July 16, 2024 |

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नरेंद्र मोदी की असफलताओं से चिंतित है संघ नेतृत्व

Sachchi Baten

संघ-भाजपा के अंदर की कहानी कहता ‘आर्गेनाइजर’ का लेख

हिमाचल के बाद कर्नाटक की हार से बढ़ी चिंता

मोदी मैजिक और राष्ट्रवाद के फेल्योर पर है चिंता

इस साल 5 राज्यों के चुनाव को लेकर भी हो रहा मंथन

क्षेत्रीय क्षत्रपों पर दांव खेले जाने की रणनीति पर होगा अमल

 

हरिमोहन विश्वकर्मा

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दिल्ली। पिछले महीने कर्नाटक विधानसभा चुनाव में हार के बाद भाजपा -संघ में आंतरिक रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर काफी कुछ बदला है। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि प्रधानमंत्री का जो जादू लोकसभा चुनाव में दीखता है, वह अधिकतर विधानसभा चुनाव में दम तोड़ देता है। हिमाचल और कर्नाटक चुनाव के बाद यह धारणा अधिक पुख्ता हुई है।

आरएसएस के मुखपत्र ऑर्गेनाइजर में छपा एक आलेख भी इस बात की पुष्टि कर रहा है, जिसका सारांश है कि आखिर भाजपा कब तक नरेंद्र मोदी के मैजिक और हिंदूवाद के भरोसे रहेगी।

लेख कहता है कि प्रधानमंत्री मोदी का कथित करिश्मा और वैचारिक ताकत दोनों ही चरमोत्कर्ष को छू चुके हैं। अब आगे इसके विस्तार की संभावना नहीं है। स्थानीय व क्षेत्रीय नेतृत्व का विकल्प मोदी नहीं हो सकते, लिहाजा भाजपा को अपने क्षेत्रीय क्षत्रपों को मजबूत करना होगा, जो जनसंघ के दौर से पार्टी की बुनियादी ताकत रहे हैं।

‘ऑर्गेनाइजर’ और ‘पांचजन्य’ संघ के अंग्रेजी-हिंदी मुखपत्र हैं। संघ भाजपा को जो भी नसीहत या चेतावनी देना चाहता है, इन्हीं मुखपत्रों के आलेखों अथवा संपादकीय के जरिए कहता रहा है। संघ में सर्वेक्षण की कोई परंपरा नहीं है।

संघ अपने स्थानीय प्रचारकों के जरिए सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक और सामयिक सूचनाएं एकत्रित करता है और फिर भाजपा तक प्रेषित करता है। हालांकि संघ का यह बुनियादी एजेंडा भी नहीं है कि वह भाजपा की राजनीति की दिशा और दशा को दुरुस्त करे, लेकिन भाजपा संघ की सोच का ही अंतरंग हिस्सा है, इसीलिए महत्वपूर्ण चुनावों से पहले वह पार्टी को सचेत जरूर करता रहा है।

संघ के मुखपत्र में छपे आलेख में कर्नाटक चुनाव और वहां जनादेश खोने की चिंताएं साफ़ हैं। अब राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम राज्यों में इसी साल विधानसभा चुनाव होने हैं, लेकिन अगर ये चुनाव कर्नाटक की तर्ज पर हुए तो भाजपा को झटका लगना तय है।

लेख में उल्लिखित चीजों से यह भी लगता है कि संघ भी मानने लगा है कि अब देश की जनता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके मुद्दों व आश्वासनों से ऊबने लगी है। हालांकि अभी तक जितने भी सर्वेक्षण सामने आए हैं, उनमें प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता बाकी नेताओं के मुक़ाबले अभी भी सबसे अधिक है, इसलिए फिलहाल चिंता की बात नहीं है। लेकिन राहुल गांधी की बढ़ती स्वीकार्यता अवश्य चिंता की बात है।

संघ की सोच है कि भाजपा की जीतों में अब तक जातिवाद, क्षेत्रवाद, धार्मिक पहचान और मोदी के देशव्यापी करिश्मे का जो ‘गोंद’ था, अब वह टूटने लगा है और भाजपा का जो ‘यूएसपी’ था, उसके काफी भीतर तक कांग्रेस सेंध लगा चुकी है।

मोदी और भाजपा ने जो ‘लाभार्थी’ वोट बैंक तैयार किया था, वह कांग्रेस के  ‘गारंटी कार्यक्रम’ से दरक रहा है। इसलिए अब 81.5 करोड़ भारतीयों को ‘मुफ्त अनाज’ बांटना भी जीत की गारंटी नहीं है।

क्योंकि विपक्षी दलों की ‘मुफ्त बिजली’, मुफ्त शिक्षा, मुफ्त परिवहन, मुफ्त इलाज और अन्य भत्तों की ‘रेवड़ियां’ भी मतदाताओं को आकर्षित कर रहीं हैं, इसलिए वोटर्स बंट भी रहे हैं। बेशक जातिवाद एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, लेकिन राज्यों में जो भ्रष्टाचार व्याप्त है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उसकी काट नहीं हो सकते, और सिर्फ हिंदुत्व ही सत्ता-विरोधी लहर की भरपाई नहीं कर सकता।

भाजपा धार्मिक ध्रुवीकरण कर वोट हासिल करती रही है। अब उसके भरोसे ही चुनाव नहीं जीते जा सकते। भाजपा को नए, स्थानीय, क्षेत्रीय मुद्दों की पहचान करनी होगी और उन पर समर्थक वोट बैंक बनाना होगा। चुनावी लड़ाई क्षत्रप एकजुट होकर लड़ेंगे, नरेंद्र मोदी उनकी लड़ाई को अधिक पुख्ता और भरोसेमंद विस्तार दे सकते हैं, इसीलिए संघ भाजपा को सचेत कर रहा है कि आगामी लोकसभा और उसके पहले 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव आसान नहीं होंगे।

(लेखक राष्ट्रीय हिंदी दैनिक तरुण मित्र के प्रबंध संपादक हैं)


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