July 19, 2024 |

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मिर्जापुर संसदीय सीट किसके प्रयास से हुई अनारक्षित, आपका भी जानना है जरूरी

Sachchi Baten

2014 के चुनाव के ठीक पहले भारत निर्वाचन आयोग ने मिर्जापुर को कर दिया था अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित

इसके खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी अनुराग सिंह ने, सफलता भी मिली

राजेश पटेल, मिर्जापुर (सच्ची बातें)। मां विंध्यवासिनी का धाम वाला मिर्जापुर जिला अक्सर चर्चा में ही रहता है। कभी दस्यु से सांसद बनी फूलन देवी की वजह से तो कभी वेब सीरीज कालीन भैया को लेकर। इस बार आइएएस दिव्या मित्तल के कारण चर्चा में है। यहां की सांसद व केंद्रीय राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल द्वारा यहां कराए गए विकास कार्यों की वजह से भी यह जिला चर्चा में रहता है।

विकास के प्रति संजीदा सांसद अनुप्रिया पटेल मिर्जापुर को कैसे मिलीं। इसकी कहानी बड़ी लंबी है। और, इसके सूत्रधार मिर्जापुर से बीजेपी के कभी कद्दावर नेता रहे ओमप्रकाश सिंह के सुपुत्र अनुराग सिंह रहे। ओमप्रकाश सिंह चुनार से कई बार विधायक रहे। उत्तर प्रदेश सरकार में कई अहम विभागों के मंत्री तो थे ही, भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं। अनुराग सिंह चुनार विधानसभा से 2017 में विधायक चुने गए। 2022 के चुनाव में भी उन्होंने जीत दर्ज की है।

मिर्जापुर संसदीय क्षेत्र का स्वतंत्र अस्तित्व 2009 में आया। इसके पहले आधा से ज्यादा हिस्सा राबर्ट्सगंज संसदीय क्षेत्र के नाम से जाना जाता था। शेष मिर्जापुर-भदोही। 2009 के चुनाव में यहां से समाजवादी पार्टी के सांसद बालकुमार पटेल चुने गए। वह चित्रकूट के ही निवासी हैं, जहां की मौजूदा सांसद अनुप्रिया पटेल हैं। केंद्रीय राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल की ससुराल चित्रकूट जिले में ही है। बालकुमार पटेल चंबल के दस्यु सरगना रहे ददुआ के भाई हैं। अनुप्रिया पटेल सामाजिक न्याय के महानायक डॉ. सोनेलाल की तीसरी बेटी हैं।

भारत निर्वाचन आयोग ने 2009 के लोकसभा चुनाव के पहले मिर्जापुर संसदीय सीट को अलग कर दिया। भदोही कोो संत रविदास नगर में तथा राबर्ट्सगंज को सोनभद्र जिले में शामिल कर दिया। 2009 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने अनुराग सिंह को प्रत्याशी बनाया था, लेकिन उनको समाजवादी पार्टी के टिकट पर चित्रकूट से आकर चुनाव लड़े दस्यु सरगना ददुआ के भाई बालकुमार पटेल ने शिकस्त दे दी।

अनुराग सिंह इस शिकस्त से विचलित नहीं हुए। वह अगले लोकसभा चुनाव 2014 की तैयारी में शिद्दत से जुटे रहे। लेकिन 2014 के चुनाव के ठीक पहले चुनाव आयोग ने अप्रत्याशित निर्णय के तहत मिर्जापुर सीट को अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित घोषित कर दिया। इससे अनुराग सिंह का सांसद बनने का सपना टूट गया। लेकिन, हार नहीं मानी। उन्होंने इसके खिलाफ पहले चुनाव आयोग में याचिका डाली। वहां सुनवाई में देर होने पर कोर्ट की शरण ली।

जानिए इसके पहले की कहानी…

सोनभद्र जिले की दुद्धी विधानसभा से विधायक रहे विजय सिंह गोड़ के प्रयास से गोड़ जाति को अनुसूचित जनजाति में शामिल कर लिया गया। इससे सोनभद्र जिले में अनुसूचित जाति की संख्या कम हो गई। इसी आधार पर 2013 में राबर्ट्सगंज संसदीय सीट को सामान्य कर दिया गया और मिर्जापुर को अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित कर दिया गया।

