July 19, 2024 |

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मानव सभ्यता के विकास के दस्तावेज हैं मिर्जापुर की पहाड़ियों की गुफाओं में

Sachchi Baten

रॉक पेंटिंग्स ऑफ मिर्जापुर इन उत्तर प्रदेश Rock Paintings of Mirzapur in Uttar Pradesh

मिर्जापुर की पहचान आध्यात्मिकता से ही नहीं, अपितु विपुल ऐतिहासिक संपदा के लिए भी है

-शैल चित्र बताते हैं मानव विकास की क्रमबद्ध हकीकत को

-समय के साथ अवसान होते ऐतिहासिक धरोहरों को बचाने की जरूरत

 

प्रो. इंदुभूषण द्विवेदी

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अरण्य संकुल विंध्य पर्वत शृंखला के अंक में अवस्थित मिर्जापुर जनपद अपनी पुरातात्विक संपदा के लिए विख्यात रहा है, जब मानव ने बेलन घाटी में सर्वप्रथम सभ्यता के प्रथम अध्याय को अंगीकृत किया। इस जनपद के दक्षिणांचल में स्थित विंध्य पर्वत शृंखला की गुहाओं एवं सरित उपत्यकाओं में प्रागैतिहासिक मानव द्वारा निर्मित एवं प्रयुक्त विभिन्न पाषाणीय उपकरण एवं शिलाश्रयों में विभिन्न कल्पनाओं तथा जीवंत अनुभवों की गैरिक रेखीय ऊकेरिया ने सन 1837 ई. के आसपास से ही पुरातत्वविदों का ध्यान आकर्षित करना प्रारंभ कर दिया था ।

यह जनपद अपनी आध्यात्मिकता के लिए ही नहीं, अपितु विपुल ऐतिहासिक संपदा के लिए भी जाना जाता रहा है । जहां एक ओर मानव को आध्यात्मिक शक्ति की पराकाष्ठा यहां अनायास ही प्राप्त हो जाती है , वहीं दूसरी ओर यायावर बनकर वह स्वयंमेव जिज्ञासा बस नवीन तथ्यों की खोज में संलग्न हो जाता है ।

यद्यपि कतिपय विद्वानों के द्वारा तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालय के तत्वावधान में सर्वप्रथम बेलन घाटी के उत्खनन के साथ कुछ महत्वपूर्ण तथ्य अवश्य ऐतिहासिक स्रोतों की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करते हैं। तथापि संप्रति पुनः इस जनपद के गहन शोध – सर्वेक्षण की आवश्यकता है, जिससे वह अनगिनत तथ्य प्रकाशित किए जा सकें, जो आज भी अप्रकाशित एवं अज्ञात हैं ।

मिर्जापुर जनपद में कला के अनेकशः उदाहरण आज भी विद्यमान हैं, यहां शैव, वैष्णव, शाक्त संस्कृतियों के अलावा बौद्ध संस्कृति के भी भग्नावशेष उपलब्ध होते हैं । यह जनपद शैल चित्रकला के लिए भी विख्यात रहा है। 1880 ई. से 1899 के मध्य में कार्लाइल एवं जे. काकबर्न ने मिर्जापुर जिले में स्थित शैल चित्रों का अन्वेषण कर उसे प्रकाशित भी किया था।

1932 ईस्वी में मनोरंजन घोष ने ‘रॉक पेंटिंग्स एंड अदर एंटीक्विटीज ऑफ प्रीहिस्टोरिक एंड लेटर टाइम्स ’ नामक पुस्तक में विस्तार से शैल चित्रों का अध्ययन कर विवरण प्रस्तुत किया है। अनेक पुरातत्वविदों ने भारतीय चित्र का कलात्मक दृष्टि से क्रमबद्ध एवं सुव्यवस्थित अध्ययन प्रस्तुत किया है, जिसके परिणाम स्वरूप शैलचित्र कला से संबंधित हमें महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है । उल्लेखनीय है कि कार्लाइल एवं जे. काकबर्न के द्वारा मिर्जापुर के शैलचित्रों का जो वर्णन प्रस्तुत किया गया है उनमें मेरे द्वारा खोजे गए चित्रों का विवरण उल्लिखित नहीं है।

