July 24, 2024 |

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बेरोजगारी का प्राथमिक कारण गलत वित्तीय नीतियां, कैसे ? यह जानने के लिए पढ़ें इस आर्टिकल को

Sachchi Baten

सबको रोजगार और नैतिक, प्रदूषण मुक्त, समृद्ध भारत के लिए राजकोषीय नीति : आधुनिक मौद्रिक प्रणाली और केंद्र सरकार की भूमिका

 

डॉ. राजकुमार सिंह

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यह लेख राज्य, रुपये या मुद्रा, रोजगार और राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया के बीच जटिल संबंधों पर प्रकाश डालता है। रुपये का विस्तार और संकुचन केवल भारत सरकार ही कर सकती है। देश में बेरोजगारी का प्राथमिक कारण केंद्र सरकार की गलत वित्तीय नीतियों में ही निहित है। मुद्रा बनाने के लिए राज्य की  कानूनी शक्ति का पूर्ण उपयोग कर, देश के सभी बेरोजगार व्यक्तियों और संसाधनों का प्रभावी ढंग से उपयोग किया जा सकता है, जिससे  उन्नत राष्ट्र का निर्माण हो सकता है।

देश की वर्तमान आर्थिक और वित्त व्यवस्थाओं में क्या दिक्कतें हैं जिके कारण बेरोजगारी और गरीबी है? 

आधुनिक युग में जैसे मशीनों को चलाने के लिए ऊर्जा की जरूरत होती है, वैसे ही अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए मुद्रा की जरूरत होती है। यह मुद्रा उत्पादक के पास उत्पादन करने के लिए जरूरी है और इन उत्पादन और सेवाओं को  उचित कीमतों पर बेचने के लिए उपभोक्ता के पास भी होना जरूरी है, तभी यह चक्र चलता है | मुद्रा का स्रोत केंद्र सरकार की कानूनी शक्ति में होता है।

तकनीकी के विकास के कारण अर्थव्यवस्था में उत्पादकता बहुत बढ़ जाती है लेकिन बहुत कम लोगों द्वारा बहुत सामान पैदा होने के कारण बहुत सारे लोग बेरोजगार हो जाते हैं। बेरोजगारी के कारण उनके पास सामान और सेवाओं को खरीदने का मुद्रा नहीं होता  हालांकि वे सामान अब प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हो सकते हैं। इसके चलते दूसरी समस्या भी पैदा हो जाती है जिसमें किसानों और उद्योगों आदि को अपना सामान और सेवाएं उचित कीमतों पर बेचने में बहुत दिक्कत होने लगती है क्योंकि उनको खरीदने वाले कम हो जाते हैं जिसके कारण किसान और उद्योग अपनी उत्पादन क्षमता का पूरी तरह उपयोग नहीं कर पाते हैं और नई उत्पादन क्षमताओं का विकास नहीं करते हैं। इस तरह हम देखते हैं कि तकनीकी के चलते एक तरफ बेरोजगारी फैल जाती है और दूसरी तरफ देश की उत्पादक क्षमताओं का पूर्ण उपयोग और सामर्थ्य अनुसार विकास नहीं हो पाता है।

क्या यह धारणा सत्य है कि हमारा पैसा केंद्र सरकार को वित्तपोषित करता है और देश को चलाता है?

