July 20, 2024 |

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बिहार के सिवान जिले के तितिर स्तूप पर मिले महात्मा बुद्धकालीन प्रमाण

Sachchi Baten

पुरातत्विक साक्ष्य से मिल रही भारतीय इतिहास को नयी दिशा

मौर्य काल से लेकर गुप्तकाल तक का प्रामाणिक साक्ष्य उपलब्ध

सिवान के प्राचीन इतिहास व संस्कृति को जानने के लिये क्षैतिज उत्खनन आवश्यक

सिवान तितिर स्तूप

ललितेश्वर कुमार, सिवान। बिहार के सिवान  जिला के जीरादेई प्रखण्ड के राजस्व गांव तीतिरा टोले बंगरा में तितिर स्तूप है। इसका परीक्षण उत्खनन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण पटना अंचल के सहायक पुरातत्वविद शंकर शर्मा के नेतृत्व में 20 जनवरी 2018 से 20 फरवरी 2018 तक कराया गया। उत्खनन में  प्रचुर मात्रा में पुरातात्विक साक्ष्य मिले।

इनमें जैसे एम्बीपीडब्ल्यू (काला मृद्भांड), धूसर मृद्भांड, टेराकोटा की दर्जनों मूर्तियां, स्टाम्प, टेराकोटा के खिलौने, धूपदानी, चीलम, पीली मिट्टी से बना छोटा स्तूप जैसा आवरण, शीशा की गोली, छोटा शिलालेख (जिस पर किसी लिपि में कुछ अंकित है ), मौर्य कालीन ईंट से निर्मित पिलर, साथ ही अन्वेषण के क्रम में मौर्य, कुषाण व गुप्तकाल के मिश्रित ईंटो से निर्मित भवनावशेष, तथा दो सौ फीट लम्बी दीवार की नींव तथा 30 फीट लम्बी 4 फीट चौड़ा दीवार के अवशेष मिले हैं।

इस स्थल की विशेष महत्ता का खुलासा पटना में बिहार सरकार के कला एवं संस्कृति विभाग द्वारा आयोजित इंडियन आर्किलॉजिकल सोसाइटी, इंडियन प्री हिस्ट्री एवं क्वाटनारी सोसाइटी के त्रिदिवसीय संयुक्त अधिवेशन ( 6 से 8 फरवरी 2019) में हुआ।

यह अधिवेशन बिहार की धरती पर पहली बार हुआ। इसमें तीतिर स्तूप के परीक्षण उत्खननकर्ता पुरातत्त्वविद् शंकर शर्मा ने अपना आलेख प्रस्तुत किया। इसका शीर्षक था “उत्तर बिहार में पुरातात्विक उत्खनन में प्राप्त बाढ़ के अवशेष का प्रमाण ” ।

शर्मा ने बताया कि वर्ष 2018 में तीतिर, जीरादेई के परीक्षण उत्खनन में पुरातात्विक साक्ष्य के रूप में बाढ़ के स्तर का मिलना पूरी उत्तरी बिहार के गुप्तयुगीन पुरातात्विक सन्निवेश के पतन के कारण को उजागर करता है । इस स्थल के प्राचीनता का अंग्रेज पुरातत्वविद् डब्ल्यू. होय सहित दर्जनों भारतीय इतिहासकारों ने उल्लेख किया है तथा सारण डिस्ट्रिक्ट गजेटियर में भी उल्लेख है ।

सहायक पुरातत्वविद शंकर शर्मा ने भी परीक्षण उत्खनन के प्रतिवेदन में वर्णित किया है कि यह महत्वपूर्ण स्थल है। इसकी प्राचीनता व ऐतिहासिक महत्व को जानने के लिये इतनी अल्प अवधि संभव नहीं है । उन्होंने बताया कि अन्वेषण के क्रम में जो भवनाशेष फर्श युक्त मिले, वह प्राचीन नालंदा के भवनाशेष से मेल खाता है ।

साथ ही, इस स्थल पर विदेशी बौद्ध भिक्षुओं की टीम सहित देश व प्रदेश के पर्यटक भी आते रहते हैं। यहाँ भगवान बुद्ध की पूजा व आराधना होती रहती है। यह बौद्ध अनुयायियों के लिए आस्था का केंद्र है तथा इसके 5 किलोमोटर के क्षेत्र में चारों तरफ पुरातात्विक साक्ष्य व बुद्ध की खण्डित प्रतिमाएं मिलती रहती हैं ।

तीतिर स्तूप से कुछ ही दूरी पर दो और 30 से 40 फीट ऊंचा स्तूपनुमा टीला है । जहां प्रचुर मात्रा में पुरातात्विक साक्ष्य बिखरे पड़े है ।

सिवान की  प्राचीन नदी ककुत्था व हिरण्यवती तथा सदानीरा सरयू, जिसका वर्णन बौद्ध साहित्य में है तथा इसके पश्चिमी तट के निकट उक्त स्थल  का होना, इसके पास किशुनपुर, तीतिरा व हिरण्यवती गांव के साथ ही शालवन से संबंधित गांव बंगरा, महुआबारी,  गुलरबगा, बारी टोला, आमवसा, नवल पुर (नवल लता एक पौधा ),अकोल्ही (अकोल का पेड़), सीसहानि (शीशम का पेड़), भलुवही (भिलावा एक औषधीय पौधे), सेलरापुर (सागवान का पेड़ ), पिपरहिया (पीपल का पेड़ ) उक्त सभी गांव शालवन के प्रतीक हैं।

