July 24, 2024 |

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सुलगता सवाल – कब अंजाम तक पहुंचेगी बुंदेलखंड राज्य की लड़ाई ? पढ़िए आंदोलन की शुरुआत से लेकर अब तक की कहानी…

Sachchi Baten

आजादी के पहले ही ओरछा से उठी थी अगल बुंदेलखंड राज्य की मांग

 

सरकारी पानी डालकर आंदोलन की लपटों को तो दबा दिया गया, लेकिन अंदर ही अंदर सुलग रही है आग

राजेश पटेल, झाँसी (सच्ची बातें)। आजादी के पहले 5वें दशक से चली आ रही बुंदेलखंड राज्य की लड़ाई आज 21वीं सदी के तीसरे दशक तक भी किसी अंजाम तक नहीं पहुँच पाई है तो बिल्कुल इसके अपने कारण है।

कभी अलग राज्यों की रेस में झारखण्ड, उत्तराखण्ड, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना राज्यों की मांगों के साथ खड़ी अलग बुंदेलखंड राज्य की लड़ाई इस मायने में भी पिछड़ गई कि 2000 में झारखण्ड, उत्तराखण्ड और छत्तीसगढ़ राज्य बन गये।  2014 में तेलंगाना भी अलग राज्य बन गया लेकिन बुंदेलखंड जस का तस भारत के नक़्शे में आज भी अपनी जगह तलाश रहा है।

            बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा के कमांडर व संस्थापक शंकरलाल मेहरोत्रा

 

अगर थोड़ा पीछे चल कर बुंदेलखंड राज्य की मांग जिस गौमुख से निकल कर सामने आई, वहां तक चलें तो पाएंगे कि 1939 में बुंदेलखंड की पुरातन राजधानी ओरछा में इसकी पहली बड़ी आवाज आई, ज़ब ओरछा महाराज मधुकर शाह जूदेव द्वितीय की अगुवाई में पृथक बुंदेलखंड प्रान्त की मांग को लेकर दो बड़े सम्मेलन हुए और इन सम्मेलनों की अगुवाई बुंदेलखंड के शीर्षस्थ साहित्यकारों में शुमार पं. बनारसीदास चतुर्वेदी ने की।

सम्मेलन में बुंदेलखंड राज्य की लड़ाई पर रोशनी डालते उस समय की प्रमुख साहित्यिक पत्रिका ‘ मधुकर ‘ के दो अंक भी प्रकाशित हुए। समय के साथ आजादी के आंदोलन के चलते बुंदेलखंड राज्य आंदोलन समय की परतों के नीचे दब गया।

                    बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा के मौजूदा अध्यक्ष हरिमोहन विश्वकर्मा

 

1975 के बाद पृथक बुंदेलखंड राज्य की बात एक बार फिर क्षितिज पर आई, ज़ब मप्र के पूर्व मंत्री महेन्द्र मानव, बाँदा के पूर्व विधायक देवकुमार यादव, सागर के पूर्व सांसद डालचंद्र जैन, झाँसी के प्रसिद्ध आयुर्वेदिक घराने बैद्यनाथ समूह के मालिक विश्वनाथ शर्मा, जो बाद में सांसद भी बने, झाँसी के ही वरिष्ठ पत्रकार हरेंद्र सक्सेना, उरई के वरिष्ठ साहित्यकार विष्णुदत्त शर्मा आदि इसे लेकर ज़मीन पर उतरे।

दिक्क़त ये थी कि ये सब नाम अपने समय के दिग्गज थे, इनकी हार्दिक इच्छा भी थी कि बुंदेलखंड राज्य बने, लेकिन सबके अपने अलग संगठन थे, अपनी महत्वाकांक्षाएं थी और सब लोग विभिन्न राजनीतिक मंचों से जुड़े होने के कारण आराम से अपनी मांग के लिए एक जाजम पर न बैठ पाए और समयगति के शिकार हो गये।

इसी के साथ बुंदेलखंड राज्य की मांग भी एक बार फिर ठंडे बस्तों में चली गई। बुंदेलखंड राज्य की मांग को आंदोलन बनाने का श्रेय बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा को जाता है, जिसका जन्म सितंबर 89 में हुआ और सूत्रधार बने दो बार नगरपालिका नौगांव के अध्यक्ष, बुंदेलखंड के शीर्षस्थ उद्यमी शंकरलाल मेहरोत्रा।