कुछ लोग यह दावा करते हैं कि वे करों का भुगतान करते हैं जिससे सरकार चलती है। इस कथन को पहली नज़र में सही माना जा सकता है, लेकिन बारीकी से जांच करने पर यह सबसे बेतुका तर्क है और अर्थव्यवस्था कैसे काम करती है, इसके बारे में पूरी तरह से अज्ञानता दिखाता है। करों से राष्ट्रीय संपत्ति और विकास नहीं होता। वास्तव में, सच्ची समृद्धि प्राकृतिक विश्व में मेहनती जनता की गतिविधियाँ से उत्पन्न होती है। जैसे कि भूमि को जोतने से, धातुओं का खनन करने से, पेड़ों से,आवासों के निर्माण से, हमारे जीने के स्थानों और पर्यावरण की सफाई और संरक्षण करने से, महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा स्थापित करने से, कच्चे माल को मानव उपभोग के लिए तैयार उत्पादों में बदलने से, या गहन बौद्धिक प्रयासों के माध्यम से नए उत्पादों, प्रौद्योगिकियों या नवाचारिक प्रक्रियाओं को विकसित करने से। ये काम आबादी के विशाल बहुमत द्वारा किया जाता है, जिसमें किसान, श्रमिक, वैज्ञानिक, इंजीनियर, डॉक्टर, प्रबंधक और अन्य पेशेवर शामिल हैं। श्रमिक आबादी और मेहनती जनता के परिश्रमिक योगदान के बिना कोई भी वस्तु और सेवा मौजूद नहीं होती।

आधुनिक मौद्रिक प्रणाली के विकास को समझने में कराधान, मुद्रा, रोजगार और राष्ट्र-निर्माण के बीच महत्वपूर्ण परस्पर क्रिया को पहचानना शामिल है। ये तत्व किस प्रकार परस्पर क्रिया करते हैं और किसी देश के आर्थिक परिदृश्य और राष्ट्र निर्माण को आकार देते हैं?

1850 के आसपास ब्रिटिश उपनिवेश काल के दौरान अफ्रीका में मौद्रिक प्रणाली का विकास दिलचस्प अंतर्दृष्टि प्रदान करता है। उस अवधि के दौरान जब अंग्रेजों ने अफ्रीका में उपनिवेश स्थापित किए, उनका सामना मुख्य रूप से आत्मनिर्भर अफ्रीकी समाजों से हुआ। ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा उपनिवेशीकरण के दौरान भारत में मौजूद अधिक संरचित मुद्रा प्रणाली के विपरीत, ये समाज आत्मनिर्भर आधार पर संचालित होते थे, जहां व्यक्ति अपना भोजन स्वयं उगाते थे और अपने कपड़े का उत्पादन करते थे। ब्रिटिश उपनिवेशवादियों की उस विशेष भूमि पर कॉफ़ी की खेती करने की इच्छा थी। हालाँकि, इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए स्थानीय मजदूरों की भागीदारी आवश्यक थी। उपनिवेशवादियों को एक महत्वपूर्ण निर्णय का सामना करना पड़ा, उनके सामने केवल दो व्यवहार्य विकल्प थे: पहला था दासता का सहारा लेना, लोगों को उनकी इच्छा के विरुद्ध जबरन श्रम के लिए मजबूर करना। दूसरे विकल्प में कर प्रणाली की स्थापना के माध्यम से अप्रत्यक्ष दृष्टिकोण लागू करना शामिल था। झोपड़ी कर(Hut Tax) पहली बार 1849 में नेटाल, दक्षिण अफ्रीका में लागू किया गया था। बाद में इसे सिएरा लियोन, नाइजीरिया और केन्या सहित अफ्रीका में अन्य ब्रिटिश उपनिवेशों तक बढ़ा दिया गया था। कर आम तौर पर प्रति झोपड़ी कुछ शिलिंग (एक पूर्व ब्रिटिश सिक्का और एक पाउंड के बीसवें हिस्से या बारह पेंस के बराबर मौद्रिक इकाई) की दर से निर्धारित किया गया था। झोपड़ी कर लगाने से अफ्रीकियों को अपनी झोपड़ियों की सुरक्षा के लिए कर दायित्वों को पूरा करने के लिए मुद्रा अर्जित करने के लिए मजबूर होना पड़ा। इससे अक्सर कृषि और अन्य उद्योगों में मजदूरों के रूप में उनकी भागीदारी की आवश्यकता होती थी, जो मुद्रा अर्जित करने के लिए औपनिवेशिक अधिकारियों की इच्छाओं के अनुरूप थी। झोपड़ी कर का प्राथमिक उद्देश्य अफ़्रीकी श्रमिकों पर नियंत्रण स्थापित करना था। अफ्रीकियों को करों का भुगतान करने के लिए मजबूर करके, ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन ने उन्हें अपनी कर देनदारियों को पूरा करने के लिए आवश्यक धन उत्पन्न करने के लिए मजदूरी मांगने के लिए प्रभावी ढंग से मजबूर किया। यह व्यवस्था औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था की श्रम मांगों को पूरा करने के लिए काम करती थी। इस प्रणाली से एक स्थानीय मौद्रिक प्रणाली का विकास होगा, जिसमें व्यक्तियों को करों का भुगतान करने के लिए मुद्रा अर्जित करने के लिए काम करना होगा, और यह मुद्रा केवल उपनिवेशवादियों/राज्य के माध्यम से ही पहुंच योग्य होगी। यह ऐतिहासिक संदर्भ अफ़्रीका में मौद्रिक आधारित अर्थव्यवस्था के विकास पर प्रकाश डालता है। और कराधान, मुद्रा और राज्य के उद्देश्यों/राष्ट्र निर्माण के बीच महत्वपूर्ण परस्पर क्रिया पर प्रकाश डालता है।

