July 23, 2024 |

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मप्र ही नहीं, उप्र में भी भाजपा के खेवनहार बनेंगे ‘मोहन’

Sachchi Baten

मप्र में ‘शिव’ युग के मुक़ाबले ‘मोहन राज’ के पीछे का सच

– उप्र के अम्बेडकरनगर के ‘कुंवर’ हैं मोहन

-अखिलेश यादव को उप्र में चुनौती दे सकते हैं मप्र के नए सीएम

-पिछले 20 साल से मप्र में पिछड़ा ही बनता आया है सीएम

हरिमोहन विश्वकर्मा, नई दिल्ली। मप्र में भाजपा आलाकमान ने तमाम बड़े नेताओं के बाद भी आखिर मोहन यादव को ही मुख्यमंत्री के रूप में क्यों चुना, यह सवाल हफ्ते भर बाद भी राजनीतिक हलकों में पूछा जा रहा है और सभी अपने आकलन के हिसाब से इसकी विवेचना भी कर रहे हैं।

दरअसल प्रदेश में भाजपा की ओर से 2003 से ओबीसी मुख्यमंत्री ही प्रदेश की कमान संभाल रहे हैं। उमा भारती से लेकर बाबूलाल गौर (यादव) और शिवराज सिंह चौहान ने पिछड़े वर्ग को भाजपा का समर्थक बना दिया है। एक अनुमान के मुताबिक, प्रदेश में 51 प्रतिशत संख्या ओबीसी की है, जिसमें यादवों की संख्या 3 से 4 प्रतिशत है।

आर्थिक रूप से सक्षम यादव समुदाय प्रदेश के विकास में भी महत्त्वपूर्ण योगदान देता है। बाबूलाल गौर प्रदेश के पहले यादव मुख्यमंत्री थे, किंतु वे यादवों को एकजुट नहीं कर पाए। जबकि कांग्रेस के उप-मुख्यमंत्री के रूप में सुभाष यादव ने यादवों को एकजुट कर सहकारिता को कांग्रेस की सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति बना दी थी। उनके जाने के बाद उनके बेटे अरुण यादव ने यादवों को संभाल कर नहीं रखा और वे कांग्रेस से कट गए। इसी दौर में मोहन यादव भी राजनीति की सीढ़ियों पर नेता के तौर पर यादवों को अपना नेता नज़र आ रहे थे।

इसके बाद हाल ही में गठित इंडिया गठबंधन ने जातिगत जनगणना के साथ ही “जिसकी जितनी भागीदारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी” की बात शुरू कर दी। इसका केंद्र बिंदु कहीं न कहीं बिहार और उत्तर प्रदेश था, जिसकी काट ढूँढना भाजपा के लिए आवश्यक था। मध्य प्रदेश में भाजपा नेतृत्व को वह काट मोहन यादव के रूप में दिखी। उनकी ससुराल भी उप्र के अम्बेडकरनगर में है, इसलिए लोकसभा चुनाव प्रचार में भी मोहन यादव अखिलेश यादव के समाज के योगदान पर प्रश्न उठाते दिखें, तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

भाजपा भी यादव समुदाय को यह संदेश देना चाहती है कि यदि समुदाय उसके साथ आएगा तो वह उन्हें भी उच्च पदों पर बैठाने से गुरेज नहीं करेगी। फिर प्रदेश के किसी भी गुट में न होना और सभी गुटों में स्वीकार्यता मोहन यादव का पक्ष मजबूत कर गई। हालांकि चुनौतियां उनके समक्ष भी कम नहीं हैं। मुख्यमंत्री के रूप में शिवराज सिंह चौहान ने लोकप्रियता के आयाम स्थापित कर दिए हैं, मोहन यादव को उसे भी ध्यान में रखकर सुशासन देना होगा। 2024 का लोकसभा चुनाव उनके लिए अग्निपरीक्षा जैसा होगा, जो उनकी ताजपोशी के पैमाने को तौलेगा।

मोहन यादव का अब तक का राजनीतिक जीवन निर्विवाद नहीं रहा है। उन पर पार्टी के ही कई नेताओं ने सिंहस्थ में हुए भ्रष्टाचार के बड़े आरोप लगाए थे। इसमें उज्जैन उत्तर से भाजपा के पूर्व विधायक पारस जैन बड़ा नाम थे। यहां तक कि कैबिनेट की बैठक में भी मोहन यादव द्वारा परिवार के नाम पर जमीनों की हेरा-फेरी और सिंहस्थ मेला क्षेत्र की जमीन को आवासीय में बदलने के गंभीर आरोप लगे थे। परिवारवाद को लेकर भी मोहन यादव अपने ही दल के नेताओं के निशाने पर रहे हैं और मुख्यमंत्री बनने के पश्चात उन्हें इन आरोपों से बचने की आवश्यकता है, क्योंकि भाजपा के लिए परिवारवाद एक प्रमुख मुद्दा है।

बहरहाल, मध्य प्रदेश में लगभग डेढ दशक लंबा शिवराज का राज समाप्त हो गया है और अब यादवराज की शुरुआत हो रही है। दूसरी ओर माधवराव सिंधिया के बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया केन्द्र में अब भाजपा के ताकतवर प्रतिनिधि और मोदी के करीबी बन गए हैं। इस तरह देखा जाए तो राज्य से लेकर केन्द्र तक मध्य प्रदेश भाजपा में जय माधव-जय यादव युग की शुरुआत हो रही है। यह भाजपा के लिए कितनी लाभकारी रहेगी, यह तो आने वाला समय बतायेगा।


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