July 23, 2024 |

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तो…प्रियंका के लिए सक्रिय राजनीति के रास्ते बंद हो गए?

Sachchi Baten

LOKSABHA ELECTION 2024
राहुल के अमेठी छोड़ने से उभरे कई सवाल! 

-प्रियंका रायबरेली में सोनिया गाँधी का प्रतिनिधित्व कर रहीं थीं

-रॉबर्ट बढेरा भी चाहते थे रायबरेली से लोकसभा लड़ना

-गाँधी परिवार से अब छूट गया है उनकी अमेठी का साथ

 

हरिमोहन विश्वकर्मा, लकनऊ। कांग्रेस की पारिवारिक सीट समझी जाने वाली रायबरेली लोकसभा सीट से राहुल गाँधी के नामांकन भरने के बाद अब पार्टी में ही चर्चा होने लगी है कि अमेठी छोड़कर राहुल गाँधी ने रायबरेली से नामांकन भरकर सही किया या गलत। स्वाभाविक रूप से ये राहुल का नहीं, पार्टी का निर्णय है। लेकिन पार्टी कार्यकर्त्ताओं का मानना है कि एक बार फिर प्रियंका गाँधी पर चोट हुई है।

स्वाभाविक रूप से प्रियंका गांधी वाड्रा का दावा रायबरेली पर राहुल के मुकाबले अधिक था, क्योंकि वे वहां सोनिया गांधी की उत्तराधिकारी के रूप में काम देख ही रही थीं। इसीलिए अब सवाल पूछा जा रहा है कि क्या राहुल की उम्मीदवारी से एक बार पुनः कांग्रेस ने प्रियंका की सक्रिय राजनीति में प्रवेश का रास्ता बंद कर दिया है।

यह भी कहा जा रहा है कि एक बार पुनः बहन ने भाई के लिए अपने राजनीतिक भविष्य की कुर्बानी दी है। हालांकि यह कहना अभी जल्दबाजी है, क्योंकि प्रियंका अब भी सक्रिय राजनीति में आ सकती हैं। बता दें कि शुक्रवार को राहुल के नामांकन में सोनिया के साथ राहुल गाँधी भी मौजूद थे।

दरअसल, 2022 के उप्र विधानसभा चुनाव में प्रियंका ने ‘ लड़की हूं, लड़ सकती हूं’, चुनावी नारे के साथ जमकर कांग्रेस का चुनावी अभियान चलाया था। किन्तु कांग्रेस को मिली बुरी हार के बाद प्रियंका से उप्र का प्रभार वापस ले लिया गया। प्रियंका के पति रॉबर्ट बढेरा भी खुलेआम रायबरेली से अपनी उम्मीदवारी जता चुके थे। किन्तु अंतिम परिणाम में यह सीट राहुल के हिस्से आई।

कहा जा रहा है कि यदि राहुल वायनाड और रायबरेली, दोनों लोकसभा सीटों से चुनाव जीत जाते हैं तो उन्हें एक सीट छोड़नी होगी। संभव है वो रायबरेली सीट छोड़ दें. क्योंकि राहुल दक्षिण के दुर्ग को छोड़कर भाजपा को विस्तार का अवसर नहीं देना चाहेंगे। फिर 2026 में केरल विधानसभा चुनाव में भी राहुल ही वहां पार्टी के स्टार प्रचारक होंगे। यदि राहुल रायबरेली छोड़ देते हैं तो तब प्रियंका का सक्रिय राजनीति में उतरना संभव है। तब पार्टी पर परिवारवाद के आरोपों का दबाव भी नहीं रहेगा और उपचुनाव के जरिए वो आराम से लोकसभा में दाखिल हो सकती हैं।

पिछले कुछ लोकसभा चुनावों को देखें तो अमेठी में कांग्रेस के परंपरागत वोटर का गांधी-नेहरू परिवार से मोहभंग हुआ है। 2004 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 76.20 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि भाजपा को मात्र 4.40 मत प्राप्त हुए थे। किंतु 2009 में कांग्रेस का वोट प्रतिशत 5 फीसद गिर गया। जबकि 2014 में यह 71.78 प्रतिशत से गिरकर 46.71 प्रतिशत पर आ गया।

2019 में कांग्रेस को 43.84 प्रतिशत वोट मिले, जबकि भाजपा ने करीब 50 प्रतिशत वोट शेयर के साथ अमेठी पर कब्जा कर लिया। राहुल गांधी के पास अपनी परंपरागत सीट पर वोट प्रतिशत में बढ़ोत्तरी के साथ ही इसे पुनः पार्टी की झोली में डालने का एक अवसर था, किंतु अब जबकि वे रायबरेली कूच कर चुके हैं तो इसका दांव उल्टा भी पड़ सकता है।

भाजपा द्वारा पूरे देश में एक नेरेटिव भी सेट किया जा सकता है कि जब कांग्रेस का सबसे लोकप्रिय चेहरा ही हार के डर से सुरक्षित सीट की तलाश में रहा तो पार्टी के अन्य उम्मीदवारों से क्या अपेक्षा करें? इसके अलावा मतदाताओं के मन में यह नैरेटिव भी सेट हो सकता है कि गांधी-नेहरू परिवार जिस सीट से हार जाता है, वहां वापस नहीं जाता। ऐसे में राहुल गांधी का अमेठी छोड़ रायबरेली आना भी मतदाताओं में भ्रम की स्थिति बनायेगा। ऐसे में कांग्रेस के समक्ष उत्पन्न इन दुविधाओं को दूर करने के लिए और भाजपा के नैरेटिव को ध्वस्त करने के लिए राहुल-प्रियंका को बहुत से सवालों का जवाब देना होगा, ताकि उनके समर्थकों और कार्यकर्ताओं सहित जनता में बन रही भ्रम की स्थिति समाप्त हो।


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