साथ ही चीनी तीर्थयात्री फाहियान व ह्वेनसांग द्वारा  कुइया नगरा का वर्णन करना तथा यहां मुइया नगरा होना, मीठा कुआं होना, लौरिया नन्दन गढ़ के स्तूप से इसका दूरी 12 योजन होना, राम ग्राम देवरिया से पूरब होना, ब्राह्मणों का प्राचीन शहर दरौली होना आदि उक्त सभी तथ्य शोध एवं ऐतिहासिक बहस के विषय हैं।

सिवान जिले की  जदयू सांसद कविता सिंह व पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने पंचशील के सचिव कृष्ण कुमार सिंह के आवेदन के आलोक में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग से   अनुरोध किया है कि  उक्त तथ्यों के आलोक में जनआकांक्षाओं को देखते हुए  पुरातात्विक स्थल घोषित कर तथा प्राप्त पुरातात्विक अवशेषों के संरक्षण की दिशा में ठोस पहल कर इसका क्षैतिज उत्खनन कराया जाए, ताकि  सिवान का गौरवशाली सांस्कृतिक एवं पुरातात्विक इतिहास की वैज्ञानिक जानकारी मिल सके।

शोधार्थी कृष्ण कुमार सिंह ने बताया कि अगर पुरातत्व विभाग ईमानदारी पूर्वक इस स्थल पर काम करे तो दुनिया के सामने एक नवीन इतिहास का सृजन होगा । उन्होंने बताया कि दर्जनों इतिहासकारों ने इसे तीतिर स्तूप माना है, जिसका वर्णन ह्वेनसांग ने अपनी यात्रा वृत्तांत में किया है, जो भगवान बुद्ध के पूर्वजन्म का व मानव जीवन की घटनाओं से संबंध रखता है ।

शोधार्थी ने बताया कि इस स्थल की प्राचीनता व पुरातत्विक स्थल का वैज्ञानिक साक्ष्य तो भारतीय पुरातत्व विभाग अपने परीक्षण उत्खनन प्रतिवेदन में दे चुका है । उन्होंने बताया कि यहां के विशाल बौद्ध विहार  के अवशेष को ग्रामीणों व भारतीय रेलवे ने रेल पटरी के दोहरीकरण में ध्वस्त कर दिया, जो ईंटें बची थींं, उन्हें क्षेत्रीय लोग ले जाकर अपने घरों में लगा दिए। इस स्थल से वर्ष 2009 में रेलवे के ठीकेदार ने इतनी मिट्टी व ईंटें निकालीं कि अब यह छोटा तलाब का रूप ले लिया है। फिर भी इसकी नींव के चिन्ह व ईंटें आज भी विद्यमान हैं, पर अगर पुरातत्व विभाग ध्यान नहीं दिया तो  ऐतिहासिक, पुरातत्विक व धार्मिक महत्व का यह स्थल नष्ट हो जायेगा।

केंद्र व राज्य सरकार का विरासत बचाओ अभियान श्लोगन बनकर रह जायेगा। साथ  ही जो यहां देश विदेश के पर्यटक आते रहते हैं तथा बौद्ध अनुयायियों  के आस्था का स्थल विकसित नहीं हो पायेगा।

शोधार्थी ने बताया कि परीक्षण उत्खनन में जो छोटा शिलालेख मिला,  वह पानी में भी तैर रहा था। धरातल से 22 फीट नीचे मिला था, उस पर किसी लिपि में कुछ अक्षर अंकित है। उसे पढ़ दिया जाय तो इस स्थल की वास्तविकता समझ में आ जायेगी। पर दुःख इस बात का है कि अभी तक पुरातत्व विभाग इस लिपि को पढ़ नहीं पाया और न ही इसे इतिहासकारों के सामने ला रहा है ।

शोधार्थी ने बताया कि पुरातत्व विभाग  के  अधिकारियों के अनुसार इस स्थल पर 22 सौ वर्ष तक का मानव गतिविधि पाई गई तथा गुप्तकाल के बाद का कुछ अवशेष नहीं मिला। यह तथ्य  बौद्ध स्थल का पुख्ता प्रमाण है । क्योंकि बुद्ध के जीवन काल में यह मल्ल राजाओं का शालवन था तथा बुद्ध के महापरिनिर्माण के तीन सौ वर्ष बाद सम्राट अशोक ने यहांं मिट्टी का स्तूप बनवाया। तब से मानव गतिविधि आरम्भ हुई तथा गुप्तकाल के बाद यह स्थल वीरान हो गया । यानी पुरातत्व विभाग का कथन व इतिहास में दर्ज बातों में समानता है । शोधार्थी ने बताया कि यह ऐतिहासिक बहस का विषय है। इस पर चर्चा होनी चाहिए, ताकि इतिहास के वास्तविक निष्कर्ष पर पहुंचा जाय ।


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