July 24, 2024 |

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सुब्रत रॉय सहाराः जमीन से जुड़ा एक विवादित शख्स

Sachchi Baten

जानिए सुब्रतो रॉय से सहाराश्री बनने व जेल जाने तक की पूरी स्टोरी…

 

मनोज कुमार तिवारी

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सहारा ग्रुप के मालिक सुब्रतो रॉय का निधन बीते दिनों हो गया। आइए आज सरल शब्दों में जानते हैं सहारा साम्राज्य और घोटाले की कहानी।
कहा जाता है भारत में रेलवे के बाद अगर सबसे ज्यादा किसी ने नौकरी दी तो वह है सहारा ग्रुप। कैसे भारत के सबसे बड़े ग्रुप या परिवार पर इतना बड़ा जुर्माना लग जाता है, कैसे गोरखपुर का लम्ब्रेटा स्कूटर पर चलने वाला व्यक्ति इतनी बड़ी कंपनी खड़ी करता है। कैसे सेबी की नजर पड़ी और पता चला कि भारत के तीन करोड़ लोगों का 24 हजार करोड़ रुपये लौटाए नहीं। इस आर्टिकल के माध्यम से सब जानते हैं।

आज़ादी के एक साल बाद 10 जून 1948 में बिहार के अररिया जिले में सुब्रतो रॉय का जन्म होता है। इनके माता पिता पहले ढाका में रहते थे और बाद में बिहार में आए। शुरू में कोलकाता में पढ़ाई होती है। बाद की पढ़ाई के लिए सुब्रतो का परिवार गोरखपुर में शिफ्ट हो जाता है। गोरखपुर टेक्निकल कॉलेज से मैकेनिकल में इंजीनियरिंग की। पहले तो सुब्रतो रॉय का मन नौकरी करने का था, लेकिन पिता की मृत्यु के बाद जिम्मेदारी बढ़ जाती है और नौकरी नहीं कर पाते हैं।

सुब्रतो रॉय ने अपना काम शुरू किया। उन्होंने लम्ब्रेटा स्कूटर से नमकीन बेचने का काम शुरू किया। वे स्कूटर पर नमकीन बेचते और दुकानों पर भेजते थे। ऐसी ही कहानी प्रयागराज के एक नेता की भी कही जाती है।

1978 का साल था, जब सुब्रतो रॉय के जेहन में एक बिजिनेस आईडिया आया, जिसने इनकी जिंदगी को बदल कर रख दिया। सुब्रतो रॉय ने गोरखपुर में एक कंपनी डाली, जिसका नाम था सहारा इंडिया। सहारा इंडिया का गोरखपुर में एक छोटा सा ऑफिस था। 2000 रुपये की लागत से काम शुरू किया गया। केवल तीन लोग इस कंपनी में काम करते थे। सहारा इंडिया कंपनी का काम था कि जो रोजमर्रा कमाते हैं, उनको कम से कम अपनी कमाई का 20 फ़ीसद डेली जमा करते हैं तो कुछ दिनों में इसका दोगुना देंगे।

1978 से 1985 तक सहारा ने गांव के लोगों का भरोसा जीता और सहारा ग्रुप में लोग इन्वेस्ट करने लगे। शुरुआत में 48 लोग सहारा में पैसे डिपाजिट करने लगे। पहले सहारा डेली वर्करों से 10 से 15 रुपये रोज जमा करवाते थे। कुछ समय बाद दोगुना करके देने लगे। लोगों का भरोसा बढ़ा और वे 50 से 100 रुपये जमा करने लगे। लोगों को पैसा वायदे के मुताबिक मिलता जा रहा था। लोगों में सहारा के प्रति भरोसा बढ़ता जा रहा था। पहले सहारा का कॉसेप्ट था कि कोई मालिक नहीं, कोई ट्रेड यूनियन नहीं। सब परिवार की तरह काम करें। खुद सुब्रतो रॉय का पद मैनेजिंग वर्कर का था।

