July 24, 2024 |

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यूपी-बिहार से खुद विपक्ष ने दे दिया मोदी को वाकओवर

Sachchi Baten

बिहार में लालू-तेजस्वी तो उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव ने की मोदी की राह आसान

राजेश पटेल


हिंदी पट्टी में उत्तर प्रदेश और बिहार ही ऐसा राज्य है, जहां से मोदी को चुनौती मिलने की उम्मीद थी। यह उम्मीद धीरे-धीरे टूटती जा रही है। खुद विपक्ष ने ही उनको 2024 के लिए वाकओवर दे दिया। बिहार में लालू-तेजस्वी और उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव का जो रवैया है, वह मोदी को सत्ता से हटाने के लिए डाले गए मतों का विभाजन कराएगा। नतीजा जाहिर है। जैसा 2019 में हुआ। 37.4 फीसद ही मत पाकर भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आ गई। वर्ष 2014 में और खराब स्थिति थी। बीजेपी को मात्र 31 फीसद मत मिले थे। पूरे एनडीए को भी मिले मतों को मिला दिया जाए तो भी 38 फीसद ही मिले थे। फिर एनडीए की सरकार कैसे बनी? जवाब है- भारतीय जनता पार्टी या मोदी को न चाहने वालों के मत बंटे। 2014 और 2019 में मिले मत कहीं से नहीं बताते कि भाजपा या मोदी की लहर थी। विपक्ष ही भाजपा को बार-बार सरकार बनाने लायक माहौल बना दे रहा है। तीसरी बार भी यही होने जा रहा है। परिणाम के बाद स्पष्ट हो जाएगा कि देश में भाजपा या मोदी को न चाहने वालों की संख्या ज्यादा है, लेकिन विपक्ष के नेता उसे एक स्थान पर गोलबंद नहीं कर पा रहे हैं।

जब इंडिया गठबंधन बना था, तो लगा कि उत्तर प्रदेश और बिहार मोदी के अश्वमेध रथ को रोकने में अहम भूमिका निभाने वाले हैं। यही दो राज्य हैं दिल्ली का रास्ता किसी के लिए आसान करते हैं तो किसी के लिए कठिन। नीतीश कुमार जब इंडिया से अलग होकर एनडीए के पाले में आकर नौवीं बार मुख्यमंत्री बने तो तेजस्वी ने जिस अंदाज में विधानसभा में भाषण दिया, जन विश्वास यात्रा निकाली। इसके समापन पर जुटी ऐतिहासिक भीड़ और मंच पर नेताओं की मौजूदगी ने भाजपा की बेचैनी बढ़ा दी थी। उत्तर प्रदेश में कोई रैली या यात्रा तो नहीं निकली। विपक्षी पार्टियों की जुटान की कोशिश ने ही एनडीए खेमे की नींद उड़ी दी थी। लेकिन अब सब एकतरफा होता जा रहा है।

बात पहले उत्तर प्रदेश की। यहां विपक्ष की मुख्य धुरी समाजवादी पार्टी है। सबसे बड़ी पार्टी होने के कारण सभी को एकुजट करने की जिम्मेदारी भी इसी की बनती है। लेकिन इसके मुखिया अखिलेश यादव में कुछ न कुछ तो कमी है कि उनके अपने ही पराये होते जा रहे हैं। पहले ओपी राजभर ने साथ छोड़ा। जयंती चौधरी। स्वामी प्रसाद मौर्य। केशवदेव मौर्य और पल्लवी पटेल के बाद संजय चौहान। अलग-अलग इलाकों में इन सभी नेताओं का अपना वोटबैंक है। अखिलेश ने बीजेपी से भी नहीं सीखा कि वह कैसे-कैसे दागी नेताओं, छोटी-छोटी पार्टियों को अपने साथ जोड़ती जा रही है। यही बूंदें मिलकर उसे महासागर बना रही है। मत प्रतिशत भले न हो, सीटें तो मिल जा रही हैं। सीटें ही सरकार बनाने के लिए अहम हैं।

