July 23, 2024 |

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केवल काशी में…श्मशान घाट पर जलती चिताओं के बीच घुंंघुरुओं की झनकार

Sachchi Baten

सप्तमी की रात मणिकर्णिका घाट पर काशी की पुरानी परंपरा की लौ रात भर धधकती रही

-महाश्मशानेश्वर को रिझाकर कामना करती हैं कि अगले जन्म में इससे मुक्ति मिले

वाराणसी (सच्ची बातें)। वाराणसी के आदितीर्थ मणिकर्णिका पर जलती चिताओं के सामने नगरवधुओं के पांव के घुंघरू रात भर टूटते रहे। बाबा मसाननाथ से मुक्ति की कामना के लिए रात भर नाचती, गुहार लगाती नगरवधुओं का नृत्य शवयात्रियों में कौतूहल पैदा कर रहा था। काशी की पुरानी परंपरा की लौ रात भर धधकती रही।


चैत्र नवरात्र की सप्तमी पर महाश्मशान महोत्सव की अंतिम निशा में बाबा काे पंचमकार का भोग लगाकर तंत्रोक्त विधान से भव्य आरती हुई। बाबा का प्रांगण रजनीगंधा, गुलाब व अन्य सुगंधित फूलों से सजाया गया था।
एक तरफ चिताएं धधक रही थीं, तो दूसरी ओर डोमराज की मढ़ी के नीचे नगर वधुएं महाश्मशानेश्वर को रिझाने के लिए घुंघरुओं की झंकार बिखेरने की तैयारी कर रही थीं।

बाबा मसाननाथ से मुक्ति की कामना के बाद नगरवधुओं ने बाबा के भजन दुर्गा दुर्गति नाशिनी, दिमिग दिमिग डमरू कर बाजे, डिम डिम तन दिन दिन… से शुरुआत की। ओम नमः शिवाय, मणिकर्णिका स्तोत्र, खेलें मसाने में होरी के बाद ठुमरी व चैती गाकर बाबा के श्री चरणों में अपनी गीतांजलि अर्पित की।
-फोटो गूगल के विभिन्न स्रोतों से

Sachchi Baten

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