July 23, 2024 |

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मिर्जापुर के गौरवः 1940 में जिनकी फोर्ड कार में बैठकर रांंची से रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने गए थे गांधी जी

Sachchi Baten

 

जमालपुर में आज जो सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र है, वह पहले तुलसीराम जायसवाल मेमोरियल हॉस्पिटल था

 

-इसका निर्माण अपनी जमीन में लक्ष्मीनरायन जायसवाल और रामनरायन जायसवाल ने कराया था

                                                                             राय साहेब लक्ष्मी नरायन

 

-इसी परिवार के शिवनरायन जायसवाल रांची के पहले मेयर रहे

-आजादी के आंदोलन में इस परिवार का बड़ा योगदान

-बापू के आह्वान पर अंग्रेजों द्वारा दी गई राजा राय बहादुर की उपाधि लौटाई

 

राजेश पटेल/राजेश कुमार दुबे, जमालपुर (सच्ची बातें)। बहुत कम लोग जानते होंगे। मिर्जापुर जनपद के जमालपुर ब्लॉक मुख्यालय पर आज जो सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र है, वह पहले तुलसीराम जायसवाल मेमोरियल हॉस्पिटल था। इसका निर्माण अपनी जमीन में लक्ष्मीनरायन जायसवाल और रामनरायन जायसवाल ने कराया था। इतना ही नहीं, इनकी 1927 मॉडल की फोर्ड कार में बैठकर महात्मा गांधी 1940 में रांची से रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने गए थे। इसी परिवार के शिवनरायन जायसवाल रांची के पहले मेयर 1962 में बने। इस पद को उन्होंने 1976 तक  सुशोभित किया था।

                                                      रांची के पहले मेयर शिवनरायन जायसवाल

 

दरअसल यह परिवार मूल रूप से जमालपुर ग्राम पंचाायत का ही निवासी है। रांची में रहते हुए भी इस परिवार का जुड़ाव जमालपुर से रहता है। यहां भी काफी अचल संपत्ति है। रांची में इस परिवार की संंपन्नता का एक उदाहरण मात्र है कि 1927 में फोर्ड कन्वर्टिबल कार खरीदने वाला यह पहला भारतीय परिवार था। आज भी वह कार चालू हालत में है। उसकी देखरेख मौजूदा पीढ़ी के आदित्य विक्रम जायसवाल करते हैं।

1927 मॉडल फोर्ड कार के साथ जायसवाल परिवार की मौजूदा पीढ़ी के सदस्य आदित्य विक्रम जायसवाल। इसी कार से महात्मा गांधी रांची से रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन में शिरकत करने गए थे। 

 

रांची जाने के बावजूद इस परिवार का जमालपुर से जुड़ाव का गवाह बाजार के पश्चिमी छोर पर अस्पताल तथा पूर्वी छोर पर लड़कियों का स्कूल है। बालिका शिक्षा और जनस्वास्थ्य को लेकर इस परिवार की चिंंता इससे जाहिर होती है। आजादी के पहले ही लड़कियों के लिए स्कूल और क्षेत्र की जनता के लिए अस्पताल अपनी जमीन में तथा अपने पैसे से बनवाया। इनके ही घर में करीब  चार वर्ष पहले तक डाकघर भी चलता था।

लड़कियों का स्कूल और अस्पताल दोनों कालांतर में सरकारी हो गए, लेकिन इस परिवार के योगदान को याद करने के लिए  इनका नाम नहीं दिया गया। आज भी परिवार के सदस्य जमालपुर के विकास के लिए चिंतित रहते हैं।

जिस 1927 मॉडल फोर्ड कार में बैठकर महात्मा गांधी 1940 में रांची से रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने गए थे, उसका आयात  राय साहब लक्ष्मी नारायण ने 1927 में कराया था। फोर सीटर इस कन्वर्टिबल कार में चार सिलेंडर इंजन हैं। यह आज भी आधुनिक कार से कम नहीं है। 1927 में राय साहब पहले नॉन ब्रिटिश थे, जिन्होंने फोर्ड की यह मॉडल खरीदी थी।

अभी भी अच्छी स्थिति में है कार
राय साहब के परपोते आदित्य विक्रम जायसवाल ने कहा कि हमारे लिए यह बहुत ही गर्व की बात है कि महात्मा गांधी जी ने इस कार में रांची से रामगढ़ तक की यात्रा पूरी की थी। 1927 मॉडल यह फोर्ड कार मेरी सबसे पसंदीदा कार है, जो आज भी अच्छी स्थिति में है।

