July 24, 2024 |

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MIRZAPUR : मिर्जापुर जिले के पहाड़ा रेलवे स्टेशन में लगाई आग

Sachchi Baten

मिर्जापुर के आजादी के मतवाले…

दो गज कफन भी नसीब नहीं हो सका मिर्जापुर के इस वीर बालक को

पहाड़ा स्टेशन को फूंकने के बाद मिर्जापुर के बालक नरेशचंद्र हो गए शहीद

नरेश चंद्र श्रीवास्तव के अंतिम शब्द, भारत माता की बलिबेदी पर बलिदान हो रहा हूं

-17 अगस्त 1942 पहाड़ा स्टेशन कांड

 

 

डॉ. राजू सिंह, अदलहाट (मिर्जापुर)। नौ अगस्त-1942 को पार्लियामेंट में मिस्टर एमरी के भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के विरोध में दिए गए भाषण के बाद पूरे देश में रोष फैल गया। इसी बीच 14 अगस्त-1942 को पं. जवाहर लाल नेहरू एवं मोहनदास करम चंद गांधी (महात्मा गांधी) के दिए गए भाषण को सुनकर मिर्जापुर के स्वाधीनता प्रहरी भी आग बबूला हो उठे थे।

नेहरू एवं गांधी से प्रभावित जनपद के क्रांतिकारी वीर सपूतों की गैपुरा में बैठक हुई। इसके बाद भरपूरा मंडल के पकरी के पूरा के पं. जीत नरायन पांडेय, बबुरा के पं. पुष्कर नाथ पांडेय, बिरौरा के छविनाथ और बीएलजे इंयर कॉलेज मिर्जापुर के कक्षा 10 वीं के छात्र और खम्हरिया (अब भदोही जिला) के नरेश चंद्र श्रीवास्तव ने मिर्जापुर-चुनार के बीच स्थित पहाड़ा रेलवे स्टेशन को आग के हवाले कर दिया।

जल्दबाजी में छविनाथ उठती आग की लपटों के बीच अंदर कोठरी में ही फंसे रह गए। इस पर नरेश चंद्र अपने साथी छविनाथ को बचाने पहुंचे। छविनाथ को उठाकर बाहर फेंक तो दिया, लेकिन खुद आग की लपटों की चपेट में आकर बुरी तरह से झुलस गए। साथियों ने नरेश को बाहर निकाला और कंधे पर उठा कनौरा गंगा घाट से छोटी नाव से लेकर उस पार बनारस की ओर लेकर निकल पड़े।

इसी अंग्रेज सिपाहियों की नाव क्रांतिकारियों के पीछे लग गई। लेकिन देश को गुलामी की जंजीरों से आजाद कराने का सपना देखने वाले वीर नरेशचंद्र की सांसे हमेशा के लिए थम गईं। साथी भी बहुत सोच विचार करने के बाद बीएचयू के समीप पहुंच एक गांव के गन्ने की खेत में नम आखों से नरेश के शव का छिपा कर नाव से वापस लौट आए।

कछवां-सीखड़ का डाकखाना विध्वंस कांड

अगस्त क्रांति के दौरान सैकड़ों देश भक्त सैनिकों ने कछवां डाकखाना और सरकारी कंबल गोदाम को तहस-नहस किया। जिसमें विष्णुदेव त्रिपाठी, कृष्णानंद त्रिपाठी तुलापुर, विभूति नरायन मितई, कमलाकांत त्रिपाठी, बजहां, अली हुसैन कछवां, महंगू, सहंगू, सुक्खू ऋषि नरायन सिंह, मिडिल स्कूल के अध्यापक श्रीयुत शुक्ल, उमाशंकर सिंह, भरत सिंह, राम दुलारे सभी कछवां, माता प्रसाद जलालपुर शामिल रहे।

वो तारीख जो कभी न भूल पाएंगे लोग

कछवा मंडल के कार्यकर्ता 24 सितम्बर1942 को किरियात मझरा गांव व कछवां मंडल के तालाब पर रणनीति बना रहे थे. उसी समय उन्हें गिरफ्तार कर लिया। इसमें मझरा गांव के राम अभिलाष सिंह, राम अचल सिंह, दलजीत सिंह, शिव जगत सिंह, लालता सिंह, बसंत लाल सिंह, शीतला सिंह, रूपचंद सिंह थे। विश्वेवर सिंह, पन्ना सिंह, राम निरंजन सिंह हांसीपुर, कृष्ण नारायण प्रसाद सिंह रामगढ़, राजेश्वर सिंह व छविनाथ को जेल हुई।

वीर बालक नरेश चंद्र श्रीवास्तव के आखिरी शब्द …मैं भारत माता की बलिबेदी पर बलिदान हो रहा हूं

पहाड़ा स्टेशन विध्वंस काण्ड में भारत माता की बलिबेदी पर अपने प्राण न्यौछावर करने वाले वीर सपूत शहीद नरेश चंद्र अपनी अंतिम सांसे गिन रहे थे। आग की लपटों में बुरी तरह से झुलसने के बाद अंतिम बार नरेश चंद्र ने जब आंखें खोली। उदास साथियों को देख बोले साथियों उदास क्यों हो..। मैं देश की स्वतंत्रता के लिए बलिदान हो रहा हूं। फिर बोले ‘‘भारत-माता की जय’’ और मौन हो गए।

दो गज कफन नहीं हुआ नसीब

1942 के भारत छोड़ो के दरम्यान 17 अगस्त को पहाड़ा स्टेशन कांड में आग में झुलस कर दुनियां से रुखसत होने वाले मां भारती के लाडले नरेशचंद्र को दो गज का कफन भी नसीब नहीं हुआ। साथ ही न चाहते हुए भी अपने नरेश के शव को गन्ने के खेत में छोड़ना पड़ा। उसके बाद शव का क्या हुआ, यह किसी को पता नहीं है।

(संदर्भ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी प्रो. विश्राम सिंह की 1950 में प्रकाशित पुस्तक ‘जिला मिर्जापुर के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास’ से)

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