July 24, 2024 |

BREAKING NEWS

- Advertisement -

नीतीश कुमार के पेट में दांत हैं, उनके संदेश को डिकोड करना नामुमकिन है

Sachchi Baten

INDIA का संयोजक बनने के सवाल पर नीतीश की ‘ना’ के हैं कई मायने

राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव छोटे भाई नीतीश कुमार को नहीं समझ सके तो और की क्या बिसात

राजेश पटेल, मिर्जापुर (सच्ची बातें)। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को समझ पाना आसान नहीं है। यह कहें कि नामुमकिन है तो गलत नहीं होगा। जब बड़े भाई राजद सुप्रीमों लालू प्रसाद यादव नहीं समझ सके तो और की क्या बिसात है। तभी तो लालू प्रसाद यादव ने संसद में कहा था कि सभी को मुंह में दांत होते हैं, नीतीश को पेट में दांत हैं।

इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव अलायंस INDIA  का संयोजक या प्रधानमंत्री पद के दावेदार के संबंध में पत्रकारों ने सवाल पूछा तो नीतीश कुमार ने झट से कहा कि ‘ना, ना, ना, हमको कुछ नहीं चाहिए। हम तो चले हैं सभी को एक करने। मेरी कोई इच्छा नहीं है।’ इनकी इस ‘ना’ में कई रहस्य छिपे हैं।

सभी को याद होगा कि 1977 में जब जनता पार्टी बनी थी तो इसके सूत्रधार लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने भी कोई पद नहीं लिया था। संभवतः पद की लालसा न होने के कारण ही जनसंघ जैसी पार्टी का जनता पार्टी में विलय कराने में सफल हो सके थे।

आज फिर उसी तरह की स्थिति है। उस समय भी लोकतंत्र पर खतरा मंडरा रहा था। आज भी। जानकार बताते हैं कि जिस तरह से संवैधानिक संस्थाओं पर हमला किया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को बहुमत का फायदा उठाते हुए संसद में अध्यादेश के जरिए पलटा जा रहा है। सत्ता पक्ष द्वारा संविधान में बदलाव की जरूरत जताई जा रही है, उससे यही लगता है कि यदि आज की सत्तारूढ़ पार्टी 2024 के चुनाव में फिर से सत्ता में आई तो यह चुनाव अंतिम होगा।

ऐसी स्थिति में देश व उसका संविधान बचाने के लिए किसी न किसी को तो त्याग की भावना प्रदर्शित करनी होगी। इसकी शुरुआत नीतीश कुमार ने कर दी है। यह समय येन-केन प्रकारेण सत्ता हासिल करने का नहीं है। यह समय कुर्सी को ठोकर मारने का है। जो ठोकर मारेगा, वही बाद में सिकंदर भी कहलाने का हकदार होगा।

कुर्सी को ठोकर मारने के इसी आत्मबल के कारण जयप्रकाश नारायण लोकनायक बन गए। आज भी पूजे जा रहे हैं। जब त्याग की भावना इतनी बलवती थी, तभी वह उस समय की तानाशाह कही जाने वाली इंदिरा गांधी को सत्ताच्युत कर सकने में सफल हुए थे।

जेपी के चलते ही 1977 में प्रधानमंत्री बने मोरारजी देसाई को आज की पीढ़ी जानती भी नहीं होगी। उनके बारे में जानने के लिए गूगल करती है। लेकिन जयप्रकाश नारायण की अगुवाई में हुई संपूर्ण क्रांति को सभी जानते हैं। ठीक उसी तरह से 2014 के चुनाव के ठीक पहले जैसे अन्ना आंदोलन को जानते हैं। इस आंदोलन को भी इसीलिए जानते हैं कि अन्ना हजारे को कोई पद नहीं चाहिए था। उनकी रिमोट चाहे जिसके भी हाथ में रहा हो, लेकिन अन्ना के बुढ़ापे के जोश को देखकर देश की तरुणाई उनके साथ हो गई थी। परिणाम सत्ता परिवर्तन के रूप में देखने को मिला।

न तो जेपी के दामन पर कोई दाग था, और न ही अन्ना हजारे के। इसी तरह से नीतीश कुमार भी इतने वर्षों तक केंद्र में मंत्री रहे तथा बिहार के मुख्यमंत्री हैं, उनके कुर्ते पर भी कोई दाग नहीं लग सका है। हां, उन्होंने समय-समय पर जाहिर किया है कि वह राजनीति में उच्च कोटि के खिलाड़ी हैं।