जन्म के साथ ही मोर्चे ने जनसभाओं, रैलियों, पदयात्राओं, सम्मेलनों की झड़ी लगा दी। इससे बुंदेलखंड आंदोलन सही मायनों में उप्र -मप्र में बंटे बुंदेलखंड के जिले जिले तक पहुँचा। दमोह, छतरपुर, सागर, टीकमगढ़, दमोह, पन्ना, चित्रकूट, बाँदा, महोबा, हमीरपुर, ललितपुर, झाँसी, जालौन, दतिया, शिवपुरी, गुना, ग्वालियर, मुरैना, आदि जिलों में बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चे की इकाइयाँ बनी।

इसी मध्य असम गण परिषद से प्रभावित होकर झाँसी के कुछ युवाओं ने बुंदेलखंड गण परिषद नामक संगठन भी बनाया, जो युवाओं को साथ लेकर चला। कुछ समय बाद मोर्चा और गण परिषद साथ हो गये और मप्र विधानसभा में पर्चे फेंकने, भोपाल, लखनऊ में रैलियों, बुंदेलखंड भर के टीवी प्रसारण केंद्रों से टीवी रिले ठप्प करने जैसे जोरदार जनआंदोलन हुए। इससे बुंदेलखंड भर में जाग्रति आई, सैकड़ों लोग जेल गये, रेल रोकी गई, सड़कें जाम हुई।

जंतर मंतर दिल्ली पर बड़े बड़े धरने और भूख हड़ताल हुई। समय की मांग को देखते हुए बाद में गण परिषद ने मोर्चे में ही अपना विलय कर दिया, जिससे मोर्चा और अधिक शक्तिशाली हो गया।

अब तक बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चे से सागर के पूर्व मंत्री और साहित्यिक हस्ती विट्ठलभाई पटेल, खजुराहो के पूर्व सांसद लक्ष्मीनारायण नायक, पूर्व सांसद गंगाचरण राजपूत, दस्यु सुंदरी फूलन देवी और उनके पति उम्मेद सिंह, पूर्व मंत्री बादशाह सिंह, फ़िल्म अभिनेता राजा बुंदेला, पूर्व मंत्री रवीन्द्र शुक्ला, सांसद झाँसी -ललितपुर राजेंद्र अग्निहोत्री, दमोह सांसद रामकृष्ण कुसुमरिया, बाँदा सांसद प्रकाश टिकरिया, दमोह के पूर्व विधायक रघुवीर मोदी के बेटे सुरेश मोदी, पन्ना के हजारीलाल भट्ट आदि शख्सियतें जुड़ चुकी थीं।

मोर्चे के नौ लोगों ने दमदारी से अपनी मांग संसद के पटल तक पहुँचाने के लिए 25 मार्च 1995 में संसद में पर्चे फेंके। सांसद उमा भारती, राजेंद्र अग्निहोत्री, रामकृष्ण कुसमुरिया आदि के पास पर लोकसभा की दर्शक दीर्घा से इन 9 लोगों, जिनमें बुंदेलखंड महाविद्यालय झाँसी के छात्रसंघ अध्यक्ष राजेश शुक्ला, खुद मोर्चा कमांडर और संस्थापक सदस्य शंकरलाल मेहरोत्रा, वरिष्ठ पत्रकार और मोर्चा महामंत्री हरिमोहन विश्वकर्मा को गिरफ्तार कर लिया गया और रात भर संसद में बंदी के रूप में रखा गया।

अगले दिन सदन में विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेई के आग्रह पर इन सभी को तिहाड़ न भेजकर लोकसभा अध्यक्ष शिवराज पाटिल ने सदन के अंदर काटी गई एक रात और दिन की अवधि को सजा मानकर रिहा कर दिया गया।

1997 के शुरू होते होते मोर्चे के खाते में एक और बड़ी उपलब्धि और जुड़ी, ज़ब झाँसी किले की ऐतिहासिक तलहटी में अलग राज्यों की मांग करने वाले तमाम प्रमुख संगठन और उनके नेता जुटे। इनमें झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री शिबु सोरेन, गोरखालैंड के सुभाष घीसिंग, पूर्वांचल के पूर्व मंत्री शतरुद्र प्रकाश, अंजना प्रकाश, पूर्व पेट्रोलियम मंत्री सत्यप्रकाश मालवीय, महाराष्ट्र हाईकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस मधुकर दिघे, मप्र के पूर्व डीजीपी सुभाष त्रिपाठी, अभिनेता राजा बुंदेला आदि जुड़े और देश भर में अलग राज्यों की मांग करने वालों का मंच बना, जिसका नेतृत्व भी मोर्चा के हाथ आया।

