July 16, 2024 |

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महामना रामस्वरूप वर्मा की जयंती पर- पोगापंथी और गैर-बराबरी को मिटाए बिना भ्रष्टाचार नहीं मिट सकता

Sachchi Baten

देश के नब्बे सैकड़ा शोषित समाज के पहरुएअर्जक संघ के संथापक तथा नव-मानववाद के प्रणेता थे रामस्वरूप वर्मा जी 

ब्राह्मणवाद का मूल आधार पुनर्जन्म और भाग्यवाद है. पुनर्जन्म और भाग्यवाद पर टिका ब्राह्मणवाद शुरू से ही यह कल्पना कर के चलता है कि हरामखोरी अच्छे भाग्य की निशानी है . यदि कोई राष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन कर सोनाचांदीअफीमचरस और दूसरे सामानों का तस्कर व्यापार करता है तो उसे भयंकर भ्रष्टाचारी कहा जाना चाहिएलेकिन ब्राह्मणवाद की कृपा से उसका यह राष्ट्रद्रोह पुनर्जन्म के कारण मिले अतरिक्त लाभ से छिप जाता है. लोग इस पर विचार ही नहीं करना चाहते है कि अमुक व्यक्ति राष्ट्रद्रोह कर रहा है.
वह तो इस तरह से कमायें नाजायज धन को देखकर यही कहता है कि देखो भगवान कैसे छप्पर फाड़ के  दे रहा है‘. पूर्वजन्म की  कमाई का फल है कि बिना परिश्रम के अमुक आदमी धनी ही गयाअपना अपना भाग्य है….  एक हम लोग है जो गर्मीजाड़ाबरसात में काम करके शरीर को खपायें दे रहे है फिर भी भर पेट भोजन नहीं पाते. पुनर्जन्म और भाग्यवाद ने लोगो की चेतना को इतना  नष्ट किया है कि राष्ट्रद्रोह से कमायें धन को भी वे भाग्य का फल समझते हैइसी प्रकार रिश्वतखोरी भी राष्ट्रद्रोह है.
देने वाला तो मज़बूरी में देता है पर लेने वाला अपने अधिकार का दुरूपयोग करके ही रिश्वत पाता है, लेकिन वाह रे ब्राह्मणवाद! रिश्वतखोर के भाग्य में ऐसे ही धन कि आमद लिखी हैऐसा कहा जाता हैपिछेले जन्म का पुण्य है जिससे धन अंधाधुंध आ रहा हैरिश्वतखोर की कर्तव्यहीनता और उसका राष्ट्रद्रोह ब्राह्मणवाद के आंचल में छिप जाता है और उसका कुकर्म पिछले जन्म के पुण्य के रूप में समझा जाता है.
लोगो को धोखा देकर (बाबामहात्मा का स्वांग रचकर) लूटने वाले हो,या औरतें बेचकरडकैती करके कानून तोड़करझूठ बोलकर पैसा कमाने वाले होइन पर ब्राह्मणवादी की निगाह नहीं जाती हैये दूसरी बात है कि ये भगवान से निरीह की भांति प्रार्थना करते है कि हे भगवन! इसे इसके पापों का फल जल्दी देवे स्वयं भ्रष्टाचार को रोकने का प्रयास नहीं करेंगेभगवान से प्रार्थना करके कर्त्तव्य की इतिश्री समझ लेंगे.
यदि भाग्यभगवान का चक्कर न होता तो ऐसे राष्ट्रद्रोहीकर्तव्यहीन और कुकर्मी और भ्रष्टाचारी को समाज ही दण्डित कर देता फिर भ्रष्टाचार करने कि हिम्मत किसी में नहीं होती. लेकिन आज तो छला जाने वाला व्यक्ति भी अपनी ऑंखें बंद कर लेता हैक्योंकि वो भ्रष्टाचारी को अदालत में सौपने कि बजाय भगवान को सौप देता है कि वह इंसाफ करेगा. अगर भगवान ही सबके कुकर्मो का फल  देने के लिए है तो फिर अदालते क्यों बनायीं गयी हैक्यों इन पर करोडो  खर्च हो रहा हैख़त्म कर दो इन्हें !!
क्योंकि अदालतों का होना भी भगवान की इच्छा का फल है बिना उसकी मर्जी के पत्ता भी नहीं हिल सकता . यदि भ्रष्टाचार और कुकर्म अधिक बढ़ते है तो मनुष्य कर भी क्या कर सकता है ये भगवान की इच्छा है. हाँ इतना अवश्य है कि
जब जब होय धर्म की हानीबाढ़हि  अधम असुर अभिमानीतब तब प्रभु धर विविध शरीरहरहिं सदा सुर सज्जन पीरा‘ क्योंकि गीता में भोगवान‘ कृष्ण कहते है-
यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवतिभारतअभ्युत्थानं अधर्मस्य तदात्मन स्राजम्यहम‘. तो फिर क्या पड़ी है इन ब्रह्मनवादियों को कि  वे भ्रष्टाचार और कुकर्मों को रोंके.यदि भ्रष्टाचार बाधा है तो ये कलियुग का प्रभाव है और इसके नाश के लिए भगवान का दसवां अवतार कल्कि‘ नाम से होने वाला है . भविष्य पुराण में और अनेक ब्राह्मणवादी ग्रंथो में लिखा है फिर ब्राह्मणवाद के शिकार लोग भ्रष्टाचार का प्रतिरोध क्यों करने लगे.