मुद्रा जारीकर्ता और मुद्रा उपयोगकर्ता में क्या अंतर है? देश में मुद्रा का विस्तार या संकुचन (घटना और बढ़ना) कैसे होता है और यह हमारी अर्थव्यवस्था और राष्ट्र निर्माण को कैसे प्रभावित करता है?

सत्ता, मुद्रा, अर्थव्यवस्था और राष्ट्र निर्माण में गहरा संबंध है। सत्ता द्वारा मुद्रा का निर्माण किया जाता है और अर्थव्यवस्था में लगाया जाता है और देश के नागरिक मुद्रा के उपयोगकर्ता होते हैं और उनका जीवन और भविष्य इस मुद्रा की आय पर निर्भर करता है। इस तरह नागरिकों, मुद्रा, अर्थव्यवस्था और सत्ता द्वारा राष्ट्र निर्माण होता है। इसका मतलब यह है कि उत्पादकों और अन्य नागरिकों को मुद्रा के लिए कार्य करना होता है जिससे वह अपना जीवन और भविष्य सुखमय और सुरक्षित बना सके। केंद्र सरकार जो मुद्रा जारीकर्ता होता है या कहें मुद्रा का निर्माण करता है उसका उद्देश्य देश में मानव और प्राकृतिक संसाधनों का पूर्ण उपयोग कर राष्ट्र निर्माण करना होता है। उदाहरण के तौर पर जब अपने देश की केंद्र सरकार ₹100 खर्च करती है और ₹90 टैक्स के रूप में वापस लेती है तो हमारे देश में आर्थिक गतिविधि बढ़ती है और ₹10 देश की अर्थव्यवस्था में मुद्रा उपयोगकर्ताओं के पास रह जाते हैं और अगर केंद्र सरकार अपनी नीति और आर्थिक स्थिति को देखते हुए ₹100 अर्थव्यवस्था में खर्च करती है और ₹110 टैक्स के रूप में लेती है तो ₹10 मुद्रा उपयोगकर्ताओं से या कहें अपने देश की अर्थव्यवस्था से वापस चले जाते हैं और इन्हें जोड़ घटा कर  हम पता कर सकते हैं कि हमारे देश की मुद्रा में क्या बदलाव हुए हैं जिससे हम समझ सकते हैं कि स्वतंत्रता के समय हमारे पास कुछ मुद्रा थी और अब अगर मुद्रा अलग है तो वह मुद्रा कैसे आई | अगर देश में बेरोजगारी गरीबी ज्यादा रहेगी तो निवेश नहीं होगा और यहां पर केंद्र सरकार को अपनी वित्त नीति से मुद्रा का निर्माण कर सभी लोगों को रोजगार देने की नीति अपनाना जरूरी हो जाता है |

सबको रोजगार देने के लिए रुपये कहां से आएंगे?

