July 24, 2024 |

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कांग्रेस में प्रियंका गांधी के खिलाफ कौन कर रहा है साजिश ? पढ़िए…

Sachchi Baten

प्रियंका बिना जिम्मेदारी की महासचिव, राहुल कैम्प की साज़िश?

-कांग्रेस के अंत:पुर में आखिर चल क्या रहा है

-पार्टी के अंदर सोनिया, राहुल और प्रियंका के तीन गुट

– क्या कांग्रेस अंत:पुर की अंतर्कलह ने हराए तीन हिंदीभाषी राज्य

– हिमाचल को छोड़ अब तक किसी राज्य में नहीं चला प्रियंका का जादू

हरिमोहन विश्वकर्मा, नई दिल्ली। यह अटकलें तो लम्बे समय से लगाई जा रहीं थीं कि कांग्रेस में राहुल -प्रियंका गाँधी समर्थकों के बीच कुछ ठीक नहीं चल रहा है। लेकिन प्रियंका गाँधी से उप्र की जिम्मेदारी वापस लेने के बाद अब राजनीतिक गलियारों में यह माना जा रहा है कि मल्लिकार्जुन खड़गे ने राहुल गाँधी कैम्प के इशारे पर उक्त अटकलों पर मुहर लगा दी है।

तीन दिसंबर को आए चुनाव नतीजों में झटका खाने के बाद कांग्रेस में केंद्रीय स्तर पर फेरबदल तय हो गया था, लेकिन बड़े से बड़े राजनीतिक पंडित को भी उम्मीद नहीं थी कि कांग्रेस की तीसरी सबसे ताकतवर नेता प्रियंका वाड्रा कांग्रेस में तकरीबन पैदल कर दी जाएंगी।

कांग्रेस में सोनिया और राहुल के बाद प्रियंका ही सबसे ताकतवर नेता मानी जाती हैं। बेशक मल्लिकार्जुन खड़गे पार्टी के अध्यक्ष हैं, लेकिन देश की सबसे पुरानी पार्टी में गांधी-नेहरू परिवार के सदस्यों की हैसियत छिपी नहीं है। ऐसे में प्रियंका वाड्रा को दायित्वविहीन महासचिव बनाया जाना मामूली बात नहीं है।

कांग्रेसी के अंत:पुर से खबरें उड़कर आती रही हैं कि रणनीतियों को लेकर पार्टी परिवार में पहले ही एका नहीं है। कांग्रेस में सोनिया गांधी के चहेते नेताओं का अलग समूह है तो राहुल का अपना गुट है। इसी तरह प्रियंका का भी अपना गुट है। जाहिर है कि जब पार्टी का प्रथम परिवार ही एक नहीं रह पाएगा तो पूरी पार्टी में एकता नहीं होगी और वह अपने सबसे बड़े सियासी दुश्मन मोदी-शाह का मुकाबला भी नहीं कर सकती है।

कांग्रेस में प्रियंका को बिना जिम्मेदारी का महासचिव बनाने का मतलब है कि पार्टी नेतृत्व को उनकी क्षमता पर भरोसा कम हो रहा है। उन्हें महासचिव पद से हटाया जाता तो उसका जवाब देना पार्टी के लिए मुश्किल होता, शायद यही वजह है कि उनका ओहदा नहीं हटाया गया है। एक तरह से पार्टी ने साफ किया है कि महत्वपूर्ण राज्यों पर राहुल की ही चलेगी, और प्रियंका के लिए अभी कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं है।

दरअसल, 2004 के आम चुनावों में राहुल गांधी की एंट्री के वक़्त सबकी चाहत थी कि राहुल की बजाय गांधी-नेहरू परिवार की अगली पीढ़ी के प्रतिनिधि के तौर पर कांग्रेस में प्रियंका को सक्रिय किया जाना चाहिए। सबको लगता था कि राजनीतिक समझ के लिहाज से प्रियंका अपने भाई राहुल की तुलना में बीस हैं।

कुछ लोगों ने दबी जुबान से यह भी कहा कि सोनिया गांधी ने पुरानी सोच के मुताबिक अपने उत्तराधिकारी के तौर पर बेटे को बेटी पर तवज्जो दिया। 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के ठीक पहले जब प्रियंका गांधी को राजनीति में सक्रिय किया गया, तो उन्हें एक बार फिर इंदिरा गांधी का प्रतिरूप बताने की तैयारी हुई। उनकी नाक से लेकर आवाज तक को इंदिरा जैसा बताया गया।

प्रियंका के सलाहकारों ने उनकी छवि गढ़ने के लिए ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’, का नारा भी गढ़ दिया। यह स्थापित करने की कोशिश हुई कि मोदी-शाह के दौर को खत्म करने के लिए कांग्रेस के हाथ ताकतवर हथियार लग गया है। उस समय एक बार तो बीजेपी भी प्रियंका की सक्रियता से किंचित सहम गई थी। लेकिन उत्तर प्रदेश में 2022 के विधानसभा चुनाव नतीजों ने साफ कर दिया कि कांग्रेस का प्रियंका रूपी हथियार भी कारगर नहीं है।

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने राज्य को दो हिस्सों में बांट दो-दो महासचिवों को जिम्मा दिया। पश्चिम की कमान ज्योतिरादित्य सिंधिया को दी गई तो पूरब की जिम्मेदारी प्रियंका के पास रही। पर उप्र ने दोनों को निराश किया।

हां, उसके बाद हुए चुनावों में हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस जीत गई। हिमाचल की कमान कमोबेश प्रियंका ने ही संभाल रखी थी। प्रियंका ने एक तरह से पंजाब में भी चुनाव अभियान चलाया, लेकिन प्रियंका का कोई दांव यहां नहीं चला। प्रियंका के रहते हुए भी पंजाब में सत्ता ऐसी उखड़ी कि निकट भविष्य में कांग्रेस की राज्य में वापसी की सभी उम्मीदें खत्म हो गईं।

राजस्थान में सचिन पायलट उनके नजदीकी माने जाते रहे। लेकिन अशोक गहलोत के दांव के आगे उनकी नहीं चली। सचिन के अध्यक्ष रहते राजस्थान 2018 का चुनाव जीतने में कामयाब रहा। तब अशोक गहलोत कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की टीम में पार्टी के संगठन मंत्री का दायित्व संभाल रहे थे। लेकिन जैसे ही राजस्थान में जीत मिली, अशोक गहलोत ने दिल्ली से जयपुर का रुख कर लिया और सत्ता पर काबिज होने में कामयाब रहे। सचिन मन मसोस कर रह गए। जब उनकी उपेक्षा बढ़ी तो उन्होंने बगावती रुख अख्तियार किया। लेकिन प्रियंका उन्हें मनाने में कामयाब रहीं। बहरहाल, न तो राजस्थान में प्रियंका कुछ हासिल कर पाईं और न छत्तीसगढ़ में। जबकि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री बघेल को भी प्रियंका का नजदीकी कहा जाता है।


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