नीतीश कुमार ने जब-जब सत्ता की कुर्सी को ठोकर मारी है, कुर्सी ने अपने आप उनके पास आकर बैठने का निमंत्रण दिया है। साल 2000 में विधानसभा चुनाव के नतीजे आए। आरजेडी सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन सरकार बनाने से काफी दूर रह गई। एनडीए गठबंधन के पास भी बहुमत नहीं था। हालांकि, गठबंधन ने सरकार बनाने का दावा कर दिया।

पूर्व केंद्रीय मंत्री राम विलास पासवान ने अपनी जीवनी में लिखा है कि विधायकों की संख्या जुटाने के लिए अटल बिहारी और जॉर्ज साहेब ने मुझे मुख्यमंत्री बनकर बिहार जाने के लिए कहा। उन दोनों का मानना था कि मैं अगर मुख्यमंत्री बना तो आरजेडी-कांग्रेस के दलित विधायक साथ आएंगे। पासवान आगे लिखते हैं- काफी सोच-विचार के बाद मैंने मुख्यमंत्री नहीं बनने का फैसला किया। इसके बाद नीतीश का नाम आगे बढ़ाया गया। नीतीश उस वक्त केंद्रीय कृषि मंत्री थे। ऑफर आते ही उन्होंने ‘हमको नहीं चाहिए’ कहकर ठुकरा दिया।

पासवान के मुताबिक नीतीश को यह डर सता रहा था कि अगर बहुमत साबित नहीं कर पाए, तो बिहार में ही रहना पड़ेगा। ऐसे में केंद्र का मंत्री पद हाथ से चला जाएगा। अटल और जॉर्ज नीतीश के इस डर को भांप गए और उन्हें आश्वासन देकर बिहार भेजा।

नीतीश कुमार 2000 में बिहार के मुख्यमंत्री बने। हालांकि, बहुमत साबित नहीं कर पाने की वजह से 7 दिन बाद ही उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने के दो महीने बाद नीतीश फिर केंद्र में मंत्री बन गए।

दूसरी घटना साल 2020 की है। बिहार विधानसभा चुनाव में जेडीयू तीसरे नंबर की पार्टी बन गई। इस चुनाव में आरजेडी को 75, बीजेपी को 74, जेडीयू को 43, कांग्रेस को 19 और अन्य को 32 सीटें मिली थीं। 126 विधायकों के साथ एनडीए ने सरकार बनाने का दावा ठोक दिया, जिसमें बीजेपी के 74 और जेडीयू के 43 विधायक शामिल थे।

एनडीए ने जैसे ही सरकार बनाने का दावा किया, नीतीश ने मुख्यमंत्री नहीं बनने की बात कही दी। राजनीति के जानकारों के मुताबिक नीतीश कुमार ने भाजपा हाईकमान से कहा कि उनको अब कोई पद नहीं चाहिए। आप अपनी पार्टी से मुख्यमंत्री बनवा लीजिए।

नीतीश की बात सुनने के बाद बीजेपी में खलबली मच गई। हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हस्तक्षेप के बाद नीतीश मुख्यमंत्री बनने को राजी हो गए, लेकिन दो साल के भीतर ही एनडीए से अलग हो गए। फिर आरजेडी के साथ सरकार बनाई।

नीतीश को जानने वाले लोग कहते हैं कि नीतीश जो बनना चाहते हैं, खुद नहीं कहते। ऐसी परिस्थिति बना देते हैं कि दूसरे उनकी बात को कहने लगें। इसका प्रमुख कारण यह भी है कि बीजेपी के साथ रहने के बावजूद नीतीश कुमार की सेक्युलर छवि को जरा भी आंच नहीं आई।

वह अपने थ्री सी करप्शन, क्राइम और कम्युनलिज्म से समझौता नहीं करने के संकल्प को बार-बार दोहराते रहते हैं। नीतीश कुमार बिहार में करीब 16 साल से मुख्यमंत्री हैं और केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में भी मंत्री रह चुके हैं, लेकिन अब तक उन पर व्यक्तिगत रूप से कोई भी भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगा है। इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव अलायंस INDIA गठबंधन के अधिकतर नेता भ्रष्टाचार का आरोप झेल रहे हैं।

मुम्बई में इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव अलायंस INDIA गठबंधन की बैठक शुरू होने की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। नीतीश कुमार ने कह दिया है कि उनको कोई पद नहीं चाहिए। यही उनकी मेरिट है। ऐसे समय में जब आम आदमी पार्टी सहित कई और पार्टियों के कार्यकर्ता अपने-अपने नेता को संयोजक बनाने की मांग कर रहे हैं। नीतीश का यह कहना कि उनको कोई पद नहीं चाहिए, इसके मायने लगाने में लोग पूरी मेहनत कर रहे हैं। लेकिन उनके इस संदेश को डिकोड करना आसान नहीं है।

 


Sachchi Baten

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

Leave A Reply

Your email address will not be published.