1980 के बाद सहारा ने लोगों को नौकरी पर रखना शुरू कर दिया। इसमें पहले गावों के नौजवानों से इन्वेस्ट कराया जाता था और उनको एजेंट बनाया जाता था। एजेंट लोगों को इन्वेस्ट के लिए प्रेरित करते और लोगों को पैसे डबल करके देते थे। लगातार एजेंटों की संख्या बढ़ती जा रही थी। 1990 आते-आते हजारों एजेंट बन चुके थे। इनको तनख्वाह नहीं मिलती थी, लेकिन अच्छा कमीशन मिलता था। लाखों लोग सहारा में पैसे डिपाजिट करते थे।

सहारा पैसा कहां से डबल करके देता, इसका फंडा था कि नए लोगों का पैसा पुराने लोगों को बढ़ा कर देता था। जिसको पैसा मिलता था, वह दोबारा इन्वेस्ट करता था और लोगों को साथ लाता था। ऐसे ही साइकिल चल रही थी। सुब्रतो रॉय की जिंदगी के दो कांसेप्ट थे, पहला खुद को गरीबों के मसीहा के रूप में दिखाने का और दूसरा भारत का हर बड़ा आदमी उनका दोस्त हो और उनकी इज्जत करे। इन दो मकसद के साथ सहारा सफल हो रहा था।

1993 का साल था, जब सबसे बड़ा इन्वेस्टमेंट सहारा ने एविएशन में किया। सहारा इंडिया नाम से एयर सेवा शुरू की। दो बोईंग एयर क्राफ्ट के साथ सहारा इंडिया ने उड़ान भरनी शुरू की 1993 में। सबसे पहले सहारा पर सवाल उठा 1996 में। 1996 में लखनऊ के इन्कम टैक्स कमिश्नर ने डिपॉजिटरों की लिस्ट मांगी थी, उस अधिकारी का नाम था प्रसन्नजीत सिंह। प्रसन्नजीत सिंह ने कुछ ही डिपॉजिटरों की लिस्ट मांगी थी, जो नेता लोग थे। सहारा ने नाम तो नहीं दिया, लेकिन अगले दिन अख़बारों में जिनके नाम मांगे गए थे, उनके नाम प्रकाशित करा दिया। कुछ दिन में ही प्रसन्नजीत सिंह का तबादला हो जाता है।

साल 2000 आते-आते सहारा के निवेशकों की संख्या करोड़ो में हो गई। 2000 का साल इतना भाग्यशाली रहा सहारा के लिए कि सहारा ने सहारा टीवी शुरू किया। एविएशन के बाद इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भी सहारा ने कदम रख दिया। 2002 में सहारा ने क्रिकेट टीम को स्पांसर करना शुरू किया और हर तरह की टीम का स्पांसर किया। सब खिलाड़ियों की जर्सी पर सहारा लिखा होता था। डिपॉजिट स्कीम चल ही रही थी, लेकिन 2002 से गड़बड़ी शुरू होती है।

गड़बड़ी यह हुई कि इन्वेस्टर की जब मैच्योरिटी होनी होती थी तो उनको बताया जाता था कि अपना पैसा फिर इसमें इन्वेस्ट कर दो तो तीन गुना हो जायेगा। इसमें कर दो तो कम समय में दोगुना हो जायेगा। लोगों ने पैसा लगाया भी। क्योंकि उनको भरोसा था सहारा पर। 2003 में सहारा का नेट वर्थ 32 हजार करोड़ का हो चुका था और सात लाख लोग सहारा के लिए काम कर रहे थे।

