July 24, 2024 |

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जयंती पर विशेषः किसान नेता चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न कब?

Sachchi Baten

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के साथ बड़े किसान नेता थे चौधरी साहब

 

राजेश पटेल


आजादी के बाद किसान नेता बनकर उभरे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न से कब नवाजा जाएगा। उनके निधन के बाद से ही लगातार यह सवाल उठ रहा है। लेकिन किसी सरकार ने इस दिशा में पहल नहीं की। जबकि इस दौरान वे भी सरकार में आए, जिन्होंने राजनीति का ककहरा चौधरी चरण सिंह से सीखा और सफलता भी प्राप्त की।

चौधरी चरण सिंह (23 दिसंबर 1902 – 29 मई 1987) वह भारत के किसान राजनेता एवं पाँचवें प्रधानमंत्री थे। उन्होंने यह पद 28 जुलाई 1979 से 14 जनवरी 1980 तक संभाला। चौधरी चरण सिंह ने अपना संपूर्ण जीवन भारतीयता और ग्रामीण परिवेश की मर्यादा में जिया।

बाबूगढ़ छावनी के निकट नूरपुर गांव, तहसील हापुड़, जनपद गाजियाबाद, कमिश्नरी मेरठ में काली मिट्टी के अनगढ़ और फूस के छप्पर वाली मड़ैया में 23 दिसम्बर, 1902 को आपका जन्म हुआ। चौधरी चरण सिंह के पिता चौधरी मीर सिंह ने अपने नैतिक मूल्यों को विरासत में चरण सिंह को सौंपा था।

चरण सिंह के जन्म के 6 वर्ष बाद चौधरी मीर सिंह सपरिवार नूरपुर से जानी खुर्द के पास भूपगढ़ी आकर बस गये थे। यहीं के परिवेश में चौधरी चरण सिंह के नन्हें हृदय में गांव-गरीब-किसान के शोषण के खिलाफ संघर्ष का बीजारोपण हुआ। आगरा विश्वविद्यालय से कानून की शिक्षा लेकर 1928 में चौधरी चरण सिंह ने ईमानदारी, साफगोई और कर्तव्यनिष्ठा पूर्वक गाजियाबाद में वकालत प्रारम्भ की।

वकालत जैसे व्यावसायिक पेशे में भी चौधरी चरण सिंह उन्हीं मुकदमों को स्वीकार करते थे, जिनमें मुवक्किल का पक्ष न्यायपूर्ण होता था। कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन 1929 में पूर्ण स्वराज्य उद्घोष से प्रभावित होकर युवा चरण सिंह ने गाजियाबाद में कांग्रेस कमेटी का गठन किया। 1930 में महात्मा गाँधी द्वारा सविनय अवज्ञा आन्दोलन के तहत नमक कानून तोडने का आह्वान किया गया। गाँधी जी ने ‘‘डांडी मार्च‘‘ किया। आजादी के दीवाने चरण सिंह ने गाजियाबाद की सीमा पर बहने वाली हिण्डन नदी पर नमक बनाया। परिणामस्वरूप चरण सिंह को 6 माह की सजा हुई। जेल से वापसी के बाद चरण सिंह ने महात्मा गांधी जी के नेतृत्व में स्वयं को पूरी तरह से स्वतन्त्रता संग्राम में समर्पित कर दिया।

1940 के व्यक्तिगत सत्याग्रह में भी चरण सिंह गिरफतार हुए। फिर अक्टूबर 1941 में मुक्त किये गये। सारे देश में उस समय असंतोष व्याप्त था। महात्मा गाँधी ने करो या मरो का आह्वान किया। अंग्रेजों भारत छोड़ो की आवाज सारे भारत में गूंजने लगी। 9 अगस्त 1942 को अगस्त क्रांति के माहौल में युवक चरण सिंह ने भूमिगत होकर गाजियाबाद, हापुड़, मेरठ, मवाना, सरथना,  बुलन्दशहर के गाँवों में गुप्त क्रांतिकारी संगठन तैयार किया। मेरठ कमिश्नरी में युवक चरण सिंह ने क्रांतिकारी साथियों के साथ मिलकर ब्रितानिया हुकूमत को बार-बार चुनौती दी। मेरठ प्रशासन ने चरण सिंह को देखते ही गोली मारने का आदेश दे रखा था। एक तरफ पुलिस चरण सिंह की टोह लेती थी, वहीं दूसरी तरफ युवक चरण सिंह जनता के बीच सभाए करके निकल जाता था। आखिरकार पुलिस ने एक दिन चरण सिंह को गिरफ्तार कर ही लिया। राजबन्दी के रूप में डेढ़ वर्ष की सजा हुई। जेल में ही चौधरी चरण सिंह की लिखित पुस्तक ‘‘शिष्टाचार‘‘, भारतीय संस्कृति और समाज के शिष्टाचार के नियमों का एक बहुमूल्य दस्तावेज है।