जनपद मुख्यालय से लगभग 70 किमी दूर ड्रमंडगंज से आगे ‘मड़वा धनावल ’नामक ग्राम के समीप कैमूर पर्वत शृंखला जो अरण्य संकुल होने के साथ-साथ हिंसक पशुओं से भी आच्छादित है, से एक नवीन भित्ति चित्र प्राप्त हुआ है, जिसे वहां के लोग ‘सीता कोहबर’ के नाम से जानते हैं। यद्यपि कोहबर के अनेक शृंखलाबद्ध चित्र प्राप्त हुए हैं, जिनका उल्लेख विद्वानों के द्वारा किया गया । परंतु यह भित्तिचित्र एक नवीन पुरातात्विक एवं ऐतिहासिक संदर्भ को प्रस्तुत करता है ।

यह जमीन से संभवत: एक किमी ऊपर गुफा में स्थित है, जो काल प्रवाह के कारण ध्वस्त होने से मानव निर्मित भित्ति चित्र दिखाई पड़ रहा है । प्रस्तुत भित्ति चित्र में आकृतियां स्पष्ट दिखाई पड़ रही हैं । उल्लेखनीय है कि प्रारंभिक मानव ने गेरुए तथा भूरे रंग का प्रयोग इन भित्ति चित्रों के निर्माण में किया है । ऐसा प्रतीत होता है कि मानव द्वारा वनस्पतियों के रस को निकाल कर बांस अथवा किसी मुलायम लकड़ी का ब्रश अथवा तूलिका बनाकर गुफाओं की दीवारों पर अपनी जीवन गाथा को अनुभवों के द्वारा चित्रित किया गया है ।

इस भित्तिचित्र में पशुपालन का दृश्य अंकित प्रतीत होता है । यहां पर विभिन्न पशुओं की आकृतियों का अंकन है यथा – गाय, भैंस‚ भेंड़‚ बकरी इत्यादि। इस भित्तिचित्र में मानव के द्वारा गाय, भैंस से दूध निकालते हुए प्रदर्शित किया गया है । बछड़ा भी गाय के समीप बांधा गया है । एक आकृति में मनुष्य को सिर पर गट्ठर रखे हुए प्रदर्शित किया गया है । ऐसा प्रतीत होता है कि वह पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था कर रहा है ।

मड़वा धनवाल का तात्पर्य मड़वा =छप्पर धन से धेनु तथा अवल से अवलि प्रतीत होता है । संभवतः एक ऐसे स्थल का द्योतक, जहां पर स्थाई रूप से पशु रहा करते थे । इस भित्ति चित्र की संपूर्ण रूपरेखा मानव की पशुचरी अवस्था का द्योतक है, जो आज भी शोध का विषय है । यद्यपि उत्तर पूर्व पाषाण कालीन मानव की विकास यात्रा का यह एक महत्वपूर्ण अध्याय रहा है । मनुष्य के तत्कालीन सौंदर्य बोध तथा सृजनात्मक का आभास हमें 1875 ईस्वी में प्राप्त अल्टीमीरा (उत्तरी स्पेन) के प्रसिद्ध भित्ति चित्रों में देखने को मिलता है।