जायसवाल परिवार में आज भी बापू कुटीर है मौजूद
रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन के दौरान महात्मा गांधी जी जब रांची आये थे, तब वो जायसवाल के आवास पहुंचे थे, जहां उनका स्वागत हुआ था। वह बापू कुटीर आज भी उसी तरह मौजूद हैं। इस बापू कुटीर को कांग्रेस नेता आदित्य विक्रम जायसवाल बहुत ही अच्छे से संजो कर रखे हैं। जायसवाल परिवार ने महात्मा गांधी के कहने पर राजा राय साहब की उपाधि लौटा दी थी।

 

जब रांची में जलती थी लालटेन, तब मेयर शिवनरायन जायसवाल ने लगवाई थीं स्ट्रीट लाइटें

रांंची केे पहले मेयर शिवनारायण जायसवाल ही 1962 में चुने गए थे। वह 1976 तक लगातार तीन बार मेयर रहे। उनके खाते में कई उपलब्धियां दर्ज हैं। रांची में पहली बार उन्होंने तब 3000 स्ट्रीट लाइट लगवाई थीं, जब शहर में घरों में लालटेन जलती थीं। रांची का जयपाल सिंह स्टेडियम और टाउन हाल उन्होंने ही बनवाया था। रांची में पीसीसी पथ बनाने की शुरुआत भी उन्हीं के जमाने में हुई थी।

 

कांग्रेस के कद्दावर थे शिवनारायण

मूल रूप से मिर्जापुर जिले के जमालपुर के राजपरिवार से ताल्लुक रखने वाले शिवनारायण जायसवाल कांग्रेस के कद्दावर नेताओं में शुमार होते थे। बिहार के अलावा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और ओडिशा की राजनीति में शिवनारायण जायसवाल की तूती बोलती थी। कभी वो किंगमेकर का किरदार अदा करते थे। इनका पूरा खानदान राजनीति में था। शिवनारायण के चचेरे भाई राजाराम शास्त्री वाराणसी से कांग्रेस के टिकट पर 1971 में सांसद बने थे। शास्त्री महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के कुलपति भी रहे। उनको पद्मश्री से भी भारत सरकार ने नवाजा था।

 

राजा राय बहादुर ठाकुर जायसवाल 

                                                                           रायबहादुर ठाकुर जायसवाल

 

जमालपुर शाही परिवार के एक भारतीय जमींदार राजा और व्यापारी थे। वह एक राष्ट्रवादी थे जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान दिया था। जमालपुर से व्यापार करने के लिए यह परिवार रांची गया था। फिर वहीं का होकर रह गया। रायबहादुर ठाकुर दास जायसवाल की शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हुई। वह अपने बैच के गोल्ड मेडलिस्ट रहे। झारखंड के खूंटी जिले के मुरहू में पहली लाह फैक्ट्री 1850 में खोली। 1875 में रांची डिस्टिलरी की शुरुआत की थी।

 

अस्पताल से दो बार इस परिवार की निशानी को मिटाने की हुई कोशिश

आज जमालपुर में जो सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र है, पहले वह प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हुआ करता था। उससे भी पहले वह तुलसी राम जायसवाल मेमोरियल हॉस्पीटल था। इसका निर्माण अपनी जमीन में अपने पैसे से रामनरायन जायसवाल और लक्ष्मीनरायन जायसवाल ने कराया था।

करीब 17 वर्ष पहले अस्पताल भवन का नवनिर्माण कराया जा रहा था तो उस समय पुराने भवन की दीवार में लगे शिलापट्ट पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। उसे भी दीवार के साथ ही मजदूरों द्वारा तोड़ा जा रहा था। उसी समय पत्रकार राजेश कुमार दुबे की नजर उस पर पड़ी और उन्होंने उसे मजदूरों से काम रोकवाकर शिलापट्ट को सुरक्षित निकवाया। इसके बाद जमालपुर ग्राम पंचायत के तत्कालीन प्रधान मुन्ना बच्चन (बियार) से सीमेंट बालू मांग कर सेमरा गांव के राजगीर सियाराम गोड़ से नए अस्पताल की दीवार में चुनवा दिया। यदि राजेश कुमार दुबे उस समय वहां न पहुंचे होते तो आज इस अस्पताल के लिए जमीन व प्रारंभिक तौर पर निर्माण कराने वाले परिवार के योगदान को कोई जान भी नहीं पाता।

                                                                             रामनरायन जायसवाल

 

जब यह अस्पताल प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बन रहा था तो  नई चहारदीवारी के निर्माण के दौरान  एक बार फिर इस शिलापट को तोड़ा जा रहा था। इस बार भी संयोग अच्छा था कि राजेश कुमार दुबे समय से पहुंच गए। उन्होंने तत्कालीन प्रभारी चिकित्साधिकारी डॉ. राजन सिंह को शिलापट और अस्पताल के इतिहास के बारे में बताया। तब जाकर उन्होंने अस्पताल की उत्तरी चहारदीवारी में उसे शिलापट्ट को चुनवा दिया।

 

 

 

 

 


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