भारत सरकार अपनी कानूनी शक्ति के द्वारा रुपए बनाती है या जारी करती है और यह शक्ति सिर्फ भारत सरकार को है कि वह अपनी वित्त नीति द्वारा इतने सारे रुपए उपलब्ध करा सकती है।

करोड़ों बेरोजगार युवक और युवतियों को कहां या किस तरह का कार्य मिलेगा?

भौतिक, बुनियादी और समाज उपयोगी ढांचा जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून व्यवस्था, सुरक्षा, सफाई, पर्यावरण सुरक्षा, शोध, डिजिटल डाटा प्रबंधन व प्रशासन, मनोरंजन, खेलकूद, सामुदायिक सेवाओं, चाइल्ड केयर, ओल्ड एज केयर, जल संसाधन, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा आदि को विकसित और उन्नत करने की दिशा में बड़ी संख्या में रोजगार सृजन किया जा सकता है।

सरकारी खर्च के कारण भ्रष्टाचार पर कैसे लगाम लगाई जा सकती है?

अपने देश में रुपए को डिजिटल कर दिया जाए तो वित्तीय लेन देन का आसानी से पता किया जा सकता है जिससे वित्तीय अनियमितताओं को पहचानने और नियंत्रण करने में मदद मिल सकती है।

डिजिटल तकनीकी का उपयोग कर डॉक्यूमेंटेशन पारदर्शिता, जवाबदेही और लोगों की भागीदारी बनायी जा सकती है और पेशेवर ढंग से कार्यों और प्रक्रियाओं की गुणवत्ता और ईमानदारी बनाए रखी जा सकती है।

सबको रोजगार की गारंटी होने से लोगों में आत्मविश्वास और नैतिकता का विकास होगा और देश में भ्रष्टाचार की संस्कृति खत्म होगी।

इतनी बड़ी संख्या में नौकरी प्रदान करने से क्या अर्थव्यवस्था उन्नत होगी या चरमरा जाएगी?

तकनीकी के विकास के कारण कृषि और उद्योग में सामान और सेवाओं को बनाने की अपार क्षमता विकसित हो गई है। लेकिन बेरोजगारी और गरीबी के कारण इन उत्पादों और सेवाओं को खरीदने वालों के पास पैसे ना होने के कारण हम अपने देश की उत्पादक क्षमताओं का पूर्ण उपयोग और विकास नहीं कर पा रहे हैं। इतने सारे रोजगार देने के कारण इनके पास सामान और सेवाएं खरीदने की क्षमता आएगी जिससे अपने देश की कृषि और उद्योगों की क्षमताओं का उपयोग हो पाएगा और उनका डिमांड के हिसाब से विकास भी हो पाएगा। इस तरह हम पाते हैं कि सबको रोजगार देने की नीति से अपने देश की अर्थव्यवस्था में बहुत तेजी से विकास होगा।

क्या सबको रोजगार देने की नीति से महंगाई बहुत बढ़ जाएगी?

अभी अपने देश की बहुत सारी उत्पादक क्षमता का आंशिक उपयोग ही हो पा रहा है क्योंकि गरीबी बेरोजगारी के कारण लोगों के पास क्रयशक्ति नहीं है। लेकिन जैसे ही सब को रोजगार देने से उनके पास क्रयशक्ति आएगी तो अब किसान, दूध उत्पादक, छोटे- मझोले उद्योग और अन्य उद्योग अपनी क्षमताओं का पूर्ण उपयोग कर ज्यादा सब्जी दूध और जरूरी उत्पादक सामानों की पैदावार बढ़ाएंगे जिसके कारण इन सामान और सेवाओं की उपलब्धता बढ़ेगी और इन चीजों की कीमतों में भी स्थिरता आएगी।

