July 23, 2024 |

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जहां विज्ञान समाप्त होता है, वहां से अध्यात्म शुरू होता है, कितनी सच्चाई है इस बात में…

Sachchi Baten

विज्ञान और अध्यात्म में भ्रम (Illusion in Science and Spiritualism)

आचार्य निरंजन सिन्हा
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मैंने यहां विज्ञान में भ्रम एवं अध्यात्म में भ्रम, और इन दोनों में आपसी भ्रम को शीर्षक बनाया है, और इसीलिए ‘between’ शब्द का प्रयोग नहीं कर, ‘in’ शब्द का प्रयोग संबंधवाचक शब्द के लिए उपयुक्त समझा है। तो अब आगे चलते हैं।

आपने अक्सर सुना होगा कि जहां विज्ञान (Science) समाप्त हो जाता है, वहां से अध्यात्म (Spiritualism) शुरू होता है। क्या इस वक्तव्य में सब कुछ सही है, या सब कुछ ग़लत है, या कोई और मध्यवर्ती अवस्था भी है। दरअसल यह भ्रम (Illusion) विज्ञान और अध्यात्म की अवधारणा की भिन्न भिन्न और मनमानी समझ के कारण है।

लगभग सभी लोग विज्ञान को ठीक ठाक समझने  का दावा करते हैं, लेकिन शुद्ध एवं प्राकृतिक विज्ञान के भी बहुतेरे अध्येयताओ एवं विद्वानों को भी देखा है, जो इस अवधारणा में खुद भटकें हुए हैं और इस भटकाव के कारण वे दूसरों को भी भटका जाते हैं। अध्यात्म की समझ में तो सदैव ही अस्पष्टता रहती हैं और यह अस्पष्टता सभी के द्वारा अभिव्यक्त अवधारणाओं एवं परिभाषाओं में भी झलकता रहता है। इस अध्यात्म को समझने में हम अक्सर पाखंडी बाबाओं के उलझन में उलझ जाते हैं, और उसी के समझ को हम अध्यात्म को समझने का पैमाना बना लेते हैं। इन बाबाओं यानि तथाकथित आध्यात्मिक गुरुओं द्वारा परिभाषित अवधारणाओं का कोई तार्किक, तथ्यात्मक और वैज्ञानिक आधार नहीं होता है। तो हमलोग आज इसे भी स्पष्ट कर लें, लेकिन इसका आधार अवश्य ही वैज्ञानिक, तथ्यपूर्ण और  तार्किक होना चाहिए।

सामान्यतः लोग भौतिकी (Physics) या रसायन शास्त्र (Chemistry) या जीवन शास्त्र (Life science) में वर्णित विषयों एवं इनसे संबंधित विषयों को ही एकमात्र विज्ञान मान लेते हैं। इस तरह लोग विज्ञान को कुछ विशिष्ट विषयों में सीमित कर देते हैं, जो उचित नहीं है। दरअसल विज्ञान एक विवेकशील विशिष्ट ज्ञान है, जिसमें निश्चित कार्य कारण संबंध होता है, और यह संबंध निश्चित क्रियाविधि का किसी पारिस्थितिकी में स्थायी स्वरुप का होता है। इसका तात्पर्य यह है कि विज्ञान एक निश्चित नियमों पर आधारित कोई निष्कर्ष होता है और वह सर्वव्यापक होता है, बार बार सत्यापित किए जाने योग्य होता है और समान परिस्थितियों में समान परिणाम देने वाला होता है। मतलब यह है कि विज्ञान कई निश्चित नियमों की कड़ी होता है, या कई प्रक्रियाओं का समन्वित स्वरुप होता है, जो कार्य कारण संबंधों पर आधारित होता है। इस तरह विज्ञान निश्चित तौर विशिष्ट प्रक्रियाओं का कार्यवृत्त या कार्यविधि होता है, और यह कुछ निश्चित विषयों तक सीमित नहीं होता है।

यदि राजनीति शास्त्र, मनोविज्ञान, समाज शास्त्र, इतिहास, भूगोल आदि आदि विषय विज्ञान है, तो सभी में प्रक्रियात्मक समानता होती है और यही इसमें वैज्ञानिकता की मात्रा का आधार बनता है। विज्ञान की अवधारणा को समुचित ढंग से नहीं समझने वाले लोगो को ही “अध्यात्म” में विज्ञान नहीं दिखता है। हां, बाबाओं के ज्ञान, यानि दर्शन, यानि व्याख्यान को अध्यात्म कहना उनकी व्यवसायिक आवश्यकता है, यानि आकर्षक मार्केटिंग का उदाहरण हो सकता है, लेकिन इन बाबाओं के बकवास को “आध्यात्मिक ज्ञान” मान लेना किसी अन्य की बौद्धिक दरिद्रता का स्पष्ट उदाहरण हो जाता है।

