July 16, 2024 |

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लोकसभा चुनाव-2024ः हिंदुत्व की आंधी में मुस्लिम समाज कहां खड़ा है?

Sachchi Baten

सबसे ज्यादा 49 मुस्लिम सांसद चुने गए थे 1980 में

 

मनोज तिवारी

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देश में मुस्लिम आबादी 10.5 प्रतिशत के करीब है। हर दल मुस्लिम समाज का अधिकतम वोट पाने के लिए हर क्षेत्र में प्रयास करते हैं। यहाँ तक कि बीजेपी भी वोट के लिए मुस्लिम समाज को अपनी तरफ करने के प्रयास में है। देश का मुस्लिम राज्यों के अनुसार अलग अलग पार्टियों को वोट करता है। बंगाल, असम, बिहार, ओडिसा, उत्तर प्रदेश, पूर्वोत्तर भारत, मध्यप्रदेश, राजस्थान, हरियाणा आदि प्रदेश का मुस्लिम समाज 2024 के लोकसभा चुनाव को लेकर अपना मन बना चुका है।

लोकसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो गई है। ज्यादा संभावना है कि मार्च के दूसरे हफ्ते में अधिसूचना जारी हो जाएगी। कब किस चुनाव में  मुस्लिम समाज से कितने सांसद लोकसभा पहुंचे, देश आजाद होने के बाद का संसदीय इतिहास को देखें तो पता चलता है मुस्लिमों की संसद में कितना प्रतिनिधित्व रहा। साल 1952 में 11 मुस्लिम सांसद लोकसभा पहुंचे थे। साल 1957 में 19, 1962 के लोकसभा चुनाव में 20 मुस्लिम सांसद पहुंचे। 1967 में 25 मुस्लिम सांसद चुनाव जीतकर संसद पहुंचे। 1971 में 28, सबसे ज्यादा मुस्लिम सांसद 1980 में पहुंचे थे, जिनकी संख्या 49 थी और 1984 में 42 मुस्लिम सांसद चुने गए थे। साल 2004 में 34, साल 2009 में 30 और 2014 में 22 मुस्लिम सांसद चुनाव जीत कर संसद पहुंचे थे। पिछले चुनाव 2019 में कुल 27 मुस्लिम समाज के सांसद लोकसभा में पहुंचे थे।.

2019 के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश से 6 मुस्लिम सांसदों ने जीत दर्ज की। 2014 के लोकसभा में उप्र से एक भी मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव नहीं जीत पाया था। 2019 लोकसभा चुनाव में सपा के आजम खान रामपुर से, बसपा के कुंवर दानिश अली अमरोहा से, बसपा से ही अफजाल अंसारी गाजीपुर से, सपा के डॉ. एसटी हसन मुरादाबाद से, बसपा के हाजी फजलुर्रहमान सहारनपुर से और बसपा के डॉ. शफीकुर्रहमान बर्क संभल से चुनाव जीते। इसके साथ ही पश्चिम बंगाल से चार, जम्मू-कश्मीर से तीन, केरल से तीन, बिहार से दो, असम से दो, तेलंगाना, महाराष्ट्र, पंजाब, लक्षद्वीप और तमिलनाडु से एक-एक मुस्लिम सांसद चुने गए हैं।

जीतने वाले अधिकतर उम्मीदवार विपक्षी दलों के हैं। पश्चिम बंगाल की बिष्णुपुर लोकसभा सीट से चुनाव जीतने वाले सौमित्र खान भाजपा के इकलौते मुस्लिम सांसद हैं। बंगाल में भाजपा ने 6 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे।

मुस्लिम समाज भारतीय समाज का एक अभिन्न हिस्सा है, जो गंगा जमुनी तहजीब की पहचान है। फिर भी मुख्य धारा में नहीं दिखाई देता है। आज़ादी कि लड़ाई हिन्दू मुस्लिम सबने मिलकर लड़ी। देश में राष्ट्रपति के पद पर भी मुस्लिम समाज के लोग पहुंचे। जज बने तो अधिकारी और नेता भी। देश के संविधान में धर्म, जाति, लिंग के आधार पर भेदभाव भी नकारा गया है।

कुछ लोगों की ओर से भड़काई गई मुस्लिम विरोधी भावना के कारण भाजपा के बाहर दूसरे दलों से नाम मात्र के ही मुस्लिम उम्मीदवार खड़े हो रहे हैं। दरअसल, “हिंदू विरोधी” का टैग लगने के डर से कांग्रेस और अन्य पार्टियां मुस्लिम उम्मीदवारों को बढ़ावा देने से बच रहीं हैं। इसके कारण आज मुस्लिम समाज की राजनीति हाशिये पर दिखाई देती है।

इधर देखा जा रहा है कि सीएए के नाम पर, कॉमन सिविल कोड के नाम पर, मंदिर मस्जिद विवाद के नाम पर मुस्लिम समाज को राजनीतिक मोहरा बनाया गया। मुस्लिम समाज को एक तरह से टारगेट किया जाता है। एक पार्टी के लोग खास तौर पर मुस्लिम समाज को लेकर आए दिन बयान देते रहते हैं।

लगभग हर दल अपने को मुस्लिम समाज का रहनुमा बताता है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी अपने को मुस्लिम समाज का पैरोकार बताती है तो कांग्रेस भी बताती है, बसपा मुस्लिम समाज से बड़ी संख्या में प्रत्याशी देकर दलित मुस्लिम समाज को एक करके सफलता पाना चाहती है।

भारतीय संविधान में धर्म निरपेक्षता का जिक्र है और धर्म निरपेक्षता का मतलब है कि राज्य धर्म से दूर रहेगा और सबको अपने धर्म को मानने कीआज़ादी होगी। राज्य का कोई धर्म नहीं होगा। पर, इधर कुछ वर्षों से धर्म की राजनीति ही अन्य मुद्दों पर भारी है और कट्टरवाद को बढ़ावा समाज में दिखाई दे रहा है।

एनडीए और इंडिया गठबंधन है। दूसरी तरफ बहुजन समाज पार्टी अलग से चुनाव लड़ रही है बिना किसी गठबंधन के। जिस तरह से उत्तर प्रदेश में इंडिया गठबंधन से मुस्लिम समाज जुड़ा हुआ है, वह यह भी देख रहा है कि पिछले लोकसभा चुनाव में सपा और बसपा गठबंधन भी बीजेपी को नहीं हरा पाया। विधानसभा चुनाव 2022 में मुस्लिम समाज ने एकतरफा वोट सपा को दिया, फिर भी बीजेपी नहीं हारी। बसपा के पास 17 फ़ीसद वोट बैंक है और मुस्लिम समाज का 18 प्रतिशत वोट बसपा के साथ आने पर 35 प्रतिशत का एक बड़ा वोट बनेगा। लेकिन ऐसा हो तब न। क्योंकि बसपा का जो मूल वोट बैंक 17 फीसद माना जाता है, दरअसल अब वह नहीं है। केंद्र की गरीब कल्याण योजनाओं ने उनके मन और मस्तिष्क पर कब्जा कर लिया है। वह नागरिक नहीं रह गए हैं। लाभार्थी बना दिए गए हैं। उनको डर है कि मोदी नहीं रहेंगे तो उनको मिलने वाले लाभ से वह वंचित हो जाएंगे।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

(लेखक प्रयागराज के वरिष्ठ पत्रकार हैं)


Sachchi Baten

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