इसकी जानकारी जब अनुराग पटेल को हुई तो सबसे पहले उन्होंने भारत निर्वाचन आयोग में मिर्जापुर को फिर से सामान्य सीट करने के लिए यहां के जातिगत आंकड़ों का हवाला देते हुए याचिका डाली। पूछा था कि जब 2011 की जनगणना का परिणाम सार्वजनिक किया ही नहीं गया तो मिर्जापुर संसदीय क्षेत्र में जातियों का अधिकृत आंकड़ा कैसे मिला।

अनुराग सिंह बताते हैं कि चुनाव आयोग ने जातियों की संख्या के आधार पर जोन बनाया था। हालांकि यह कानूनन अवैध था। इस जोन के खिलाफ चुनाव आयोग से पूछा गया कि यदि जोन सही है तो भी इसमें मिर्जापुर 13वें स्थान पर है। इसके पहले रायबरेली, अमेठी आदि संसदीय सीटें आती हैं। पहले इनको अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित किया जाए। मिर्जापुर का नंबर तो बहुत बाद में आएगा। इसके लिए काफी मेहनत की गई। पैसे भी खर्च हुए।

चुनाव आयोग सुनवाई की तारीख घोषित करने में देर कर रहा था। लिहाजा कोर्ट की शरण ली गई। केशरीनाथ त्रिपाठी (अब दिवंगत) को इसकी पैरवी की जिम्मेदारी दी गई। कोर्ट में केस होने के बाद ही चुनाव आयोग ने बनारस में जनसुनवाई का कार्यक्रम तय कर दिया। उसमें काफी संख्या में लोग पहुंचे थे। मिर्जापुर से हजारों लोगों का हस्ताक्षरयुक्त ज्ञापन दिया गया। हस्ताक्षर करने वालों जिला पंचायत सदस्य, क्षेत्र पंचायत सदस्य तथा प्रधान भी शामिल थे।

कोर्ट ने जब चुनाव आयोग से जवाब मांगा तो निर्धारित तिथि के चार दिन पहले ही अखबारों में गजट प्रकाशित करा दिया गया कि मिर्जापुर को सामान्य तथा राबर्ट्सगंज को सुरक्षित घोषित किया जाता है। इतनी मेहनत के बाद इस लड़ाई को जीत पाया।

अनुराग सिंह ने कहा कि वह अनुसूचित जाति तथा जनजाति को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने के खिलाफ नहीं है, लेकिन बात तो न्यायसंगत होनी चाहिए।

इतनी मेहनत के बाद अनुराग सिंह को पूरी उम्मीद थी कि 2014 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी से फिर उनको टिकट मिलेगा और सांसद बनकर क्षेत्र के विकास का उनका सपना पूरा नहीं होगा। लेकिन, ऐसा हो न सका। भारतीय जनता पार्टी का चुनावी गठबंधन अपना दल के साथ हो गया और मिर्जापुर सीट अपना दल के खाते में चली गई। परिणामस्वरूप अनुप्रिया पटेल यहां से सांसद चुनी गईं। 2019 के चुनाव में भी जनता ने उनमें ही विश्वास जताया। 2024 के चुनाव में क्या होगा, यह भविष्य ही बताएगा। लेकिन इस लोकसभा सीट को सुरक्षित से सामान्य बनाने के लिए अनुराग सिंह के भगीरथ प्रयास की चर्चा मिर्जापुर के लोग अब भी करते हैं। अनुराग सिंह सांसद नहीं बन सके, इसका तो लोगों में मलाल है ही। क्योंकि वह स्थानीय हैं। लेकिन, खुशी भी है कि अनुप्रिया पटेल जैसी सांसद मिल गईं, जो हर वक्त मिर्जापुर के विकास के लिए ही समर्पित रहती हैं।

 

 

 

 


Sachchi Baten

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