July 16, 2024 |

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अब दुनिया के किसी भी कोने से पैथोलॉजिस्ट कर सकेंगे डायग्नोसिस

Sachchi Baten

डिजिटल माइक्रोस्कोपी का नया युग: मिर्जापुर के सम्राट ने बनाया डिजिटल स्मार्ट डिवाइस

– देश में घटती पैथालॉजिस्ट की संख्या के लिए हो सकता है वरदान

– भारत सरकार ने 18अप्रैल को पेटेंट की दी मंजूरी

इसके पहले की उपलब्धि
– इसके पहले भारत सरकार सम्राट के तीन पेटेंट को दे चुकी है मंजूरी
– दिव्यांगों के लिए जीभ की सहायता से व्हील चेयर को कंट्रोल करने वाले बना चुके हैं डिवाइस
– मलेरिया उन्मूलन के लिए बनाया है माइकेलिस ऑटोमेटेड माइक्रोस्कोप डिवाइस

डॉ. राजू पटेल, अदलहाट/मिर्जापुर (सच्ची बातें)। पैथोलॉजिस्ट अब डिजिटल माइक्रोस्कोपी के नए युग में दुनिया के किसी भी कोने से डायग्नोसिस कर सकेंगे। यह देश में घटती पैथोलॉजिस्ट की संख्या के लिए भी यह वरदान साबित होगा। इसके पेटेंट को भारत सरकार ने 18 अप्रैल को मंजूरी प्रदान कर उम्मीद की एक नई किरण को जगायी है। मिर्जापुर जनपद के जमालपुर क्षेत्र के डोहरी गांव के मूल निवासी सम्राट सिंह के नए अविष्कार सूक्ष्मदर्शी को सक्षम करने के लिए डिजिटलीकरण मॉड्यूल स्मार्ट डिवाइस के आने से इस क्षेत्र में एक क्रांति आने की उम्मीद है।

     सम्राट सिंह।

किसी बीमारी से ग्रसित होने पर उस बीमारी का पता लाने के लिए एक टेस्ट कराना होता है। यह टेस्ट किसी नजदीकी डाइग्नोस्टिक केंद्र से करवाते हैं। इसके बाद उससे मिलने वाले रिज़ल्ट के आधार पर इलाज किया जाता है। ज्यादातर समय ये रिपोर्ट पैथोलॉजिस्ट द्वारा बनाई जाती है, लेकिन सबसे बड़ी दुःख की बात यह है कि आज भारत में इन पैथोलॉजिस्ट की संख्या 10 हजार से भी कम है और यह संख्या निरंतर दिन प्रतिदिन प्रति व्यक्ति कम होती जा रही हैं। ज्यादातर पैथोलॉजिस्ट बड़े शहरों में निवास करते हैं। इसके कारण से डाइग्नोस्टिक की क्वॉलिटी दिन प्रति दिन कम होती जा रही है. जो एक बड़ी चिंता का कारण है। इसको दूर करना अति आवश्यक है।

सम्राट बताते हैं कि आज इंटरनेट के जमाने में बहुत सारे काम घर बैठे हो सकते हैं तो ऐसी समस्या का इंटनेट का इस्तेमाल करके निदान भी हो सकता है। पैथोलॉजी के टेस्ट मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित होते हैं एक बियोकेमिकल टेस्ट और एक माइक्रोस्कोपी पर आधारित होता है।

बायोकेमिकल टेस्ट मुख्य रूप से ऑटोमेटिक या सेमी ऑटोमेटिक यंत्रों द्वारा किया जाता है, जिसे किसी भी लैब टेक्नीशियन द्वारा आसानी से संचालित किया जा सकता है और इससे निकली रिपोर्ट को किसी भी एक्सपर्ट पैथोलॉजिस्ट के साथ इंटरनेट की मदद से शेयर करके गुणवत्ता पूर्ण रिपोर्ट ली जा सकती है। लेकिन, बात जब माइक्रोस्कोपी पर आधारित रिपोर्ट की आती है तो पैथोलॉजिस्ट को विभिन्न प्रकार के सैम्पल्स माइक्रोस्कोप के अंदर रखकर देखने होते हैं। फिर अपने अनुभव के आधार पर रिपोर्ट बनानी होती है। इस काम में पैथोलॉजिस्ट की भौतिक उपस्थिति आवश्यक है। इस प्रक्रिया को ऑनलाइन करने के लिए एक आधुनिक डिजिटल माइक्रोस्कोप की आवश्यता होगी। आज के जो भी डिजिटल माइक्रोस्कोप उपस्थित हैं, वह एक अच्छी माइक्रोस्कोपिक फोटो निकालने में तो सक्षम हैं। किंतु, वास्तविक समय में डाटा साझा करने में सक्षम नहीं होते।