कुछ कीमतों में वृद्धि हो सकती है इसका असर कम करने के लिए जरूरी सामान और सेवाएं पैदा करने वालों को ब्याज मुक्त धन उपलब्ध कराकर लागत में कटौती और क्षमता का विस्तार किया जा सकता है।

कुछ उत्पादक इन परिस्थितियों का दुरुपयोग कर मुनाफाखोरी कर सकते हैं लेकिन बेहतर प्रशासन और कर प्रणाली बनाकर इस तरह की लालची और मुनाफाखोरी सोच पर लगाम लगाई जा सकती है।

पूर्ण रोजगार द्वारा उन्नत राष्ट्र निर्माण की क्या सोच है?

करोड़ों कार्यों को पैदा कर देश की मानवीय,सोशल पूंजी (गरिमा, इज्जत और विश्वास), आधारभूत संरचना का विस्तार, पर्यावरण की उचित देखभाल  तथा अनुसंधान और विकास द्वारा देश की अल्पावधि और दीर्घकालिक उत्पादकता तथा क्षमता को बहुत बढ़ा सकते हैं।  देश को खाने में आत्मनिर्भर और बसों,ट्रकों को बिजली से चला कर तेल पर निर्भरता घटा सकते हैं जिससे हम ऊर्जा में भी आत्मनिर्भर हो जाएंगे। इस काम के लिए देश की प्रशासनिक क्षमताओं का विकास निहायत जरूरी है। इसका एक पहलू है डिजिटलाइजेशन, जिसका उपयोग कर हम लोगों की भागीदारी सुनिश्चित कर सकते हैं; ऐसी भागीदारी जन सशक्तिकरण का रास्ता खोल सकती है और इस तरह उनकी गरिमा को सुनिश्चित किया जा सकता है. ऐसी भागीदारी द्वारा प्रशासनिक प्रक्रियाओं को लगातार उन्नत और मानवीय बनाया जा सकता है | उन्नत टेक्नोलॉजी में निवेश बढ़ाकर आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ सकते हैं ।

राष्ट्रीय मुद्रा का उपयोग कर पूर्ण रोजगार और राष्ट्र निर्माण के अतीत में क्या कोई उदाहरण हैं?

अमेरिका में 1933 में न्यू डील  नाम की नीति बनाई गयी थी जिसमें व्यापक पैमाने पर रोजगार निर्माण किए गए थे जिसके द्वारा राष्ट्र निर्माण के कार्यों में उन्नति कर देश को उन्नत बनाने के लिए आधार रखा गया था। जर्मनी में भी करीब 1933 में सभी को रोजगार की नीति बनाई गई और बेरोजगारी को गैरकानूनी कर दिया गया। इतने सारे रोजगार निर्माण करने से जर्मनी में कृषि, उद्योग, अनुसंधान और विकास तथा अन्य तरह के इंफ्रास्ट्रक्चर का बहुत विकास हुआ। 90 के दशक में चीन ने भी इस तरह की वित्तीय और प्रशासनिक नीतियां अपनाकर अपने यहां बड़े पैमाने पर रोजगार निर्माण किया और यह नीति चीन को उन्नत राष्ट्र बनाने में मददगार साबित हुई।

पिछले 20 साल में हमारे देश में भी मशीनी युग के साथ-साथ डिजिटल और सूचना प्रौद्योगिकी में महत्वपूर्ण उन्नति हुई है और हम सूचना और डिजिटल तकनीकी का उपयोग कर मानव और अन्य भौतिक संसाधनों का बेहतर नियोजन और समन्वयन कर इस मशीनी युग का  बेहतर उपयोग कर अपने देश से बेरोजगारी और गरीबी के दर्द को बहुत जल्द खत्म कर प्रदूषण मुक्त, नैतिक, उन्नत, और खुशहाल भारत का निर्माण कर सकते हैं।

(लेखक दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी दिल्ली में प्रोफेसर हैं।)


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