July 16, 2024 |

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कुर्मी, कुशवाहा व यादव समाज की राजनैतिक स्थिति, कारण व निदान

Sachchi Baten

तुम तो डूबोगे सनम.. हमको भी ले डूबोगे

 

दुर्गेश कुमार

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सोचा था कि नहीं लिखूं लेकिन घाव अपना हो या गैर का, इलाज नहीं हो तो समाधान नहीं होता है। जो व्यक्ति सिर्फ मीठी मीठी बातें करें वो मीठा जहर होता है। समाज भी इससे अछूता नहीं है। इसलिए अपने समाज के आचरण, चरित्र को परिष्कृत करना हम सबका दायित्व है। समाज के चरित्र का परिष्कृत होना एक सामान्य प्रक्रिया है। दमन और विद्रोह के दौर में भी नैतिकता, दायित्व का निर्वहन मनुष्य होने का गवाह बनता है।
इसलिए आप यह कह कर पीछा नहीं छुड़ा सकते विद्रोह का चेहरा विकृत होता है। विद्रोह से याद आ रहा है कि हमारे इलाके में अस्सी के दशक के पूर्व कई डकैत हुआ करते थे जो अपने इलाके की चौहद्दी से बाहर ही डकैती डाला करते थे। हर बिरादरी में डकैत थे। राजपूत, यादव, कायस्थ, कुर्मी, कोयरी, पासी, पासवान कोई भी जाति अछूता नहीं थी। तब समाज में डकैतों की भी इज्जत थी।
अस्सी के दशक में ही जनसंख्या विस्फोट का असर दिखने लगा, आर्थिक जरुरते बढ़ने लगी। अब यह दौर डकैतों के अवसान और चोरों के उत्थान का था। यानि नैतिकविहीन अपराध की पराकाष्ठा, किसी की गाय खोल लो, किसी की भैंस, बिजली के तार काट लो, बोरिंग खोल लो.. इन अपराधों की वजह गरीबी ही नहीं थी बल्कि किसी को किसी से बदला लेना हुआ तो वह उसके लिए यही तरीका अपनाता था। मामला तीखा होता गया, गैंगवार, नरसंहार, अपहरण तक का दौर आया।
डकैत जो किसी दौर में सर्वहारा की खूनी लड़ाई लड़ने में भी शामिल रहें उनकी अगली पीढ़ी की नैतिकता रसातल में गिरी तो बच्चों के अपहरणकर्ता बन कर उभरे और नीतीश कुमार का दौर आने पर समाप्त हुए।
ध्यान रहे कि दुनिया में बिना अराजकता के सामाजिक न्याय की कोई भी लड़ाई नही लड़ी गई है। इसलिए उस दौर को भुला देना चाहिए। किंतु अब तो सामाजिक न्याय का सचेत दौर है। इतिहास पलट कर शायद ही आयेगा। इसलिए समाज के समाजिकरण का समय है। लेकिन इस भूमिका को कौन निभायेगा? सामाजिक न्याय की शक्तियों के सामने सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह है।
भारतीय समाज में सामाजिक न्याय की अवधारणा जाति के आइने में ही महसूस किया जाता हैं। बात बिहार की ही कर रहा हूं। बिहार में अभी भी जनता द्वारा राजकाज का फैसला जाति के आधार पर ही किया जाता हैं। जो इसे तुरंत बदलने की बात करते हैं तो समझिए कि वे सबसे बडे़ जातिवादी है। जाति हो या समाज इन्हें परिष्कृत करने की प्रक्रिया बड़ी लंबी होती है।
बिहार में यादव समाज की आबादी सबसे अधिक है। जो सामाजिक न्याय की समर्थक पिछड़ावाद की धारा की मुख्य शक्तियों में से एक है। किंतु उनकी संख्या अधिक होने के खतरे भी है, लाभ भी है। लड़ने भर क्षमता से भरे पूरे होने के कारण इनमें संघर्ष की क्षमता अधिक है। किंतु यह क्षमता जब थोड़ा सा भी कबीलाई होता दिखता है तो समाज की चेतना बुरी तरह प्रभावित होती है। किन्तु कोई भी समाज हमेशा एक ही स्वरूप में रहता है, ऐसा मानना गलत होगा।
आज यादव समाज में एक वर्ग तैयार हो गया है जो पिछड़ावाद की समझ रखता है, एक वर्ग वर्चस्व स्थापित कर चुका है तो एक वर्ग रोजी रोटी की कमाई में लीन हैं, किंतु इनमें एक वर्ग अभी भी ऐसा है जो रहन सहन, लोक व्यवहार में 50 साल पीछे है। राजनीतिक होड़ में समाज सुधार का जो प्रयास वीपी मण्डल के पिता रासबिहारी मण्डल ने 1912 में किया था, वहीं प्रयास इस समूह के लिए जरुरी है। किंतु सवाल है कि करेगा कौन?
