July 24, 2024 |

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एक चूहा पकड़ने की कीमत 41 हजार, है न चौंकाने वाली बात

Sachchi Baten

उत्तर रेलवे के लखनऊ मंडल ने तीन साल में चूहे पकड़ने पर खर्च किए 69 लाख, पकड़े गए मात्र 168

-एक चूहा पकड़ने में लगे औसतन साढ़े छह दिन

-सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत हुआ हैरतअंगेज खुलासा

 

लखनऊ (सच्ची बातें)। एक कहावत है- खोदा पहाड़, निकली चुहिया। मतलब बहुत श्रम किया और पैसे खर्च किए, लेकिन परिणाम कुछ नहीं निकला। रेलवे की भी स्थिति यही है। उत्तर रेलवे लखनऊ मंडल ने चूहों से स्टेशनों पर छुटकारा पाने के लिए तीन साल में करीब 69 लाख रुपये खर्च कर दिये हैं। इतनी भारी धनराशि खर्च करके मात्र 168 चूहे पकड़े जा सके। इस बात का खुलासा आरटीआई  (सूचना का अधिकार अधिनियम 2005) के तहत जानकारी मांगने पर हुआ है।

 

 

चंद्रशेखर गौर ने यह आरटीआई लगाई थी। चंद्रशेखर ने आरटीआई के जरिये चूहों को पकड़ने में किये गये खर्च की जानकारी मांगी थी। इसके अलावा चूहों से रेलवे को होने वाले नुकसान की भी जानकारी मांगी गई थी, लेकिन उसकी जानकारी नहीं दी गई है।

रेलवे स्टेशनों और प्लेटफार्मों पर अक्सर मोटे-मोटे चूहे दिखाई देते हैं। इन चूहों से रेलवे इतना परेशान है कि इन्हें पकड़ने के लिए 3 साल में 69 लाख रुपये खर्च कर दिए हैं।

RTI में हुए खुलासे के मुताबिक यह रकम पिछले तीन सालों में खर्च की गई। यानी हर साल लखनऊ मंडल ने चूहों को पकड़ने पर 23.2 लाख रुपये खर्च किए। यानी एक चूहे को पकड़ने में 41 हजार रुपये खर्च किए हैं। जिसको लेकर तमाम चर्चाएं हो रही हैं।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक चूहा पकड़ने का ठेका सेंट्रल वेयर हाउसिंग कॉर्पोरेशन को दिया गया था। कंपनी ने चूहों को पकड़ने का अभियान चलाया। तीन साल के करीब 1095 दिन में अधिकारियों ने 168 चूहे पकड़े। मतलब ठेका कंपनी ने एक चूहा पकड़ने में करीब साढ़े छह दिन का समय लिया।

 

चूहों को पकड़ने के लिए पहली बार ठेका 2013 में जारी किया गया था।

 

एक चूहा के लिए 41 हजार रुपये का खर्च
अब इन साढ़े छह दिन में अधिकारियों ने एक चूहे को पकड़ने में 41 हजार रुपये बर्बाद कर दिए। स्थिति यह है कि हर साल चूहे को पकड़ने वाले अभियान में करीब 23 लाख 16 हजार 150 रुपये का खर्च आया। यह अभियान लगातार तीन साल तक चला और इसमें 69 लाख 48 हजार 450 रुपए का खर्च आया। यह पैसा पानी की तरह बर्बाद हुआ और इसको लेकर विभाग में सभी जिम्मेदार लोगों ने अपनी आंख बंद रखी।

आखिरी के दो साल में हर चूहे पर 50 हजार खर्च
यह अभियान साल 2020 में शुरू हुआ। पहले साल तो अधिकारियों ने अपने औसत से अच्छा अभियान चलाया और बहुत मेहनत के बाद 83 चूहे पकड़े। मसलन 4 दिन में एक चूहा। लेकिन उसके बाद तो उनकी कामचोरी और भ्रष्टाचार ऐसा बढ़ा कि साल 2021 में 45 चूहे पकड़े। उसके लिए प्रति चूहा 51 हजार रुपये का खर्च आया। साल 2022 में 40 चूहे पकड़े गए और इसके लिए 57900 रुपये का खर्च आया।

चारबाग रेलवे स्टेशन पर पटरियों के बीच चूहे अमूमन दिखते हैं।

2013 में पहली बार चूहा मारने का ठेका
रेलवे ने एक जुलाई 2013 में पहली बार चूहों को मारने का ठेका 3.50 लाख रुपये में जारी किया था। उसके बाद साल 2016 में करीब चार लाख 76 हजार रुपये का ठेका दिया गया।

 -वीडियो व इनपुट दैनिक भास्कर से साभार


Sachchi Baten

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