July 23, 2024 |

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400 पार के लिए दम दिखाने की जरूरत!

Sachchi Baten

पहले चरण में धीमा मतदान, भाजपा के लिए बड़ी चिंता

– बंगाल जैसे राज्यों में 78% मतदान विपक्ष के लिए अच्छी खबर

– मोदी लहर को लेकर संशय की स्थिति, मतदाता भी मौन

-भाजपा के पक्ष में माहौल 2014 या 2019 जैसा नहीं

 

हरिमोहन विश्वकर्मा, नई दिल्ली। 19 अप्रेल को 18वीं लोकसभा के गठन के लिए पहले चरण के बाद राजनीतिक विश्लेषक असमंजस में पड़ गए हैं। जिस तरह पहले चरण के मतदान प्रतिशत में कमी आई है, वह ख़ासकर भाजपा के लिए नुकसानदेह बताई जा रही है।

सिर्फ बंगाल में 78% से अधिक मतदान हुआ है, जो ममता बनर्जी के लिए अच्छा संकेत समझा जा रहा है। दरअसल, चुनाव को लेकर भारत का मध्य वर्ग इस बार अधिक उदासीन दिख रहा है। लोग मान कर चल रहे हैं कि चुनाव बाद बड़े बदलाव की कोई उम्मीद नहीं है। चुनाव के केंद्र में फिलहाल मोदी ही हैं।

मोदी ने ‘अबकी बार- चार सौ पार’ का नारा दिया है और इसे लेकर पूरे देश में बहस छिड़ी है कि क्या वह इस चार सौ पार के जादुई आंकड़े को छू सकेंगे? इसका स्पष्ट उत्तर तो मतों की गिनती के बाद ही मिलेगा, पर इस समय देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में मोदी समर्थन की लहर के बावजूद दिल्ली में बैठे भाजपा के बड़े नेता आश्वस्त नहीं है, यही कारण है कि एक-एक सीट के लिए गुणा-गणित किया जा रहा है। मान्यता है कि केन्द्र की सत्ता का रास्ता यूपी से ही होकर गुजरता है। 2014 और 2019 में भाजपा को केंद्र में स्थापित करने में उत्तर प्रदेश का योगदान सर्वाधिक रहा है।

दोनों चुनाव में उत्तर प्रदेश ने भाजपा और उसके सहयोगी दलों को क्रमशः 73 और 64 सांसद चुनकर दिए। इसी संख्या बल के आधार पर प्रधानमंत्री मोदी केंद्र की सत्ता पर काबिज हो सके। इस बार तो भाजपा ने 80 की 80 सीट जीतने का लक्ष्य रख दिया है। दावेदारों के दावे अपनी जगह हैं लेकिन 18वीं लोकसभा चुनाव की रंगत 2014 और 2019 जैसी नहीं है।

2019 के लोकसभा चुनाव में विभाजित विपक्ष और मोदी की लोकप्रियता के चरम पर भी भाजपा बहुमत के लिए जरूरी संख्या से मात्र 31 सीट ज्यादा ही जीत पाई, तो सवाल है कि 2024 में 370 या 400 का लक्ष्य कैसे मुमकिन होगा? एक सच्चाई यह भी है कि विपक्षी दल 2019 की तुलना में आज अधिक हताशा की स्थिति में है। पर पहले दौर के मतदान की स्थिति को देखते हुए विपक्ष में जोश भर सकता है।

मूल प्रश्न यह है कि जिस राजनीतिक आत्मबल की जरूरत विपक्ष के पास होनी चाहिए वह उसके पास क्यों नहीं है? क्योंकि वह 2019 से भी अधिक हताशा की स्थिति में है। इन स्थितियों के बावजूद सवाल यह भी है कि क्या देश में आज भी मोदी के प्रति वही दीवानगी है, जो 2014 या 2019 में थी? शायद नहीं। कई बार जनता एक ही व्यक्ति और शासन को देखते-देखते ऊब महसूस करने लगती है। यह भी एक बड़ा कारण हो सकता है।

इसके बावजूद अगर मोदी या भाजपा की स्थिति बाकी दलों से मजबूत दिख रही है तो उसका कारण यही है कि मोदी नहीं तो और कौन? वास्तविकता ये है कि अगर भाजपा को शिकस्त देनी है तो विपक्षी दलों को भी जरूरत के मुताबिक ढलना होगा। भाजपा ने अपने को जरूरत के मुताबिक बदला है और पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र को भी बहुत हद तक बचा कर रखा है। हालांकि भाजपा में भी नेता पुत्रों को टिकट देकर पुरस्कृत किया जाता रहा है, लेकिन कोई यह नहीं कह सकता की पार्टी परिवारवाद की गिरफ्त में है। दूसरी ओर विपक्षी दल आंतरिक बदलाव से हमेशा भागते रहे हैं। कांग्रेस, राजद, सपा जैसी पार्टियां अभी भी पुरानी हो चुकी विचारधाराओं पर ही केंद्रित हैं। वास्तव में विपक्ष के पास यह अंतिम अवसर हो सकता है ज़ब वे मतदाताओं को भरोसे में लेकर चुनाव में बेहतरीन प्रदर्शन करें।

(लेखक राष्ट्रीय हिंदी दैनिक तरुण मित्र के प्रबंध संपादक हैं।)


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