July 23, 2024 |

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बिहार ब्रांड को स्वादिष्ट बनाती दुनिया भर में सफर कर रही है लीची

Sachchi Baten

सरकार की नजरें इनायत हों तो बिहार के छह जिलों के किसानों की जिंदगी में खुशियों की चासनी घोलने में सक्षम है लीची

रविशंकर उपाध्याय

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देश ही नहीं दुनिया में सबसे बढ़िया किस्म की लीची बिहार के मुजफ्फरपुर, पूर्वी चंपारण, वैशाली और समस्तीपुर आदि जिलों के बागानों की सौगात है। यूं तो यह उत्तराखंड के रामनगर, काशीपुर, देहरादून और पंजाब के उधमसिंह नगर व पठानकोट में भी उपजाई जाती है लेकिन बिहार की शाही लीची सबको खासतौर पर बेहद पसंद होती है। क्योंकि शाही लीची का कंटीला छिलका आसानी से उतारा जा सकता है, भीतर वाली गुठली भी बहुत पतली-नाम मात्र की ही होती है, जिस पर लिपटी होती है बड़ी सी गूदे व रस से भरी लीची।

सुगंध और मिठास के तो कहने ही क्या ! यही कारण है कि इसे विशिष्टता का ज्योग्राफिकल इंडिकेशन टैग यानी जीआई टैग भी 2018 में ही मिला हुआ है। इन दिनों यह शाही लीची ब्रांड बिहार को स्वादिष्ट बनाते हुए देश भर में सफर कर रही है।

लीची, इसे उपजाने वाले किसानों और व्यापारियों को समृद्ध करने में अपना भरपूर योगदान भी दे रही है। इस वर्ष तो किसानों को खेत में ही प्रति किलो 100 रुपये तक की कीमत मिल रही है, जो अब तक सर्वाधिक दर है।

दुनिया के विभिन्न देशों में शॉपिंग कांप्लेक्स संचालित करने वाले लुलु ग्रुप भी इस वर्ष यहां खरीदारी करने पहुंचा है और वह रोज खाड़ी देशों के साथ अन्य देशों के मॉल में पिछले 20-25 दिनों से 600 किलो औसत प्रतिदिन लगातार भेज रहा है।

इसके अलावा लीची स्क्वैश से लेकर अन्य पेय पदार्थ बनाने वाली कई मल्टीनेशनल कंपनियां भी लीची को अभी ही खरीद कर संरक्षित कर रही हैं, ताकि उसका साल भर इस्तेमाल किया जा सके। लीची के अंदर के दूधिया सफेद भाग में विटामिन-सी पाया जाता है। लीची में प्रचुर मात्रा में कैल्शियम के साथ-साथ प्रोटीन, खनिज पदार्थ, फास्फोरस आदि भी पाए जाते हैं। जिसकी वजह से इसका उपयोग स्क्वैश, कार्डियल, सिरप, रस, लीची नट्स इत्यादि बनाने में किया जाता है।

ऐसा माना जाता है कि पहले-पहल भारत में लीची चीन से आया था। छठी-सातवीं शताब्दी में मशहूर चीनी तीर्थयात्री ह्वेनसांग जब नालंदा विश्वविद्यालय अध्ययन के लिए पहुंचे थे तो उनके साथ लीची बिहार आया था। लीची का मौसम चेरी, शहतूत और जामुन की तरह बहुत छोटा होता है। यानी इसका आनंद आप बहुत दिनों तक नहीं ले सकते हैं। फलों की दुनिया में बहुत ही कम समय की उम्र रखने वाली लीची ने बिहार में पिछले साल तीन लाख मीट्रिक टन के उपज के लक्ष्य को प्राप्त किया था। इस बार प्रतिकूल मौसम के बावजूद उस लक्ष्य को प्राप्त करती दिखाई दे रही है.

बिहार लीची उत्पादक संघ के अध्यक्ष बच्चा प्रसाद कहते हैं कि क्लाइमेट चेंज ने दुश्वारियां लाई हैं, लेकिन सिंचाई की बेहतर व्यवस्था के कारण उत्पादन का आंकड़ा मौसम की समाप्ति तक पिछले साल के लक्ष्य को प्राप्त कर लेगा, ऐसी उम्मीद है। वे कहते हैं कि मई में औसतन तापमान 37-38 डिग्री सेल्सियस रहता था, लेकिन इस वर्ष तो 40-44 डिग्री सेल्सियस रह रहा है, इस कारण फसल की हालत खराब है और प्रोसेसिंग की चुनौतियों के कारण संरक्षण और मुश्किल होता जा रहा है।

संघ ने बिहार सरकार से अपील की है कि सरकार बड़े उद्योगपतियों को यहां बुलाकर निवेश कराए, प्रोसेसिंग प्लांट के साथ पैकेजिंग संस्थान के साथ संबद्ध होकर किसानों को इसका लाभ प्रदान करे तो इस लीची में वह ताकत है, जो उत्तर बिहार के छह जिलों के किसानों की जिंदगी में खुशियों की चासनी घोल देगी।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। वह हिंदुस्तान, प्रभात खबर में काम कर चुके हैं। बिहार के व्यंजन पुस्तक ने उनको काफी प्रसिद्धि दी है) 


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