2004 में सुब्रतो रॉय ने अपने दोनों बेटों सीमान्तो और सुशांतो की शादी की। एक ही दिन लखनऊ से शादी हुई और इस शादी में करीब 552 करोड़ रुपये खर्च किये गए। यह ऐसी शादी थी कि कोई ऐसा नेता नहीं था भारत का, कोई ऐसी बड़ी हस्ती नहीं थी भारत की, जो न आई हो। आर्टिस्ट, हर राज्य के मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, सारे मंत्री सब निमंत्रित थे। दुनिया भर से बड़े-बड़े मेहमान बुलाए गए। करीब दस हजार मेहमान लखनऊ पहुंचे थे। कहा जाता है इस शादी से बड़ी शादी आज तक भारत में नहीं हुई है।

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सुब्रत रॉय के बेटों की शादी में आशीर्वाद देने पहु भारत सरकार  के तत्कालीन गृह मंत्री  लालकृष्ण आडवाणी- फाइल फोटो

 

अब सबसे बड़ा सवाल यह था कि जो पैसा जो शादी में खर्च हुआ, था किसका ? कहाँ से 552 करोड़ शादी के लिए आए ? 2004 में सहारा के डेपोजिटरों कि संख्या छह करोड़ से ज्यादा हो चुकी थी। यानि हर 17 इंडियन में एक था, जिसने सहारा में निवेश किया हुआ था। मीडिया में सहारा के खिलाफ कोई खबर नहीं चलती थी। सुब्रतो रॉय ज्योतिष में बहुत भरोसा करते थे। गोरखपुर के एक पंडित जी थे कृष्ण मुरारी। सुब्रतो रॉय उनसे सलाह लेते थे। उन्होंने चेतावनी दी थी कि संकट आने वाला है, लेकिन सुब्रतो ने ध्यान नहीं दिया।

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सुब्रत रॉय के बेटों की शादी में आशीर्वाद देने पहुंचे तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, अमर सिंह, मुलायम सिंह यादव, जनेश्वर मिश्र-फाइल फोटो।

 

2005 आते-आते सहारा ने गांवों के लोगों जिन्होंने इन्वेस्ट किया था, उनको बताया गया कि आप एजेंट को पैसा नहीं देंगे। सहारा ऑफिस में खुद जाकर जमा करेंगे। अब गरीब आदमी जो डेली काम करता है, उसके पास टाइम नहीं होता था कि शहर जाकर पैसे जमा करे। एजेंट हटा दिए गए थे। अब जो लोग नहीं जा पाते थे, उनको नोटिस आने लगा और जुर्माना लगाया जाने लगा। बताया गया कि आप जमा नहीं करेंगे तो अब तक जमा पैसा भी जब्त हो जाएगा। इसी समय से लोगों का भरोसा सहारा से उठना शुरू हो गया था। लोगों ने निवेश कम कर दिया, लेकिन सहारा का निवेश बढ़ता जा रहा था। 2006 में पुणे में दस हजार छह सौ एकड़ में आंबे वैली सिटी बनाई गई। 360 एकड़ में सहारा सिटी बसा दी गई लखनऊ में।

2006 में सहारा ने अपनी एयरलाइंस को जेट एयरवेज को बेच दिया। वर्ष 2006 -07 तक सहारा के पास भारत भर में 22 हजार एकड़ जमीन थी, जिसकी वैल्यू 64 हजार करोड़ की थी। एक तरफ निवेशकों का पैसा नहीं मिल रहा था और सहारा अपनी सम्पत्ति बढ़ाता जा रहा था। वर्ष 2007 में सहारा ने अपनी दो कंपनियों को पब्लिक किया। अभी तक लोगों को पता नहीं था। जब सहारा ने अपनी कंपनी को पब्लिक किया तो इंडियन स्टॉक एक्सचेंज में लिस्ट हुई। लिस्टिंग के समय कंपनी के डिटेल को जब चेक किया जाता है तो कई गड़बड़ियां सामने आईं। 2007 के बाद 2009 में सेबी की नजर सहारा ग्रुप पर पड़ी।