प्रसंगवश हमें ज्ञान (Wisdom) को भी समझ लेना चाहिए। इसी ज्ञान को बुद्धि (Intelligence) भी कहते हैं। ज्ञान सूचनाओं (Information) का संकलन या संग्रहण मात्र नहीं होता है। “ज्ञान” में सूचनाओं के संकलन में एक निश्चित “कार्य कारण संबंध” की, यानि किसी तार्किकता (Logic) की, और किसी विवेकशीलता (Rationale) की अनिवार्य शर्त होती है। जब किसी भी ज्ञान या बुद्धि में ये शर्त मौजूद होता है, तो यह ज्ञान तथ्यपरक, विवेकपूर्ण और वैज्ञानिक भी हो जाता है और कहलाता है। अब हमें ज्ञान के उपयोग के आधार पर भी इसे और गहराई से समझ लेना चाहिए।

जब ऐसा ज्ञान यानि बुद्धि सामान्य उपयोग में लाया जाता है, तो इसे संज्ञानात्मक बुद्धिमत्ता (Cognitive Intelligence) यानि सामान्य बुद्धिमत्ता (General Intelligence) कहलाता है। जब किसी बुद्धि का उपयोग सामने वाले की भावनाओं को समझते हुए और अपने को उसके अनुरूप ढालते हुए लाया जाता है, तो उसे भावनात्मक बुद्धिमत्ता (Emotional Intelligence) कहा जाता है। जब कोई बुद्धि समेकित समाज को ध्यान में रखकर उपयोग में लाया जाता है, तो उसे सामाजिक बुद्धिमत्ता (Social Intelligence) कहते हैं। और जब किसी बुद्धि के प्रयोग में मानवता एवं प्रकृति भी शामिल हो जाता है, तो वह बौद्धिक बुद्धिमत्ता (Wisdom Intelligence) कहलाता है। भावनात्मक बुद्धिमत्ता को डेनियल गोलमैन ने, सामाजिक बुद्धिमत्ता को कार्ल अल्ब्रेच ने और बौद्धिक बुद्धिमत्ता को तथागत बुद्ध ने सर्वप्रथम रेखांकित किया था।

सामान्यतः वर्तमान डिग्रीधारी सूचनाओं के जानकार होते हैं और ‘ज्ञानवान’ होने के भ्रम में रहते हैं। निम्न पंच प्रक्रिया के अभाव में कोई भी किसी विषय या संदर्भ का ज्ञानी समझता है, तो मुझे कुछ नहीं कहना चाहिए। किसी सूचना के ज्ञान बनने के सफर में पांच कड़ियां यानि सीढियां होती है, जिसे अंग्रेजी के पांचों स्वर (Vowels – A, E, I, O, U) के क्रमानुसार याद रखा जा सकता है। इसे आलोचनात्मक चिंतन और विश्लेषण (Critical Thinking n Analysis) की पद्धति भी कह सकते हैं। ये क्रियाएं क्रमशः विश्लेषण करना (Analysis), मूल्यांकन करना (Evaluation), प्रश्न करना (Inquiry),  खोल देना (Openness) एवं सर्वव्यापक करना (Universalism) है। अर्थात किसी जानकारी का विश्लेषण करना,  उसका उस प्रसंग में या सन्दर्भ में मूल्यांकन करना, उससे संबंधित प्रश्न करना और सभी संबंधित शंकाओं यानि प्रश्नों का समाधान करना, इसे सभी संदर्भों में और सभी के लिए खोल देना है, और फिर इसे सर्व व्यापक बना देना है।

ऐसा ही ज्ञान ही विज्ञान का दावा करता है। ऐसा ज्ञान जब विवेकपूर्ण हो जाता है, तो यह विशिष्ट ज्ञान ही विज्ञान कहलाता है। उपरोक्त प्रक्रिया के अभाव में भी भारत के अधिकतर लोग ज्ञानवान होने का दावा करते हैं, और भारत की वर्तमान दुर्दशा का भी यही एकमात्र बडा कारण भी है। यह प्रक्रिया और परिणाम तो अध्यात्म में भी है, जो विज्ञान में भी मौलिक है।