उनकी विरासत कई जगह बंटी। आज जितनी भी जनता दल परिवार की पार्टियाँ हैं, उड़ीसा में बीजू जनता दल हो या बिहार में राष्ट्रीय जनता दल हो या जनता दल यूनाएटेड ले लीजिए या ओमप्रकाश चौटाला का लोक दल , अजीत सिंह का ऱाष्ट्रीय लोक दल हो या मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी हो, ये सब चरण सिंह की विरासत हैं।

वो किसानों के नेता माने जाते रहे हैं। उनके द्वारा तैयार किया गया जमींदारी उन्मूलन विधेयक राज्य के कल्याणकारी सिद्धांत पर आधारित था। एक जुलाई 1952 को यूपी में उनके बदौलत जमींदारी प्रथा का उन्मूलन हुआ और गरीबों को अधिकार मिला। उन्होंने लेखापाल के पद का सृजन भी किया। किसानों के हित में उन्होंने 1954 में उत्तर प्रदेश भूमि संरक्षण कानून को पारित कराया। वो 3 अप्रैल 1967 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। 17 अप्रैल 1968 को उन्होंने मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। मध्यावधि चुनाव में उन्होंने अच्छी सफलता मिली और दुबारा 17 फ़रवरी 1970 के वे मुख्यमंत्री बने। उसके बाद वो केन्द्र सरकार में गृहमंत्री बने तो उन्होंने मंडल और अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना की। 1979 में वित्त मंत्री और उपप्रधानमंत्री के रूप में राष्ट्रीय कृषि व ग्रामीण विकास बैंक [नाबार्ड] की स्थापना की।] 28 जुलाई 1979 को चौधरी चरण सिंह समाजवादी पार्टियों तथा कांग्रेस (यू) के सहयोग से प्रधानमंत्री बने।

चौधरी साहब का स्पष्ट मानना था कि देश की खुशहारी का रास्ता खेत-खलिहानों से ही होकर गुजरता है।

 

चौधरी साहब की सरलता और महानता

सिपाही के लिए छोड़ दी कार
बात 1961 की है जब चौधरी चरण सिंह यूपी के गृहमंत्री थे। एक दिन कैबिनेट मीटिंग से बाहर निकलने के बाद सभी मंत्री अपनी-अपनी कार में बैठने लगे। इसी बीच चौधरी साहब की निगाह किनारे खड़े एक सिपाही की ओर गई, उसके हाथ से खून निकल रहा था। चौधरी चरण सिंह कार में बैठते-बैठते रुक गए और उस सिपाही के पास जाकर पूरे मामले की जानकारी ली। उसने बताया कि किसी मंत्री महोदय की कार का दरवाजा बंद करते समय उसकी उंगली दरवाजे में फंस गई थी।

चौधरी साहब ने उस सिपाही को अपनी कार में बैठने का आदेश देते हुए ड्राइवर से कहा, इसे जल्‍दी किसी डॉक्‍टर के पास ले जाओ। आसपास खड़े लोग बोले कि किसी दूसरी गाड़ी से सिपाही को इलाज के लिए भेजा जा सकता है तो चौधरी चरण सिंह बोले, ‘मैं किसी और गाड़ी से चला जाऊंगा लेकिन इसका फौरन डॉक्‍टर के पास पहुंचना जरूरी है।’ इस पूरे वाकये का जिक्र उनके सचिव रह चुके तिलक राम शर्मा ने अपनी किताब ‘माई डेज विद चौधरी चरण सिंह’ में किया है।

‘भुट्टे हैं चने नहीं, ऐसे नहीं खाते’
एक ऐसी ही घटना 1977 की है जब चौधरी चरण सिंह केंद्रीय गृहमंत्री थे। जब वह मेरठ दौरे पर आए और सर्किट हाउस पहुंचे तो वहां उन्हें किसी ने मकई के भुट्टे खाने को दिए। चौधरी साहब देसी आदमी थे। उन्‍हें गन्‍ने, भुट्टे और आम बेहद पसंद थे। इतना ही नहीं इन्‍हें खाने का तरीका भी उनका एकदम देसी था। अब जिस समय चौधरी साहब भुट्टे खा रहे थे उसी समय एक और वरिष्‍ठ नेता भी उनकी देखादेखी भुट्टे खाने लगे।

थोड़ी देर बाद चौधरी चरण सिंह की निगाह उन पर गई तो देखा कि वह भुट्टे के दाने हाथ से निकाल-निकाल कर खा रहे थे। अब चौधरी साहब से रहा नहीं गया, अपने खास अंदाज में वह बोले, ‘भाई जी ये चने नहीं है भुट्टे हैं इन्हें मुंह लगाकर ही खाया जाता है।’ फिर वह नेता जी भी हंसते-हंसते चौधरी साहब की ही तरह भुट्टे खाने लगे।

