July 23, 2024 |

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वीपी सिंह के एक निर्णय ने बीपी मंडल को सामाजिक न्याय का महानायक बना दिया

Sachchi Baten

गोल करने में वीपी सिंह का पांव जरूर टूटा, पर गोल तो कर ही दिया न…

 

चौ. लौटन राम निषाद

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एक समय था जब हर ज़ुबान पर वीपी सिंह के बारे में यह नारा गूंजता था- “राजा नहीं फ़क़ीर है,देश की तक़दीर है।” वीपी सिंह भारत के आठवें प्रधानमंत्री थे, राजीव गाँधी के बाद जनता दल को चुनाव में जीत हासिल हुई और इस तरह 2 दिसम्बर, 1989 में वीपी सिंह सत्ता के उच्च पद पर आसीन हुए।

इनकी रुझान राजनीति की तरफ हमेशा से ही थी, जिसके लिए इन्होंने कठिन परिश्रम किया। एक प्रधानमंत्री के रूप में भारत की निचली जातियों की हालत में सुधार के लिए वीपी सिंह ने कठिन परिश्रम किया था। इन्होंने 1989 में भारत की राजनीति में अविस्मरणीय बदलाव कर दिया। दलित व निचली-पिछड़ी जाति के लोगों को चुनावी राजनीति में आने का मौका दिया।


“राजा नहीं फकीर है, देश की तकदीर है”, 80 के दशक के आखिरी वर्षों में हिंदी भाषी इलाकों में ये नारा खासा बोला जाता था। इसी के साथ विश्वनाथ प्रताप सिंह भारतीय राजनीति के पटल पर नए मसीहा और क्लीन मैन की इमेज के साथ अवतरित हुए थे।1987 में भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू हुई उनकी मुहिम ने देश का मिजाज ही बदल दिया। वह एक नई राजनीतिक ताकत बन गए। वीपी सिंह का राजनीतिक-सामाजिक जीवन मुख्य रूप से तीन हिस्सों में विभाजित है।

पहला दौर
राज परिवार से निकल कर कांग्रेस की राजनीति में होना और मुख्यमंत्री तथा देश का वित्त मंत्री तथा रक्षा मंत्री बनना। इसमें से उनका मुख्यमंत्रित्व काल बागियों के खिलाफ अभियान के लिए जाना जाता है, जबकि वित्त मंत्री और रक्षा मंत्री रहते हुए उन्होंने कॉरपोरेट करप्शन और रक्षा सौदों में दलाली के खिलाफ अभियान चलाया। इसी दौर में वे कांग्रेस से दूर हो गए।
उनके जीवन का दूसरा दौर प्रधानमंत्री के तौर पर रहा, जिस दौरान उनका सबसे प्रमुख और साथ ही सबसे विवादास्पद कदम मंडल कमीशन को लागू करने की घोषणा करना था। प्रधानमंत्री रहने के दौरान उन्होंने बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर को भारत रत्न देने से लेकर उनकी जयंती पर छुट्टी देने और ऑपरेशन ब्लू स्टार के लिए स्वर्ण मंदिर जाकर माफी मांगने जैसे कदम उठाए।

इस दौरान वे रिलायंस कंपनी के साथ सीधे टकराव में आए और धीरूभाई अंबानी को लार्सन एंड टुब्रो पर नियंत्रण जमाने से रोक दिया। राममंदिर आंदोलन के मुद्दे पर उन्होंने बीजेपी के सामने झुकने से मना कर दिया और इसी वजह से उनकी सरकार गिर गई।

अपने जीवन के तीसरे अध्याय में वीपी सिंह संत की भूमिका में आ गए। कविताएं लिखने लगे और पेटिंग्स में हाथ आजमाया। इस दौरान भी वे सामाजिक मुद्दों से जुड़े रहे। दिल्ली में झुग्गियों को उजाड़ने की कोशिशों का उन्होंने सड़कों पर उतरकर विरोध किया और सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ खड़े रहे।

विश्वनाथ प्रताप सिंह कहा करते थे कि- ” सामाजिक परिवर्तन की जो मशाल उन्होंने जलाई है और उसके उजाले में जो आंधी उठी है, उसका तार्किक परिणति तक पहुंचना अभी शेष है। अभी तो सेमीफाइनल भर हुआ है और हो सकता है कि फाइनल मेरे बाद हो। लेकिन अब कोई भी शक्ति उसका रास्ता नहीं रोक पाएगी।” वीपी सिंह शुरुआत से ही नेतृत्व क्षमता के धनी रहे, जिसके दम पर सत्ता के सिंहासन तक पहुंचे और सामाजिक न्याय की दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाकर पिछड़े और वंचित समाज को आरक्षण के दायरे में लाने का काम किया।

वीपी सिंह ही वह महामानव थे, जिन्होंने बीपी मण्डल को सामाजिक न्याय का महानायक बना दिया,अन्यथा बीपी मंडल का शायद कोई नामलेवा नहीं होता। ऐसा नहीं है कि वीपी सिंह अदूरदर्शी राजनेता थे। वह जानते थे कि मंडल कमीशन की सिफारिश लागू कर पिछड़ी जातियों को 27 प्रतिशत आरक्षण देने से उनकी कुर्सी खतरे में पड़ जाएगी, इसके बावजूद उनके अंदर सामाजिक न्याय की भावना थी। उन्होंने ठान लिया था कि भले कुर्सी चली जाए, पिछड़ी वंचित जातियों को न्याय देने से पीछे नहीं हटना है। उन्होंने 7 अगस्त, 1990 को ऐतिहासिक कदम उठाकर मंडल कमीशन की सिफारिशों के अनुसार 27 प्रतिशत कोटा की अधिसूचना जारी कर दी।