उल्लेखनीय है कि उच्च पूरापद कालीन मानव ने जंगली जीवन यापन करते हुए कला के क्षेत्र में जो उल्लेखनीय कार्य किया है, वह आश्चर्यजनक है । दक्षिणी पश्चिमी यूरोप के क्षेत्र, फ्रांस तथा स्पेन में ऐसी अनेक गुफाएं तथा शिलाश्रय स्थित हैं, जिनमें कुछ गुफाओं की दीवारों पर चित्र प्राप्त होते हैं। भित्ति चित्रों में मानव ने प्राय: उन जंगली पशुओं का चित्रण किया है, जिसका आखेट वह पाषाण काल में करता था । ऐसा प्रतीत होता है कि उत्तर पूर्व पाषाण कालीन मानव ने इन पशुओं के महत्व को समझा होगा तथा पशुपालन की ओर अपना ध्यान केंद्रित किया होगा ।

यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि चित्रकला की विषय वस्तु उच्च पुरापाषाण काल , मध्य पाषाण काल तथा नव पाषाण काल के मानव की जीवन शैली से अत्यधिक साम्य रखती है । प्रस्तुत भित्ति चित्र नवपाषाण कालीन प्रतीत होता है ।

मिर्जापुर से 28 किमी दूर मड़िहान तहसील के बहुती ग्राम के तेलियामान नामक गुफा से कतिपय नवीन भित्ति चित्र प्राप्त हुए हैं, जो अपनी प्राचीनता को स्वयं में ही आत्मसात किए हुए हैं । इस भित्ति चित्र में चार पशु आकृतियां स्पष्ट रूप से चित्रित हैं, जो अश्व अथवा खच्चर जैसे दिखाई पड़ते हैं । इसके अतिरिक्त इक्का गाड़ी अथवा बैलगाड़ी का चित्रण , मानव के द्वारा कृषि कार्य में संलग्न होने जैसा प्रतीत होता है। एक अन्य स्थल पर बारहसिंहे जैसी आकृति है। एक मानवाकृति के सामने वृक्ष चित्रित है, जो वृक्ष पूजा को दर्शाता है । यदि इन आकृतियों को प्रमाणित किया जा सका तो यह मानव के कृषि परक अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर होने के संकेत को उपस्थित करते हैं । चूंकि मानव की गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र गंगा घाटी का ही क्षेत्र रहा है , इसलिए संभव है कि यह चित्रांकन उसके उत्पादन के साथ-साथ व्यापारिक क्रियाकलापों का सूचक हो ।

विंध्य उपत्यका में मुख्यालय से 15 किमी दूर ‘ मदनपुरा ’ नामक ग्राम से एक भित्ति चित्र प्राप्त हुआ है, जो मानव द्वारा परंपरागत ढंग से आखेट को दर्शाता है । यह क्षेत्र बरकछा की पहाड़ी के नाम से भी जाना जाता है। इस शैल चित्र में मानव के द्वारा पशुओं के आखेट का चित्रण है । प्रस्तुत चित्रांकन में विभिन्न मानव कृतियां दृष्टिगत हो रही हैं तथा एक लंबा मनुष्य भाषा अथवा मंत्र शक्ति के आधार पर एक विशालकाय पशु हाथी अथवा गैंडे को नियंत्रित कर रहा है तथा शेष शिकार की मुद्रा में प्रदर्शित किए गए हैं । यदि इस भित्ति चित्र का ऐतिहासिक विश्लेषण किया जाए तो ऐसा प्रतीत होता है कि यह नव पाषाणकाल के पहले की मानव की गतिविधियों का सूचक है । जब मानव अपने उदर की पूर्ति के लिए इन्हीं जंगली पशुओं पर निर्भर था । कालांतर में इन्हीं पशुओं के महत्व को समझ कर वह पशुपालक हुआ। प्रोफेसर गोवर्धन राय शर्मा ने इस संस्कृति को ‘विंध्य – गांगेय ’ संस्कृति का नाम दिया है । प्रोफेसर शर्मा के अनुसार इस संस्कृति का उदय मनुष्य की यायावरी अवस्था से आखेटक तक तथा आखेटक से कृषक वृत्ति की ओर संक्रमण का एक अनुपम अध्याय के रूप में हुआ है।