ज़ब इस संगठन ने देश भर में आंदोलन छेड़ा तो बुंदेलखंड में भी 9 अप्रेल 1998 से सीधी कार्रवाई आंदोलन की शुरुआत हुई। पूरा बुंदेलखंड सुलग उठा, सड़कें जाम, रेलों के चक्के थम गये। रैलियों, आंदोलन से केन्द्र सरकार घबरा गई और बुंदेलखंड में केंद्रीय पुलिस की तमाम फोर्सेस ने डेरा डाल दिया।

ज़ब इससे भी बुंदेलखंड में आंदोलन थमता नहीं दिखा, तब 4 जून 98 की रात में पूरे बुंदेलखंड में जबरदस्त दमन चक्र चलाया गया। पूरे बुंदेलखंड से संगठन के शीर्ष लोगों को चुन चुन कर जेल में डाल दिया गया। मोर्चा के झाँसी मुख्यालय से कमांडर शंकरलाल मेहरोत्रा और आंदोलन की जमीनी कमान संभाल रहे महासचिव हरिमोहन विश्वकर्मा सहित 9 बालिग़/नाबालिग लोगों पर रासुका लगाकर जेल में नज़रबंद कर दिया गया। षडयंत्र पूर्वक रोडवेज की बस में आग लगवा कर सभी पर धारा 302 और 120बी भी लगवा दी गई। आंदोलन तहस नहस कर झारखण्ड, उत्तराखण्ड और छत्तीसगढ़ तीन नए राज्य बना दिए गये।

बुंदेलखंड के इन नेतृत्व कर्ताओं को तब तक 6 महीने से अधिक समय तक जेलों में ही रखा गया। यहां से बुंदेलखंड आंदोलन अधोगति को प्राप्त हुआ। 2014 में तेलंगाना निर्माण के समय भी बुंदेलखंड ने प्रतिरोध करने का प्रयास किया, लेकिन यह नाकाफी था। तेलंगाना भी बना और बुंदेलखंड फिर छोड़ दिया गया।

अब आलम यह है कि बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा अधिक सक्रिय नहीं है, अन्य छिटपुट संगठन अपने अपने जिलों में योग्यतानुसार सक्रिय हैं। वास्तव में अब यह मांग जनआंदोलन से अधिक राजनीतिक बन चुकी है। बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा भी राजनीतिक संगठन के रूप में चुनाव आयोग से रजिस्टर्ड हुआ, लेकिन लड़े गये चुनावों में उसे सफलता नहीं मिली। ऐसे में अब सवाल उठता है कि बुंदेलखंड आंदोलन और पृथक राज्य की मांग का भविष्य क्या है।

इस बारे में बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा के वर्तमान अध्यक्ष हरिमोहन विश्वकर्मा कहते हैं कि अब गेंद केन्द्र सरकार के पाले में है। चर्चा है कि केन्द्र महाराष्ट्र का विभाजन कर विदर्भ और उप्र का विभाजन कर पूर्वांचल और बुंदेलखंड राज्य के निर्माण की पहल कर सकता है। पर जनआंदोलन तो जिंदा रखना होगा।

दरअसल बुंदेलखंड की असली समस्या दो राज्यों में बंटे होने के अलावा यहां की गरीबी है। यहां आदमी आंदोलन के नाम पर मर तो सकता है, लेकिन पेट की आग के चलते महीने -दो महीने आंदोलन पर नहीं बैठ सकता। इसीलिए यहां छापामार आंदोलन ही सफल है, जो मोर्चा ने किया भी है और आगे भी परिस्थिति निर्मित होने पर करेगा। पर इंतजार केन्द्र की पहल का है जहाँ के गलियारों से उप्र के विभाजन की सुगबुगाहट की आवाज आ रही है।

अगर ऐसा होता है तो जनांदोलन के अतिरिक्त राजनीतिक शक्ति एकत्रित करने की आवश्यकता है। बुंदेलखंड राज्य की छिटपुट मांग करने वाले संगठनों को यह समझना होगा। अगर वे एक जाजम पर एकत्रित नहीं होंगे तो एक बार फिर बुंदेलखंड के साथ 2000 और 2014 जैसा इतिहास दोहराया जा सकता है, ज़ब बुंदेलखंड को ताक पर रखकर छत्तीसगढ़, उत्तराखण्ड, झारखण्ड और तेलंगाना जैसे राज्य बना दिए गये।


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