जब अध्यात्म में भी ऐसा ही वैज्ञानिक क्रियाविधि अपने साथ विवेकपूर्ण और विशिष्ट अर्थ लेकर आता है, तो अध्यात्म कैसे विज्ञान नहीं है? जिन्हें विज्ञान की समझ नहीं है, और जो अध्यात्म की मौलिक समझ नहीं रखते है, उन्हें ही अध्यात्म विज्ञान से पृथक, विज्ञान से विशिष्ट और विज्ञान से उच्चस्थ दिखता है।

विज्ञान एक निश्चित प्रक्रिया (Process) है, जबकि अध्यात्म एक विशिष्ट विषय (Subject) है।

विज्ञान एक कार्यप्रणाली (Methodology) है, जबकि अध्यात्म एक विशिष्ट अवस्था (Stages) है।

विज्ञान किसी विषय की क्रियाविधि (Mechanism) को समझाता है, जबकि अध्यात्म ज्ञान का सर्वोच्च अवस्था है।

विज्ञान के विकास में कई सहभागी हों सकते हैं, जबकि अध्यात्म में कोई अकेला ही चल सकता है।

विज्ञान में गुरु और शिष्य, यानि ज्ञान देने वाला और ज्ञान लेने वाला दो भिन्न भिन्न अस्तित्व होता है, जबकि अध्यात्म में दोनों एक ही व्यक्ति (ज्ञान देने वाला और पाने वाला) होता है।

अब हमें आगे बढ़ने से पहले अध्यात्म को समझ लेना चाहिए।अध्यात्म शब्द ‘अधि’ यानि ‘ऊपर’ और ‘आत्म’ (Self) से बना है, अधि और आत्म। जब किसी का आत्म अधिक यानि ऊपर यानि अनन्त प्रज्ञा (Infinite Intelligent) से जुड़ जाता है, तो यही “ध्यात्म” कहलाता है, और तब वह व्यक्ति अनन्त प्रज्ञा से अनन्त स्वरुप का ज्ञान प्राप्त करने लगता है। ऐसे ज्ञान आभास, सहज ज्ञान, अंतर्ज्ञान (Intuition) के रूप में आते हैं और यह नवाचार (Innovation) का आधार बनता है। किसी के आत्म (Self, not Soul) को उसका मन (Mind) या चेतन (Consciousness) भी कहते हैं। इस तरह चेतन की अवस्था क्रमशः अचेतन, अवचेतन, चेतन, एवं अधिचेतन होता है। अतः चेतन का अनन्त प्रज्ञा से जुड़ना ही अध्यात्म है। कुछ धूर्त साज़िश के तहत् आत्म को आत्मा से प्रतिस्थापित कर देते हैं, जो स्पष्टतया गलत और मनगढ़ंत है।

इस तरह स्पष्ट है कि अध्यात्म विज्ञान का एक विशिष्ट अवस्था या विशेषज्ञता होता है। यह एक कौशल है , जिसे कोई भी सीख सकता है, विकसित कर सकता है। इसमें अनन्त प्रज्ञा से ज्ञान प्राप्त किया जाता है। इस संदर्भ में कुछ आध्यात्मिक व्यक्ति के नाम में तथागत बुद्ध, अल्बर्ट आइंस्टीन, कार्ल मार्क्स, सिग्मंड फ्रायड, स्टीफन हॉकिंग आदि आदि को ले सकते हैं, और ऐसे ही कई और उदाहरण हैं। लेकिन ढोंगी पाखंडी बाबाओं ने अपने “अंदाजों” (Styles) के आकर्षक और व्यापक मार्केटिंग के रणनीति के अन्तर्गत ज्ञान के इस सर्वोच्च अवस्था के शब्दावली का उपयोग करते हैं। और हमारे तथाकथित ज्ञानी और विज्ञानी बुद्धजीवी भी अपने शब्दावली में इसे प्रयोग में ला कर उसे मान्यता देते रहते हैं।

मुझे अब समाज के “पके हुए”, “थके हुए”, और “बिके हुए” लोगों से उम्मीद भी नहीं है। भविष्य युवाओं का है, युवाओं के लिए है, और इसे निष्पादित होना भी युवाओं के द्वारा ही है।  ध्यान रहे कि मैंने युवाओं में शारीरिक युवाओं को और बौद्धिक युवाओं (इसमें शारीरिक उम्र आधार नहीं है) को भी शामिल किया है। आप घालमेल को समझें, बारिकियों को जानें और भारत को फिर से “विश्व गुरु” (Global Leader) बनाएं।

आचार्य निरंजन सिन्हा 


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