बिहार की बात। यहां लालू प्रसाद यादव और उनके पुत्र तेजस्वी यादव की जोड़ी कांग्रेस की उपेक्षा कर रही है। जहां-जहां कांग्रेस के प्रमुख नेता चुनाव लड़ना चाहते हैं, वहां-वहां कांग्रेस से विमर्श किए बिना प्रत्याशियों की घोषणा कर दी। बेगूसराय लोकसभा सीट कांग्रेस को नहीं दी। कांग्रेस चाहती थी कि कन्हैया कुमार उस सीट पर लड़ें। लालू प्रसाद ने सीपीआई को वह सीट दे दी और वहां से अवधेश राय उम्मीदवार हो गए।

पूर्णिया सीट पर जनता दल (यू) छोड़ कर राजद में शामिल हुईं विधायक बीमा भारती को टिकट दे दिया। पिछले दिनों यहां से तीन बार सांसद रहे राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव ने अपनी जन अधिकार पार्टी का विलय कांग्रेस में किया था। कांग्रेस उन्हें पूर्णिया से उम्मीदवार बनाना चाहती थी। पप्पू यादव का कहना है कि वह पूर्णिया से ही लड़ेंगे।

औरंगाबाद सीट पर भी जनता दल यू से लाए गए अभय कुशवाहा को उम्मीदवार बना दिया। कांग्रेस यहां से अपने पूर्व सांसद और दिल्ली के पूर्व पुलिस कमिश्नर निखिल कुमार को चुनाव लड़ाना चाहती है। ऐसे ही मीरा कुमार सासाराम नहीं लड़ना चाहती थीं, वे अपने बेटे के लिए काराकाट सीट चाहती थीं, जो लालू ने भाकपा माले को दे दी।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह पूर्वी चंपारण सीट से सांसद रहे हैं। वे पूर्वी चंपारण या उसके बदले नवादा की सीट मांग रहे थे। लेकिन लालू प्रसाद ने दोनों सीटों पर अपने कुशवाहा उम्मीदवार उतार दिए। लालू प्रसाद तारिक अनवर के लिए कटिहार सीट भी नहीं छोड़ना चाहते हैं। वे वहां से पूर्व राज्यसभा सदस्य अशफाक करीम को लड़ाना चाहते हैं। कांग्रेस अपने ब्राह्मण उम्मीदवार के लिए बक्सर सीट मांग रही थी लेकिन लालू ने वहां भी अपना उम्मीदवार उतार दिया। कुल मिला कर लालू प्रसाद कांग्रेस की पारंपरिक सीटों के बजाय नई और ज्यादा कमजोर सीट दे रहे हैं। जाहिर है कि लालू प्रसाद के इस रवैये से कांग्रेस के साथ उनका गठबंधन लगभग टूट चुका है, जिसका सीधा फायदा भाजपा और जनता दल (यू) के गठबंधन को होना है।

लालू और तेजस्वी यादव ने बिहार में कांग्रेस को बेचारा बना कर छोड़ दिया है। कांग्रेस को मजबूर कर रहे हैं कि वह अकेले लड़े। उत्तर प्रदेश की स्थिति थोड़ी सी भिन्न है। यहां कांग्रेस और सपा एक साथ मिलकर अभी तक लड़ रहे हैं। लेकिन सपा के साथ अपना दल कमेरावादी, महान दल, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, जनवादी सोशलिस्ट तथा राष्ट्रीय शोषित समाज पार्टी भी रहती तो बात कुछ और होती। परिणाम कुछ और होता। दरअसल बिहार में लालू और तेजस्वी तथा उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव लोकसभा चुनाव मन से लड़ ही नहीं रहे हैं। आने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारी कर रहे हैं। इसीलिए यह सब हो रहा है।

2024 में मोदी जी को फिर से प्रधानमंत्री बनने के लिए अग्रिम बधाई। इसके लिए विपक्ष का आभार। क्योंकि तीसरी बार यह मौका विपक्ष की ही कृपा से मिलने जा रहा है। वरना….

 


Sachchi Baten

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