माइक्रोस्कोप को स्मार्टफोन या टैबलेट के साथ जोड़ने पर करेगा काम

इस समस्या का समाधान करने के लिए मिर्जापुर के सम्राट सिंह ने मुंबई थाने स्थित आईआईटी बॉम्बे की स्टार्टअप मेडप्राईम टेक्नोलॉजिज ने एक नया आविष्कार किया है, जिसको 18 अप्रैल को भारत सरकार के पेटेंट कार्यालय ने इस पेटेंट को मान्यता प्रदान की है। मेडप्राईम के चीफ नए अविष्कार करने वाले सम्राट सिंह ने इस आविष्कार के बारे में बताया कि यह टेक्नोलॉजी किसी नये माईक्रोस्कोप को स्मार्टफोन या टैबलेट के साथ जोड़ता है और किसी भी लैब टेक्नीशियन और उसके माईक्रोस्कोप को दूर बैठे किसी भी एक्सपर्ट पैथोलॉजिस्ट के साथ वास्तविक समय में डाटा साझा करने में मदद करता है। यह एक परिपूर्ण टेली माइक्रोस्कोपी का समाधान, जिसकी मदद से एक पैथोलॉजिस्ट दुनिया के किसी भी कोने में बैठकर माइक्रोस्कॉपी स्लाइड को देखकर अपनी रिपोर्ट तैयार कर सकता है और एक गुणवत्तापूर्ण रिपोर्ट किसी दूरगामी क्षेत्र तक भी पहुँचा सकता है। इस टेक्नोलॉजी पर आधारित उत्पाद को मार्केट में पहले ही उतारा जा चुका है, जिसके प्रारंभिक उपयोगकर्ता एम्स राजकोट है। मेडप्राईम टेक्नोलॉजिज एक मेडिकल डीवाईस कंपनी है। जो टेलीपैथोलॉजी और टेलीमाइक्रोस्कोपी से संबंधित उपकरण बनती है। सम्राट के तीन और साथियों ग्रीष्मा, महेश और बिनील ने भी अहम जिम्मेदारी निभाई है।

ऐसे करें उपयोग –
इस आविष्कार का उपयोग करना बेहद ही सरल है। क्यों कि एक पैथोलॉजिस्ट को माईक्रोस्कोप का उपयोग करना बहुत अच्छे तरीके से आता है और इसके उपयोग के समय बदलाव सिर्फ इतना है कि किसी भी सैंपल की स्टडी अब लेंस के अंदर ना देखकर सीधा स्मार्ट टैबलेट या स्मार्टफ़ोन के स्क्रीन पर देखना है। इस संयंत्र को चलने के लिए प्लेस्टोर या एपल स्टोर से सिलिका एप इंस्टाल करना होता है। उसके बाद इस एप में दिए विभिन्न प्रकार के टूल्स का उपयोग करके एक पैथोलॉजिस्ट वास्तविक समय में डाटा साझा करने के अलावा बहुत सारे और भी कार्यों को कर सकता है, जो उनके निदान की नियमित प्रक्रिया का हिस्सा है। इसके अलवा पैथोलॉजिस्ट थर्ड पार्टी एप जैसे व्हाट्सएप, गूगल मीट या माइक्रोसॉफ्ट टीम का इस्तेमाल भी कर सकते हैं, जो वास्तविक समय में डाटा साझा करने के काम को और भी सरल बनता है।

दिब्यांग के लिए बना चुके हैं जीभ से चलने वाले व्हील चेयर
इसके पहले सम्राट ने हाथ और पैर से दिव्यांगजन के लिए टंग आपरेटेड स्वीचिंग माड्यूल का निर्माण कर विश्व स्तर पर अपनी काबिलियत को साबित कर दिखाया है। इस डिवाइस के माध्यम से दिव्यांग हाथ पैर के बजाय अपनी जीभ से व्हील चेयर चलाने के साथ ही आसानी से टीवी का चैनल बदलना, पंखा चालू करना, लाइट बुझाने का काम बिना किसी के मदद से कर सकेंगे। ऑपरेटेड स्वीचिंग माड्यूल सेंसर पर आधारित डिवाइस है। इसका सेंसर इतना संवेदनशील है कि जीभ की आहट को पहचान लेता है। इस डिवाइस को हेलमेट की तरह सिर में पहनना होता है। सम्राट के इस डिवाइस को भारत सरकार ने 16 फरवरी को ही पेटेंट की मंजूरी दे दी है।

उच्च संस्थानों में हो रहा है डिजिटल माइक्रोस्कोप्स संचालित

सम्राट के डिजिटल माइक्रोस्कोप्स भारत के सभी नामी गिरामी मेडिकल कॉलेज जैसे अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज, ग्रांट मेडिकल कॉलेज, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में उपयोग के साथ बड़े संस्थान आईआईटी दिल्ली, आईआईटी चेन्नई, डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्व विद्यालय में भी इसका उपयोग हो रहा है। सम्राट का कहना है कि जल्द ही हमारे डिवाइस विदेशों में भी निर्यात होंगे।

सात में चार डिवाइस को मिल चुकी है सरकार से पेटेंट मंजूरी

सम्राट ने भारत सरकार के समक्ष सात पेटेंट के लिए अप्लाई किया है, जिसमें से चार पेटेंट को मंजूरी मिल चुकी है। ये आविष्कार मुख्यतः पानी फिल्टरेशन और डिजिटल माइक्रोस्कोप पे आधारित हैं।


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