July 24, 2024 |

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काशी के कुर्मी फिर बनेंगे मोदी के खेवनहार ?

Sachchi Baten

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाराणसी से जीत की हैट्रिक लगाते हैं तो इसमें कुर्मी मतदाताओं की होगी अहम भूमिका

-अपना दल एस का दो दिवसीय प्रशिक्षण शिविर बनारस में दो सितंबर से

 

राजेश पटेल, बनारस (सच्ची बातें)। यदि कुछ अप्रत्याशित घटनाक्रम नहीं होता है तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आगामी लोकसभा चुनाव भी वाराणसी संसदीय क्षेत्र से ही लड़ेंगे। वह लगातार दो बार यहां से जीत चुके हैं, हैट्रिक लगाने का मौका नहीं छोड़ेंगे। इस हैट्रिक में अहम भूमिका कुर्मी जाति के मतदाताओं की होगी। यदि पड़ोसी राज्य बिहार की हवा लगने के कारण कुर्मी मतदाताओं ने करवट ली तो फिर मोदी का जीतना नामुमकिन नहीं तो मुश्किल अवश्य हो जाएगा। इस मुश्किल को आसान बनाने के अनुप्रिया पटेल के नेतृत्व वाला अपना दल एस अभी से जुट गया है। चुनावी मंथन के लिए पार्टी नेताओं की जुटान दो व तीन सितंबर को वाराणसी में होने जा रही है।

वाराणसी जिले में कुर्मी मतदाताओं की संख्या करीब ढाई लाख है। यह संख्या किसी को जिताने या हराने के लिए काफी है। इस जाति की संख्या को ही देखकर भारतीय जनता पार्टी ने 2014 के आमचुनाव के पहले कुर्मियों का दल कहे जाने वाले अपना दल से चुनावी गठबंधन किया था। अपना दल का वाराणसी के कुर्मी मतदाताओं में खासा प्रभाव है। अनुप्रिया पटेल ने समाजवादी पार्टी की प्रचंड लहर में भी रोहनिया विधानसभा सीट से 2012 में जीत हासिल की थी।

नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री का चेहरा घोषित कर चुकी भारतीय जनता पार्टी ने उनकी जीत सुनिश्चित करने के लिए ही वाराणसी से उनको चुनाव मैदान में उतारने का फैसला लिया था। इसका मुख्य कारण यह रहा कि वाराणसी को देश की सांस्कृतिक राजधानी माना जाता है तथा धर्म की नगरी भी। भाजपा की सोच थी कि वाराणसी से हिंदुत्व की लहर को ज्वार-भांटा का रूप देने में सहूलियत होगी। इस ज्वार-भांटे को उत्तर प्रदेश की पूर्वांचल और पश्चिमी बिहार की लोकसभा सीटों तक को प्रभावित करने का इरादा था।

लेकिन, यह कुर्मी मतदाताओं को साधे बिना संभव नहीं था। इसीलिए उसने अपना दल को चुनावी साथी बनाया। पूर्वांचल की वाराणसी, मछलीशहर, जौनपुर, मिर्जापुर, प्रतापगढ़, प्रयागराज आदि संसदीय क्षेत्रों में कुर्मी मतदाताओं की संख्या निर्णायक है। लिहाजा दूसरी आजादी के नायक सामाजिक न्याय के पुरोधा कहे जाने वाले डॉ. सोनेलाल पटेल व उनके हजारों अनुयायियों के खून-पसीने से सींच कर बनी पार्टी अपना दल को साथ लेना मजबूरी थी। कुर्मी बिरादरी को साथ लिए बिना भाजपा का अश्वमेध यज्ञ का रथ बनारस में ही रुक सकता था।

यह कहना गलत होगा कि अपना दल से गठबंधन केवल भाजपा की मजबूरी थी। अपना दल को भी अपने विस्तार के लिए यह जरूरी था। जरूरत दोनों की थी, इसलिए साथी बन गए। भारतीय जनता पार्टी को इसके लिए मिर्जापुर सीट अपना दल को देनी पड़ी। इसके लिए पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी भी झेलनी पड़ी। मिर्जापुर के कद्दावर भाजपा नेता ओमप्रकाश सिंह उसी समय से पार्टी से नाराज चल रहे हैं। उसके बाद से भारतीय जनता पार्टी के किसी भी कार्यक्रम में उनको नहीं देखा गया।

वाराणसी संसदीय क्षेत्र में रोहनिया और सेवापुरी विधानसभा में तो कुर्मियों की संख्या इतनी है कि ये जिधर रहेंगे, जीत उसी की होनी तय है। वाराणसी शहर में भी कुर्मियों की संख्या कम नहीं है। इसी कारण भाजपा नेता ओमप्रकाश सिंह की पत्नी श्रीमती सरोज सिंह मेयर बन सकी थीं। कुर्मी जाति के ही कौशलेंद्र सिंह भी बनारस के महापौर का चुनाव जीत चुके हैं। बनारस के कुर्मियों को साधने के लिए कौशलेंद्र सिंह को राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग का सदस्य भी बनाया गया है। दिलीप पटेल को भारतीय जनता पार्टी काशी प्रांत की जिम्मेदारी दी गई है। काशी प्रांत में जो भी जिले आते हैं, उनमें कुर्मियों की संख्या चुनाव को प्रभावित करने लायक है।

आलोचक चाहे जो भी कहें, उत्तर प्रदेश में तो कुर्मी समाज की नेता में आज की तारीख में अनुप्रिया पटेल का ही नाम लिया जाता है। आगे क्या होगा, कोई नहीं जानता। यह सच है कि विपक्षी गठबंधन द्वारा यदि नीतीश कुमार को प्रधानमंत्री के चेहरा के रूप में प्रोजेक्ट नहीं किया जाता तो अनुप्रिया पटेल का प्रभाव कम नहीं होगा। सत्ता विरोधी लहर में यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाराणसी से जीत की हैट्रिक लगाते हैं तो इसमें अनुप्रिया पटेल का खासा योगदान होगा। यह भी कहा जा सकता है कि इसमें कुर्मी मतदाताओं की अहम भूमिका होगी।

 

 

 


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