कितनी बेबसी लादी है इस ब्राह्मणवाद ने.मात्र दिमागी काम करने वाले वकीलडाक्टर और IAS जैसे लोग बिना किसी अनुपात के धन कमायें. जो प्रतिभा समाज सेवा के लिए है उसका सदुपयोग होना ही चाहिए लेकिन इतना बड़ा अंतर आमदनी में हो तो हरामखोरी तो पनपेगी ही. लेकिन इस देश में इस पर विचार नहीं होता कि किसान हल चला कर ईमानदारी से उत्पादन करता है और समाज का पेट पलता हैलेकिन जो रंच मात्र भी उत्पादन नहीं करते उनकी आमदनी इस हाड़तोड़ आदमी से कई गुना क्योंयदि किसान IAS का काम आसानी से नहीं कर सकता है तो IAS भी तो किसान का काम आसानी से नहीं कर सकता हैकाम की गरिमा के अनुसार उत्पादन के कारण किसान प्रथम  है. यदि सभी कामो को आवश्यक मानते हुए बराबर कहा जाये तो आमदनी में इतना फर्क क्योंयह भी भगवान का बनाया हुआ है कि मनुष्य का,ब्राह्मणवादी इस पर विचार नहीं करतेक्योंकि उनकी आँखों पर  पुनर्जन्म और भाग्यवाद का रंगीन चश्मा चढ़ा हुआ हैब्राह्मणवाद हरामखोरी को बढ़ावा देने वाला रहा है इसीलिए जब उनके पुनर्जन्म और भाग्यवाद पर चोट पहुंचती है तो वे तिलमिला उठते है.
गुणों का आदर करने वाले और अवगुणों के खिलाफ बगावत करने वाले समाज में भ्रष्टाचार को स्थान नहीं मिलता. किन्तु ब्राह्मणवाद में तो- पतितोअपि द्विजः श्रेष्ठा न च शूद्रो जितेन्द्रियः / पतित यानि अधर्मी ब्राह्मण श्रेष्ठ है किन्तु इन्द्रियों को जीतने वाला शूद्र श्रेष्ठ नहीं हो सकता. पुनर्जन्म और भाग्य को जब तक प्रतिभा का आधार मानेंगे तब तक ब्राह्मणवाद का नाश नहीं होगाआज प्रशासन में ब्रह्मनवादियों का वर्चस्व है और वे पतित होते हुए भी भी श्रेष्ठ हैउनका भ्रष्टाचार अबाध गति से चलेगाक्योंकि ये भ्रष्ट होते हुए भी शोषितों से श्रेष्ठ है.
उस शूद्र से भी जो कर्तव्यपरायण और सदाचारी हैबलिहारी है इस ब्राह्मणवाद की! जब तक मानववादी जज न हो,  ऐसी व्यवस्था दे ही नहीं सकता है जो की ब्राह्मणवाद के ऊपर एक श्लोक  ने दी हो. यही क्यों?.. तुलसीदास ने इनकी मुर्खता को ढकने का प्रयास किया है – पूजिय विप्र शील गुण हीनाशूद्र न गुण गण ज्ञान प्रवीना/ जिस समाज में गुणों का आदर नहीं होगा तो वो भ्रष्टाचारी समाज ही होगा.
आज जब किसी शूद्र की लड़की के साथ ब्राह्मणवादी बलात्कार,यौन शोषण करते है तो ये कहा जाता है की ऐसा तो होता आया है जाने भी दो यारों. यदि किसी ब्राह्मणवादी की लड़की के साथ कोई शूद्र या म्लेच्छ ख़ुशी से शादी कर ले तो इनमे हाहाकार मच जायेगाश्रुति केस अभी लोगो को भूला नहीं होगा. यही है ब्राह्मणवाद की महिमाउसमे दोष की कोई परिभाषा नहीं. जन्म से ही उत्पन्न जाति की परिभाषा है फिर गुणों का आदर कैसे समाज में हो सकता है?? भ्रष्टाचार का भयंकर बोलबाला प्रशासन में हैइसे ब्रह्मान्वादियों ने बढ़ावा दिया हैउच्च श्रेणी की नौकरियों में शूद्रों की संख्या १० % से अधिक नहीं है जबकि शूद्र उत्पादक वर्ग है और आबादी 90% है.
परम मेधावान युवा भले ही  अच्छे पद में पहुँच जायेनहीं तो शूद्रों को प्रशासन में लेने की हिचक सदैव रहती है. देश के प्रशासन में आज तक जितने भी घोटालें हुए है उनको इसलिए दबा दिया गया क्योकि घोटाले के दोषी ब्राह्मणवादी थे (बोफोर्स कांड,ताबूत घोटालातरंगो का घोटाला- 2 G spetrum & S-band spectrum case, राष्ट्रमंडल खेलआदर्श सोसईटी इत्यादि). इसलिए प्रसाशन में ज्यादा से ज्यादा शूद्रों को लेना चाहिए. वैसे तो वे स्वयं ही डरेंगे और स्वाभाव से अर्जक (मेहनत कर के अर्जन करने वाला) होने के कारण हरामखोरी पर यकीन नहीं करेंगे किन्तु इसमें अड़चन ब्राह्मणवाद ही है. क्योकि पूजिय विप्र शील गुण हीनाशूद्र न गुण गण ज्ञान प्रवीना‘, उनके कानो में 24 घंटे गूंजता रहता है इसलिए वे भी इसका शिकार हो जाते है.अतः स्पष्ट है जब तक ब्राह्मणवादको समूल मिटाया नहीं जायेगा और जब तक जीवन के लिए ये मूल्य नहीं बदलेंगे तब तक भ्रष्टाचार नहीं समाप्त नहीं होगा. इसका समाधान मानववाद में है.
मानववाद की क्या पहचान- सभी मानव एक सामान,
पुनर्जन्म और भाग्यवाद – इनसे जन्मा ब्राह्मणवाद
(रामस्वरूप वर्मा जी की  रचना मानववाद बनाम ब्राह्मणवाद ‘ से )

Sachchi Baten

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