… और खो गई चौधरी साहब की प्रिय शेरवानी
चौधरी साहब कितने मितव्‍ययी और सादगी पसंद थे यह एक दिलचस्‍प घटना से पता चलता है जब वह पहली बार 1967 में यूपी के मुख्‍यमंत्री बने। उनके पास उस समय एक ऊनी शेरवानी थी। वह काफी पुरानी हो चली थी इसलिए कुछ एक जगह पर फट गई थी। एक दिन चौधरी साहब ने उसे रफू करने के लिए एक दर्जी के पास भेजा। नियत दिन पर जब चौधरी साहब का स्‍टाफ शेरवानी लेने पहुंचा तो दर्जी ने कुछ दिन बाद आने को कहा, ऐसा कई बार हुआ। ठंड का मौसम आ गया था।

एक दिन स्‍टाफ ने दर्जी से सख्‍ती से पूछा कि वह शेरवानी दे क्‍यों नहीं देता तो वह कांपता हुआ बोला, ‘हुजूर वह शेरवानी गलती से कहीं गुम हो गई है।’ चौधरी चरण सिंह के स्‍टाफ के सदस्‍य यह सुनकर घबरा गए। उन्‍हें पता था कि फिजूलखर्ची और लापरवाही ये दोनों चीजें चौधरी साहब को सख्‍त नापसंद थीं। लेकिन अब कोई रास्‍ता ही न बचा था।

लिहाजा वे ह‍िम्‍मत करके चौधरी साहब के पास गए और पूरी बात डरते-डरते बताई। चौधरी साहब कुछ देर चुप रहने के बाद बोले, ‘अब कर ही क्‍या सकते हैं। दर्जी बेचारा गरीब आदमी है कहां से भरपाई करेगा। चलो इसी बहाने नई शेरवानी बन जाएगी।’ और इस बार जो शेरवानी बनी, उसे चौधरी चरण सिंह ने 1978 तक पहना। यह वाकया ‘एक और कबीर’ नाम की किताब में चर्चा में आया।

जब थाने में मांगी गई प्रधानमंत्री चौ. चरण सिंह से रिश्वत

सन 1979 की बात है। शाम 6 बजे एक किसान इटावा के ऊसराहार थाने में कुर्ता-धोती पहने पहुंचा और अपने बैल की चोरी की रपट लिखाने की बात की। सिपाही ने इंतजार करने को कहा। कुछ देर तक इंतजार करने के बाद फिर किसान ने रपट लिखने की गुहार की, मगर सिपाही ने अनसुना कर दिया। कुछ देर बाद सिपाही ने आकर कहा, ‘चलो छोटे दारोगा जी बुला रहे हैं।’ छोटे दारोगा ने पुलिसिया अंदाज में 4-6 आड़े-टेढ़े सवाल पूछे और बिना रपट लिखे किसान को डांट-डपट कर चलता किया।

जब वह किसान थाने से जाने लगा तो एक सिपाही पीछे से आया और बोला, ‘बाबा थोड़ा खर्चा-पानी दे तो रपट लिख ली जाएगी।’ रपट लिखे जाने की बात पर तो किसान खुश हुआ, लेकिन खर्चा-पानी की बात पर उसकी पेशानी में बल पड़ गए। किसान ने गुहार की कि वह एक गरीब किसान है, लेकिन काफी अनुनय-विनय के बाद भी जब बात नहीं बनी तो किसान कुछ रकम देने पर राजी हो गया। 35 रुपये की रिश्वत लेकर रपट लिखना तय हुआ। रपट लिख कर मुंशी ने किसान से पूछा, ‘बाबा हस्ताक्षर करोगे कि अंगूठा लगाओगे?’

किसान ने हस्ताक्षर करने को कहा तो मुंशी ने रोजनामचा आगे बढ़ा दिया, जिस पर प्राथमिकी का ड्राफ्ट लिखा था। किसान ने पेन के साथ अंगूठे वाला पैड उठाया तो मुंशी सोच में पड़ गया। हस्ताक्षर करेगा तो अंगूठा लगाने की स्याही का पैड क्यों उठा रहा है? किसान ने हस्ताक्षर में नाम लिखा, ‘चौधरी चरण सिंह’ और मैले कुर्ते की जेब से मुहर निकाल कर कागज पर ठोंक दी, जिस पर लिखा था ‘प्रधानमंत्री, भारत सरकार।’ ये देखकर पूरे थाने में हड़कंप मच गया। दरअसल वह उस समय के प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह थे जो थाने में औचक निरीक्षण करने पहुंचे थे। उसके बाद तो ऊसराहार का पूरा थाना सस्पेंड कर दिया गया।

 

चौधरी साहब के लिए जोर पकड़ रही भारत रत्न की मांग

किसान नेता पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाजे जाने की मांग जोर पकड़ रही है। उनकी जयंती के दिन समाजवादी चिंतक राम सिंह वागीश तथा किसान नेता बजरंगी सिंह कुशवाहा ने केंद्र सरकार से चौधरी चरण को भारत रत्न से सम्मानित करने की मांग की है। दोनों नेताओं ने कहा कि चौधरी साहब वाकई में इस सम्मान के हकदार थे।

हालांकि यह मांग समय-समय पर चौधरी साहब के निधन के बाद से ही उठ रही है, लेकिन संगठित रूप में नहीं।

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