीच का ही रहता आया है। चूंकि 2019 के चुनाव में भाजपा के पक्ष में आक्रामक वोटिंग हुई थी लिहाजा इस चुनाव के लिए वहीं बेंचमार्क बन गया और उसकी तुलना में वोटिंग की गिरावट दिखने लगी।
लोकसभा के वोटिंग का ट्रेंड विधानसभा से हमेशा ही अलग होता आया है और विधानसभा का स्थानीय निकायों के चुनावों में। इस प्रक्रिया में हम जितने निचले स्तर तक पहुंचते हैं वोटिंग की इन्टेसिटी उसी अंदाज से बढ़ती जाती है।
यह विशेषज्ञ भी मानते हैं कि जब चुनाव में मुकाबला नहीं रह जाता तो वोटिंग प्रतिशत ऐसे ही घटता है। वोटरों को अमूमन यह आभास हो जाता है कि सरकार किसकी बनने जा रही है तो वोटर्स की उत्तेजना जाती रहती है। इन सब का असर कार्यकर्ताओं पर भी उसी के सापेक्ष पड़ता है।
खजुराहो के वोटिंग ट्रेन्ड को सामने रखें तो पता चलेगा कि मुकाबले में मैदान खाली होने के बावजूद भी भाजपा के कार्यकर्ता सक्रिय रहे और औसत वोटिंग हुई। जबकि उम्मीद यह की जा रही थी कि सबसे कम वोटिंग यहीं होगी।
पहले चरण में सबसे कम वोटिंग सीधी और दूसरे चरण में रीवा में हुई है। यह दोनों क्षेत्र राजनीतिक तौर पर चेतना संपन्न माने जाते रहे हैं। सीधी तो वह क्षेत्र है जहां से 1952 के विधानसभा और लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की धुर्रियां उड़ गई थीं समाजवादी जीतकर आए थे। हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में महिलाओं ने इन दोनों जिलों में वोटिंग का कीर्तिमान रचा था। अब यदि इस चुनाव में वोट घर से निकलकर बूथ तक नहीं पहुंचे तो उसकी वजह यही मान सकते हैं कि वे इस चुनाव को मुकाबले में देखते ही नहीं और विधानसभा चुनाव में जिसतरह लाड़ली बहना फैक्टर ने विशाल महिला वर्ग को उत्साहित किया इसबार ऐसा कोई फैक्टर नहीं था।
सीधी और रीवा पारंपरिक क्षेत्र हैं और यहां जीवन के श्रेष्ठ अवसरों में मांगलिक अवसर होते हैं। मतदान की तारीखों के दिन लगन भी चरम पर थी। अब जहां तक रहा जीत-हार प्रश्न तो पहाड़ से जब कोई नीचे उतरता है तो हारते हुए दिखता है और चढ़ने वाला जीतते हुए, यह हमारा सहज मनोवैज्ञानिक आंकलन है। पर वास्तव में ऐसा होता नहीं। जो तीन लाख से जीता मान लो दो ढाई लाख घट भी गया तो जीत के सर्टिफिकेट में क्या फर्क पड़ता है।
वैसे मेरा अनुमान है कि जीत के अंतर का प्रतिशत वहीं रहने वाला है जो पिछले मर्तबे था। कमोबेश यही सब उन अन्य सीटों के साथ भी जुड़ा है जहां की वोटिंग की गिरावट को लेकर प्रेक्षक चिंतित हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं तथा मध्य प्रदेश के रीवा में रहते हैं।)

Sachchi Baten

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