खेदजनक है कि पिछड़ों ने उनके साथ न्याय नहीं किया। पिछड़ों ने उन्हें नायक तो नहीं बनाया, सवर्ण जातियों की दृष्टि में वे खलनायक जरूर बन गए। रातों रात नारा बदल गया-“राजा नहीं रंक है, देश का कलंक है, मान सिंह जयचंद की औलाद है।” दुर्भाग्यपूर्ण है कि सामाजिक न्याय के जिस महामानव ने पिछड़ों के लिए कुर्सी को ही तिलांजलि नहीं दी, सेहत को भी खराब कर लिया, उसे पिछड़े ही भुला दिए। मुलायम सिंह यादव उनका साथ छोड़कर निजस्वार्थ में मंंडल विरोधी सामन्ती व कट्टर जातिवादी चंद्रशेखर के साथ चले गए।
मुलायम सिंह यादव के पक्षकार कहते हैं कि वीपी सिंह मुलायम की बजाय चौ.अजित सिंह को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे, जबकि वास्तव में वीपी सिंह जी इस मुद्दे पर अपने को तटस्थ ही रखे थे। उस समय की सच्चाई यह थी कि पूर्वांचल के बहुत कम लोग मुलायम सिंह को नेता मानते थे। यादव समाज के लोग चौधरी साहब के बेटा (अजित सिंह) की ही बात करते थे।

पूर्वांचल में सामाजिक न्याय की आवाज़ उठाने वाला कोई नेता था तो वे थे चन्द्रजीत यादव। जब सामाजिक न्याय के लिए भागदौड़ करने व अनशन आदि के कारण उनकी किडनी खराब हो गयी तो कोई भी पिछड़ा किडनी दान करने के लिए सामने नहीं आया। मेरे मन में इस महामानव को किडनी दान करने की भावना जगी। उनके सम्मुख प्रस्ताव रखा तो उन्होंने साफतौर पर कहा कि लौटनराम हमें जो करना था कर दिया, अभी काफी लड़ाई बाकी है, जिसके लिए तुम जैसों की जरूरत पड़ेगी। हमने तो अपनी ज़िन्दगी जी ली है।वास्तव में वे एक महामानव, राजर्षि व युगपुरुष थे। बड़े दुःखी मन से उन्होंने कहा-हम अपनों की नज़र में गुनाहकर व खलनायक तो बन ही गए, लेकिन जिनके कारण बना वे भी साथ छोड़ दिये।

वीपी सिंह जी ने मण्डल आयोग के मुद्दे पर कहा था-“ये वो मैच है जिसमें गोल करने में मेरा पाँव जरूर टूट गया है, लेकिन गोल मैंने तो कर ही दिया है।”

7 अगस्त,1990 को वीपी सिंह जी मण्डल कमीशन लागू करने के बाद नायक से खलनायक बना दिये गए। 16 नवम्बर, 1992 को मण्डल कमीशन की सिफारिश को उच्चतम न्यायालय द्वारा संवैधानिक तौर पर सही मानने पर उन्होंने कहा था कि- “यदि मैं अभी मर भी गया तो अपने जीवन से संतुष्ट होकर मरूँगा।”

वीपी सिंह को पता था कि पिछड़ों की राजनीति के वो नेता नहीं बन सकते हैं। एक बार उन्होंने कहा था कि- “केंचुए को मरना पड़ता है तितली के जनम के लिए। क्या हुआ अगर मैं सामाजिक न्याय का नेता नहीं हूँ तो।”

राजा मांडा वीपी सिंह जी असाधारण व्यक्तित्व के दूरदर्शी व न्यायिक चरित्र के महान नेता थे। असली क्षत्रिय का जो न्यायिक चरित्र होता है, वह वीपी सिंह जी का था। मंडल कमीशन की पहली सिफारिश वीपी सिंह जी ने लागू कर पिछड़ी जातियों को सरकारी सेवाओं में 27 प्रतिशत आरक्षण कोटा दिया। दूसरे क्षत्रिय नेता अर्जुन सिंह जी ने काफी विरोध के बाद भी न्यायिक चरित्र का परिचय देते हुए 3 मार्च, 2006 को ओबीसी को केंद्रीय व उच्च शिक्षण संस्थानों में 27 प्रतिशत कोटा दिया। जिसे उच्चतम न्यायालय ने 10 अप्रैल, 2008 को संवैधानिक घोषित किया। वीपी सिंह जी व अर्जुन सिंह जी पिछड़ों के लिए जो कर गए, वह किसी पिछड़े वर्ग के नेता के बस की बात नहीं थी।

इसके लिए दृढ़निश्चय, आत्मबलिदान, त्यागपूर्ण व न्यायिक चरित्र की आवश्यकता होती है।सामाजिक न्याय के इन दो महान विभूतियों के निर्णय को व्यापकता देने के लिए पिछड़ों, वंचितों को जातीय चरित्र से बाहर निकलकर वर्गीय भावना को विकसित करने की आवश्यकता है, अन्यथा वर्तमान में जो संक्रमण की स्थिति चल रही है, पिछड़े-वंचित सामाजिक न्याय से हर स्तर पर वंचित हो जायेंगे।

(लेखक भारतीय पिछड़ा दलित महासभा के राष्ट्रीय महासचिव व मंडलवादी-पेरियारवादी सामाजिक न्याय चिन्तक हैं, साथ ही 1993 के पत्रकारिता स्नातक (बीजे) हैं।)
मो.8182822805


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