यादवों की केमिस्ट्री दलितों के साथ इसलिए ठीक है क्योंकि दोनों में राजनीतिक चेतना का स्तर अभी काफी तेज है। दलितों के पास जमीन वगैरह कम है इसलिए इनका टकराव का कोई वजह भी नहीं है। किंतु किसानी जातियों से टकराव पशुपालकों का होना स्वाभाविक है। … और टकराव का असर पिछड़ावाद की धारा पर पड़ता है। फिर इनका टकराव कामगार वर्ग से होता है जिसकी आर्थिक हालात दलित से भी खराब है। लोहार, बढ़ई, कुम्हार, फेरी वाले, तुरहा, कुंजड़ा जैसी जातियां जिनका काम रोज कमाना खाना है।
बनिया की दुकान पर कामगार को उधार मिलता है। कस्बे में रोजगार मिलता है। जाहिर है वह प्रभाव में रहेगा। किंतु इन्हें अब भी चोर, लफंगा, बदमाशों का सामना करना पड़ता है… उनमें अधिकतर यादव होते हैं। यदि रासबिहारी मण्डल के प्रयास को दोहराया गया तो यह पांच साल में खत्म हो जाएगा। किंतु इस महीन बात को न कोई समझना चाहता है तो क्या किया जाए। सिर्फ सरकार में आने पर गरीबों के लिए अच्छी पॉलिसी बनाना, सड़कें बनाने, सोशल सिक्योरिटी स्कीम लॉन्च करना ही राजनीति का समीकरण नहीं है। बीजेपी ने जो हिंदू कार्ड खेला है उसे ध्वस्त करने के लिए सांस्कृतिक पूंजी, सामाजिक पूंजी की भी स्थापना करना होगा।
जिन्हें अति पिछड़े कहते है वे सत्ता की लड़ाई में शामिल नहीं है। क्योंकि उसकी प्राथमिकता रोटी है। रोटी के साथ सुरक्षा चाहिए। सुरक्षा सिर्फ कानून नही देता है। समाज भी देता है, ऐसे समाज का निर्माण करना ही होगा। एक सच यह भी है कि अति पिछड़े की वे जातियां जिन्हें हम पवनिया कहते हैं, अब इसी सामाजिक न्याय समर्थक जातियों के अग्रणी संघर्ष की बदौलत वे सामंतवादी शक्तियों के जोर जबरजस्ती से मुक्त हो गई है। किंतु ये अब भी “पवनिया सिंड्रोम” से मुक्त नहीं हो सकी है।
राजनीतिक संघर्ष में शामिल न हो तो कोई बात नहीं किंतु वोट की ताकत का कभी भी अपने वर्ग के हितों की हिफाजत के लिए शायद ही किया हो। गांव में रहने वाले इनमें से अधिकांश आज भी अपने अधिकारों के प्रति सचेत नहीं है। आप लाख नीतियां बना लीजिए, इनकी आस्था सामंतवाद के प्रतीकों में ही है। सवाल उठता है कि आखिर कब तक यह दौर चलेगा? ये छोटे छोटे संख्या वाली जातियां आपस में एक साथ बैठ कर चर्चा तो करती है, किंतु इनके ओपिनियन का निर्णय आज भी इनके वर्गीय हित के विरोधी कर रहे हैं।
कुर्मी सत्ता की लड़ाई का सबसे काहिल जाति है। लाठी नही चला सकते तो बोल तो सकते हो। लेकिन मजाल है कि कोई कुर्मी संगठन सरदार पटेल, शिवाजी और शाहूजी से आगे बढ़ कर अकादमिक सेमिनार आयोजित करे। इन्हें नौकरी चाहिए किंतु नौकरी बचाने की लड़ाई नहीं लड़ेंगे। इन्हें बुद्ध भी चाहिए, चंद्रगुप्त भी और राम के वंशज भी है। किंतु न राम जैसा पराक्रम है न न बुद्ध जैसी चेतना न चंद्रगुप्त जैसा हिम्मत। इन्हें सिर्फ नौकरी चाहिए इंजीनियर की, प्रोफ़ेसर की, डॉक्टर की, रेलवे की, सेना की.. किंतु नौकरियां खत्म हो रही है तो ये इतने बेगैरत है कि इन्हें अपने बच्चों की भी चिंता नहीं है। ये उसी के साथ जाने के लिए तैयार है जो इन्हें धूल में मिलाने पर आमादा है। ऐसा नहीं है कि इस समाज में वैसे संपन्न लोग नहीं है जो पे बैक टू सोसाइटी दे सकें। किंतु इनकी चेतना काहिल हो चुकी है। ये सत्ता डिजर्व ही नहीं करते हैं। यह समाज पूंजी तो तैयार कर लेता है किंतु इनकी कोई विशेष सामाजिक पूंजी नहीं है, सांस्कृतिक पूंजी के लिए तो ये ब्राम्हणों पर आश्रित है।