दिसंबर 2009 और जनवरी 2010 में दो कम्प्लेन सेबी के पास आईं, जो निवेशक थे। पहले थे रोशन लाल और दूसरे थे कलावती। दो कम्प्लेन के बाद सेबी का शक और गहरा हो गया। अब मीडिया ने भी खबर बनानी शुरू कर दी। जब मीडिया में बात आने लगी तो मुद्दा गरमा गया। सुब्रतो रॉय को सेबी के मुख्यालय बुलाया गया। पूछतांछ हुई। सेबी ने बताया कि सहारा के अंदर बहुत कुछ गलत चल रहा है। इन्वेस्टर के बारे में सहारा के पास जानकारी नहीं है। नाम-पता और डिटेल गलत थे। सेबी ने आरोप लगाया कि 24 हजार करोड़ रुपये निवेशकों का वापस नहीं किया।

मामला सुप्रीम कोर्ट में गया। सुब्रतो रॉय का कहना था कि यह मामला पब्लिक मैटर नहीं है। कोर्ट में मामला चल रहा था। इसी बीच सुब्रतो रॉय ने नूयार्क में प्लाजा होटल और लंदन के गोस वेमर होताकल को खरीद लिया। 2010 में 1002 करोड़ में पुणे वारियर क्रिकेट टीम को खरीद लिया। आरोप 24 हजार करोड़ का था और निवेश करते जा रहे थे। 31 अगस्त 2012 को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि 24 हजार करोड़ रुपये तीन करोड़ निवेशकों को लौटाने पड़ेंगे। क्योंकि यह जनता का पैसा है। भारत के गरीबों का पैसा है। यह प्राइवेट पैसा नहीं है। सहारा ने कहा कि उन्होंने 20 हजार करोड़ कैश में लौटा दिया है। लेकिन न तो सेबी को यकीन हुआ और न तो कोर्ट को। कोई प्रूफ नहीं था।

जब सेबी की तरफ से प्रूफ मांगे गए तो सहारा ने सेबी को चैलेंज करते हुए  127 ट्रक में 31 हजार 600 अलग-अलग कॉर्टन भर कर डॉक्यूमेंट रवाना कर दिया सेबी मुख्यालय को। इनमें तीन करोड़ अप्लीकेशन फॉर्म थे। दो करोड़ बाउचर थे। जब ट्रक मुंबई पहुंचे तो मुंबई के आउटर एरिया में जाम लग चुका था। सेबी के दफ्तर भेजने का मकसद था कि सबको वेरीफाई करने में वर्षों लग जाएंगे।

सेबी ने भी CHALLENGE स्वीकार किया और डाक्यूमेंट की छानबीन शुरू की। चेक करने के दौरान करोड़ो नाम फर्जी पाए  गए। 20 हजार नामों को सैंपल के तौर पर नोटिस गया, जिनमें से केवल 68 लोगों का उत्तर आया। 8000 पत्र वापस सेबी को लौट आए। जब डिपोजिटर थे नहीं तो यह पैसा कहां से आ रह था । काला धन था या अमीरों के पैसे थे। 2013 में क्रिकेट से स्पॉन्सर हटा लिया गया। सुप्रीम कोर्ट की किसी पेशी में नहीं गए। सुब्रतो रॉय के देश छोड़ने पर रोक लग गई। साथ ही 28 फरवरी 2014 को गिरफ्तार कर लिए गए और तिहाड़ के 5 गुणा 12 के सेल में क़ैद कर दिया गया।

2016 में सुब्रतो रॉय को जमानत मिल गई। सुब्रत रॉय ने अन्य घोटालेबाजों की तरह से देश नहीं छोड़ा। सरकार ने सहारा के निवेशकों को पैसे लौटाने के लिए AAPS का निर्माण किया। कुछ लोगों को पैसे मिले भी। इसी बीच सुब्रतो रॉय की मृत्यु  14 नवंबर 2023 को हो गई। ऐसे जमीन से जुड़े विवादित शख्स के बारे में क्या कहा जाए।

(मनोज कुमार तिवारी वरिष्ठ पत्रकार हैं तथा प्रयागराज में रहते हैं।)


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