July 23, 2024 |

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प्रथम महिला शिक्षक सावित्रीबाई फूले की राह पर चल पड़ी हैं सीता

Sachchi Baten

सच्ची बातें…

विरोध सहकर भी कलाबाज जाति के बच्चों को शिक्षा से जोड़ा

-सरकारी स्कूल की महिला अध्यापक सीता त्रिवेदी ने तोड़ दी जाति की जंजीर भी

-अभिभावकों द्वारा अपमान किए जाने के बावजूद उनके बच्चों को स्कूल की राह दिखाई

 

राजीव शर्मा, शाहजहांपुर (उत्तर प्रदेश)। सीता त्रिवेदी में प्रथम महिला शिक्षक सावित्रीबाई फूले की झलक दिखती है। यह कहें तो ज्यादा अच्छा होगा कि सीता त्रिवेदी सावित्रीबाई फूले की राह पर चल रही हैं। सीता शाहजहांपुर जनपद के जलालाबाद थाना क्षेत्र में पड़ने वाले प्राइमरी स्कूल बझेड़ा में अध्यापक हैं।

अध्यापक हैं तो इसमें क्या खास बात है। सवाल उठना लाजमी है। खास बात है। सीता ने एक ऐसे समूह या जाति के बच्चों को शिक्षा की मुख्य धारा में जोड़ा है, जो भीख मांगकर या कला दिखाकर अपनी आजीविका चलाते हैं। कोई स्थाई ठिकाना नहीं। आज यहां, कल वहां।

सीता के प्रयास से ये बच्चे फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने के अलावा 40 तक का पहाड़ा सुना रहे हैं। इन बच्चों के स्कूल से जोड़ना इतना आसान नहीं था।

जानिए पूरी कहानी…

इस कार्य में उन्हें काफी कुछ सहना पड़ा, परंतु उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अंततः अपने मिशन में कामयाब हो गई।

सीता त्रिवेदी ने बताया कि 2019 से वह बझेड़ा प्राइमरी स्कूल में अध्यापक हैं। उन्हें बाल गणना का काम दिया गया। जब वह गांव में पहुंची तो लोगों ने उनसे कहा कि “उधर मत जाना, वहां कलाबाजों की बस्ती है”। इसके बाद बस्ती में जाने की इच्छा और बढ़ गई। जल्दी-जल्दी वह इस बस्ती में पहुंचीं तो पता चला कि उस बस्ती का कोई भी बच्चा स्कूल नहीं जाता है। कारण पूछने व शिक्षा का महत्व बताने पर महिलाओं ने उनका उपहास उड़ाते हुए कहा कि “यहां कितनी मास्टरनी आई और चली गई। आप भी अपना काम करो जाकर”। यहां का कोई बच्चा स्कूल नहीं जाएगा। स्कूल चला जाएगा तो भीख कौन मांगेगा या रस्सी पर कलाबाजी कौन दिखाएगा।

सीता ने बताया कि वह कई घरों में गईं। ज्यादातर घरों में उनसे बात नहीं की गई। कुछेक ने बात की तो कहा कि हम लोग मांगते खाते हैं। हमारे बच्चे कैसे पढ़ेंगे। वह भी तो मांगने सुबह ही निकल जाते हैं। इसके बाद उन्होंने एक-एक घर में जाकर शिक्षा का महत्व बताया। शिक्षित होकर अधिकारी एवं सफल उद्योगपति बनने की तमाम कहानी सुनाई। परिणाम यह निकला कि आज 40 बच्चे उनके विद्यालय में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि अब भी जो बच्चे अपनी कला दिखाने व मांगने चले जाते हैं, उन्हें वह विद्यालय समय के बाद दो घंटे पढ़ाती हैं। इसी बीच विद्यालय में बनने वाले मध्याह्न भोजन में कलाबाज जाति के बच्चों के साथ अन्य जातियों के बच्चों ने भोजन करना बंद कर दिया। इसके बाद उन्होंने छात्रों के परिजनों को बुलाकर जाति धर्म के इस भेदभाव को खत्म किया। अब सभी बच्चे मध्याह्न भोजन एक साथ करते हैं।

सीता ने बताया कि उन्होंने बच्चों को गर्म कपड़े, कापी, किताबें अपने पास से खरीद कर दिया है। उनके अभिभावकों के पास पैसे नहीं हैं। इसके अलावा बच्चों को शिक्षा की ओर प्रोत्साहित करने के लिए वह रोजाना बिस्किट तथा टॉफी भी बांटने लगीं। वह बताती हैं कि जब वह इन बच्चों को शिक्षा हेतु प्रेरित कर रही थीं, तब इन्हीं के साथी आदि ने उन्हें “पागल” तक की संज्ञा दे डाली।

जिलाधिकारी उमेश प्रताप सिंह ने बताया कि सीता का यह प्रयास काफी सराहनीय है। उसने 40 बच्चों को शिक्षा की मुख्य धारा से जोड़ा है। इस प्रयास से जातिगत आधारित जो कुरीतियां थीं, वह भी दूर हुई हैं। सभी बच्चे आपस में सामंजस्य बनाकर विद्यालय में ही मध्याह्न भोजन कर रहे हैं।

बेसिक शिक्षा अधिकारी रणवीर सिंह ने बताया कि उनके संज्ञान में जब यह विद्यालय आया, तब खंड शिक्षा अधिकारी सुनील कुमार के साथ विद्यालय पहुंचे। विद्यालय में कलाबाज जाति के 40 बच्चे शिक्षा अर्जित कर रहे हैं। 40 तक के पहाड़े व फर्राटेदार अंग्रेजी बोल रहे हैं। वह बताते हैं कि बच्चों के अंदर शिक्षा प्राप्त करने की ललक उन्होंने देखी है।

 


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