इस जनपद के अन्य अनेक स्थल हैं, जहां पर मानव ने अपने अनुभवों को तूलिका के माध्यम से व्यक्त करने का सफल प्रयास किया है । लेखनिया दरी, चूना दरी, सिद्धनाथ की दरी, अलोपी दरी, भैसोड़ पहाड़,  हड़हिया पहाड़ी जैसे अनगिनत स्थलों पर मानव के आदिम अवस्था से लेकर ऐतिहासिक काल तक के चित्रण स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं। प्रश्न उठता है कि – क्या मानव आदम अवस्था में असभ्य था ? वह गुफाओं में रहता था । जानवरों का शिकार भी करता था तथा उनकाे चित्रित भी करता था । क्योंकि वह प्रकृति प्रेमी था । इसका एक समाज था । उसकी एक जीवन शैली थी ।

सामान्यतः यह स्वीकार किया जाता है कि मानव आदिम अवस्था में असभ्य था । वह शनै: शनै: सभ्यता की ओर अग्रसर हुआ, किंतु इन चित्रों को देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि उस युग में भी वह सभ्य सुसंस्कृत था । उसे रंगों का परिज्ञान था तथा उसमें भी सौंदर्य भावना थी ।  उसकी भी एक सामाजिक व्यवस्था थी । अंतर केवल इतना था कि वह नंग-धड़ंग गुफाओं में रहता था । उसकी आवश्यकता बहुत कम थी। इसलिए वह निश्छल था। वह गुफाओं को सजा – संवार कर रहता था तथा तूलिका के माध्यम से गुफाओं की दीवारों पर अपनी जीवन गाथाएं अंकित कर स्वयं को अमिट कर देता था । वह आसानी से उपलब्ध विभिन्न रंगों के पत्थरों को घिसकर उसमें वनस्पतियों के रस को मिलाकर ऐसा घोल तैयार कर चित्रकारी करता था, जो इतना प्राचीन होते हुए भी कुछ ही दिनों का बना प्रतीत होता है । वह निर्वसन होकर भी नंगा नहीं था । निरक्षर होते हुए भी वह मूर्ख ना था । उसका भी एक कलात्मक जीवन दर्शन था । आज हमें इनसे स्वच्छ एवं पवित्र जीवन की शिक्षा लेनी चाहिए।

इस प्रकार आलोचनात्मक विश्लेषण तथा इन अप्रकाशित पुरातात्विक स्रोतों के द्वारा मिर्जापुर जनपद की पुरातात्विक संपदा का प्रकाशन किया जा सकता है । इनका उल्लेख डॉ. राकेश तिवारी द्वारा लिखित लेख “रॉक पेंटिंग्स ऑफ मिर्जापुर इन उत्तर प्रदेश” तथा यशोधर मठपाल द्वारा लिखित लेख “इंडियन रॉक आर्ट टुडे ” में भी नहीं प्राप्त होता है । लेखक के द्वारा स्वयं इन स्थलों का भौतिक सत्यापन करने के बाद ही उल्लेख किया गया है । भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के द्वारा इन प्राचीन धरोहरों को सुरक्षित करने की आवश्यकता है । संप्रति पुरातात्विक दृष्टि से समृद्ध इस जनपद में उन प्रमाणों एवं स्थलों के खोज की निरंतर आवश्यकता है । जिससे इतिहास की एक समृद्ध परंपरा का विकास हो तथा नए तथ्यों के उद्घाटन से नवीन ऐतिहासिक धारा प्रवाहित हो सके। हलिया ब्लॉक के भैसोड़ के ही श्यामजनम दुबे ने भी इसी पर एमफिल की है। उनका विषय तहसील लालगंज में शैल चित्रकला रहा है। ये चित्र उन्हीं के द्वारा खोज के दौरान लिए गए हैं।

(लेखक केबीपीजी कॉलेज मिर्जापुर में प्राचीन इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के विभागाध्यक्ष हैं।)

 


Sachchi Baten

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