बिहार कोयरी को भी सत्ता चाहिए वो उसके लिए हर संभव कोशिश करेगा। आखिर क्यों नहीं चाहिए? किंतु इनके साथ समस्या अदभुत है। नाप में गज है, बोली थान भर का और चरित्र कबिलाई। जिस समाज में जगदेव बाबू, मास्टर जगदीश जैसे महान पुरुषों ने जन्म लिया है, जिस समाज में एक से एक विद्वान बुद्धिजीवी हैं। उस समाज में कई वाकया देख कर खिन्न हो जाता हूं। मॉडल के तौर पर अपने इलाके को ही देखूं तो एक सोशल मीडिया सेलिब्रेटी टाइप महिला लगातार कुशवाहा समाज के एक दर्जन भर कार्यक्रमों में बतौर चीफ गेस्ट बुलाई गई। जातीय उन्माद वाले गाने ऐसे बजे जैसे ये हरियाणा में जाट हैं। वो महिला सिर्फ इसलिए बुलाई गई क्योंकि वो एवरेज गुड लुकिंग है।
इनकी राजनीतिक चेतना इतनी एग्रेसिव है कि एक दिन उपेंद्र कुशवाहा को सीएम बनाते है तो दूसरे दिन सम्राट चौधरी भी सीएम बन जाते है। इनके हर दूसरे आदमी को अपनी जाति की जनसंख्या ज्यादा और दूसरे की नगण्य नजर आती है। कमोबेश यही स्थिति पूरे बिहार में है। इनके पास भी कुर्मियों जैसी ऐसी कोई पूंजी नहीं है जिसकी बदौलत कोई सामाजिक समूह इनसे गठबंधन करेगा। राजनीतिक महत्वकांक्षाओं के इस सफर में ले देकर दोनों की यहीं कमी बार बार साथ आने को मजबूर करती हैं। किंतु इन्हें लगता है कि ये अकेले ही तीर मार लेंगे।
कुल मिला कर देखा जाय तो बिहार में पिछड़ी जातियों में समीकरण बनाने की अधिक क्षमता यादवों में है, किंतु जमीन पर केमिस्ट्री बनाने के लिए जो समाज सुधार का काम होना चाहिए था वो नहीं हो रहा है। लिहाजा वे उस हाथी की तरह अकेले हो जाते है जिनके पास सिर्फ उनका महावत ही जाता है। पिछड़ावाद के सबसे बडे़ लाभार्थी यहीं लोग हैं। किंतु इन तीनों जातियों के लोग शायद ही कभी एक साथ राजनितिक मसलों पर बैठ कर विमर्श करते देखे गए हो। इनका आपसी अहंकार सातवें आसमान पर है।
ऐसे में सामाजिक न्याय का झंडा कितना दिन रहेगा, कहना मुश्किल है। किंतु यदि इन विषयों पर काम हुआ तो अभी तो 32 साल हुआ है, बिहार में मनुवादियों को 50 साल तक दबा कर रखा जाना संभव है।
बिहार में लव कुश समीकरण, माय समीकरण, सवर्ण इत्यादि पर खूब चर्चा होती है। किंतु जैसे ही इन सारे समीकरण की बात होती है वैसे ही अन्य जातियों को बुरा लगता है। असल में ऐसे गुटों का मिलन निर्गुट, निर्बल लोगों को असहज कर देता है। उन्हें सहज रूप में रखने के लिए क्या उपाय है। इन समीकरण वालो को सोचना चाहिए।
एक सच यह भी है कि जहां राजपुत प्रभावी है वहां त्रिवेणी की चेतना जिंदा है। यादव, कुर्मी, कोयरी सब बिलाई हो जाते है। किंतु जिन इलाके में ये प्रभावी है वहां इनका आपसी साफ द्वंद नजर आता है। किंतु समेकित रूप से न बहस की गुंजाइश है, न ईमानदारी से अपनी कमियां स्वीकार करने का माद्दा है। जाति के रसायन शास्त्र में ये फिसड्डी लोग है। यदि जाति का रसायन शास्त्र नही समझ सकते हैं तो बिहार को बीजेपी से बचाने का एक ही उपाय है कि बिहार में तीसरी शक्ति को जिंदा रखना होगा। ऐसे में कई दलों के अस्तित्व से ही समाजवाद आयेगा।
बिहार में दलितों मे राजनीतिक चेतना है, सवर्णों की चेतना है शेष की जातीय चेतना है। कभी कभी ऐसा लगता है कि पिछड़ी जातियों के लोग अपनी जातीय चेतना के कुएं में अपनी राजनीतिक मौत का इंतजार कर रहे हैं।
इनके इस हाल पर लफ्ज़ निकलता है कि तुम तो डूबोगे सनम.. हमको भी ले डूबोगे।
(लेखक सामाजिक चिंतक हैं और ये उनके निजी विचार हैं)

Sachchi Baten

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