July 16, 2024 |

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ओड़ी : सभ्य समाज की परम्पराओं की अगुवाई करने वाला गांव, जानें यहां की विभूतियों के बारे में…

सरदार पटेल के विचारों के प्रसार तथा बालिका शिक्षा की जरूरत को 50 साल पहले ही महसूस किया यहां के लोगों ने

Sachchi Baten

          ओड़ी : सभ्य समाज की परम्पराओं का अगुवा

जमालपुर, मिर्जापुर (सच्ची बातें Sachchi Baten)। गरई नदी का किनारा। ऊंची-ऊंची अट्टालिकाएं। साफ-सुथरी गलियां। सुंदरता व शिक्षा से संपन्न। संस्कारों से सरोकार। बीच गांव में बड़ा व भव्य तालाब। देश ही नहीं, विदेश तक पहुंच। चपरासी से लेकर क्लास वन तक के अफसर। चारो ओर पक्की सड़क। हरियाली भरपूर। उन्नत खेती। ये सारी खूबियां भारत के एक गांव में हैं। जो उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जनपद के जमालपुर ब्लॉक अंतर्गत आता है। नाम ओड़ी। यह गांव ब्लॉक मुख्यालय के करीब तीन किलोमीटर की दूरी पर है। इस गांव में वैसे तो कई जातियों के लोग हैं, लेकिन प्रमुख रूप से कुर्मी गांव के नाम से ही इसे जाना जाता है। यह गांव क्षेत्र में सभ्य परंपरा के मामले में अग्रणी है। यह कहा जाए कि यह गांव सभ्य समाज की अगुवाई करने वाला है तो कोई गलत नहीं होगा।

  •         ओड़ी गांव के बीच स्थित भव्य तालाब का सौंदर्यीकरण यहां के लाल स्वतंत्रदेव सिंह के प्रयास से हो रहा है

बात करें यहां के बुजुर्गों की तो करीब एक सौ तीस साल पहले रामसुमेर सिंह ने जन्म लिया था। इनके एक भाई और थे रामनाथ सिंह। रामसुमेर सिंह उस समय के ग्रेजुएट थे। बताते हैं कि रामसुमेर सिंह पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के सहपाठी थे। रामसुमेर सिंह बालिका शिक्षा के हिमायती उस समय थे, जब महिलाएं एक से डेढ़ फीट तक का घूंघट निकाल कर चलती थीं। किशोर लड़कियों को भी घर से निकलने पर पाबंदी थी। घरों की छतों की रेलिंग पांच फीट से ज्यादा ऊंची होती थी, ताकि कोई महिला छत पर किसी काम से जाए तो वह किसी से दिखे नहीं। शादियों में सिंदूरदान भी परदे में किया किया था। उन्होंने करीब 50-60 साल पहले ऐसे माहौल में गांव की बच्चियों की पढ़ाई-लिखाई के बारे में सोचा।  इसके लिए सबसे पहले जमीन की बात आई। रामसुमेर सिंह ने जब गांव के लोगों के साथ इसके बारे में बात की तो कई लोग जमीन देने के लिए राजी हो गए। इनकी सोच का सहर्ष स्वागत किया गया।

गांव के बीच में स्थित तालाब के पास ही विद्यालय और फील्ड के लिए रामसुमेर सिंह ने कुछ खुद और कुछ अन्य किसानों ने जमीन दान दी। रामसुमेर सिंह ने विद्यालय का खर्च चलाने के लिए गुप्तनाथ सिंह ने कई बीघा उपजाऊ खेत विद्यालय के नाम कर दिया। परिणाम, बच्चियों को हाई स्कूल तक की शिक्षा का इंतजाम हो गया। अब तो विद्यालय को सरकार से अनुदान भी मिल रहा है। रामसुमेर सिंह के तीन पुत्र हैं। गौतम सिंह, गोपाल सिंह और ध्वजा सिंह। गौतम सिंह जिला उद्योग अफसर थे।

गौतम सिंह के पुत्र शशांक सिंह हांगकांग में इंजीनियर हैं। प्रशांत सिंह अहमदाबाद में प्रोफेसर हैं। मृणांक वल्लभ सिंह अहमदाबाद आइआइएम से मैनेजमेंट करने के बाद हांगकांग में ही हैं। इनके ही परिवार में स्व. कैलाश सिंह एडवोकेट के लड़के भानुप्रताप सिंह ओमान में वैज्ञानिक थे। भानुप्रताप सिंह को दो लड़कों में डॉ. आनंद प्रताप सिंह कैंसर हॉस्पीटल लहरतारा बनारस में चिकित्सक हैं। इसी परिवार के डॉ. विजय प्रताप सिंह गोरखपुर में प्रोफेसर थे। इनके पुत्र डॉ. आलोक सिंह एसजीपीजीआइ में नेत्र विभाग में हैं।

  • ओड़ी की साफ-सुथरी गलियां         

इस गांव की सबसे बड़ी चीज यह है ईमानदारी। इसी गांव के श्रीकांत सिंह डाला सीमेंट फैक्ट्री का जीएम थे। उनकी किडनी खराब हो गयी थी। इनके इलाज के लिए सरकार राशि देना चाहती थी, लेकिन उस फाइल में हस्ताक्षर नहीं किया, जिसके माध्यम से उनको सरकारी मदद मिलनी थी। इसी गांव के स्व. प्रेम प्रकाश सिंह भाभा अनुसंधान संस्थान मुम्बई से किरणों पर शोध किया था।

वे इजराइल में नौकरी करते थे। अमेरिका के ग्रीन कार्ड होल्डर थे। बाद में स्वदेश लौटे और पुणे में रहने लगे, लेकिन 45 वर्ष की ही उम्र में उनका स्वर्गवास हो गया। स्व. प्रेम प्रकाश सिंह के पिता श्री भरत सिंह मनोरंजन कर उपायुक्त हुआ करते थे। इनकी गिनती कड़क व ईमानदार अफसरों में होती थी। भरत सिंह अभी हैं। इसी गांव के निवासी कृषि वैज्ञानिक प्रो. राणा प्रताप सिंह का एक बेटा कस्टम विभाग में इंस्पेक्टर हैं। दूसरा बेटा भी क्लास वन अधिकारी है। सिंचाई विभाग में इंजीनियर नरसिंह सिंह भी इसी गांव के थे।

इतना ही नहीं, इस गांव की लड़कियों ने सफलता की बुलंदियों को छुआ। डॉ. शशि सिंह इसी गांव की हैं। इसी गांव की लड़की सुषमा सिंह चंदौली जिले की पहली जिला पंचायत अध्यक्ष पद को सुशोभित किया। शिक्षक तो कई हैं। यहां की खासियत है कि लोग आपस में मिलजुल कर रहते हैं। इनके अलावा भी यहां की मिट्टी में कई विभूतियों ने जन्म लिया तथा देश-विदेश में यश हासिल की।

  • ओड़ी निवासी प्रदेश के सिंचाई व जलशक्ति मंत्री स्वतंत्रदेव सिंह   

इसी गांव के निवासी प्रदेश के कद्दावर नेता व यूपी के सिंचाई व जलशक्ति मंत्री स्वतंत्रदेव सिंह हैं। इनके पहले भी इसी गांव में जन्मीं तमाम विभूतियां राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी जन्मभूमि की मिट्टी को गौरवान्वित कर चुकी हैं।

इस गांव के निवासी डॉ. बलिराम सिंह भी थे। इनका निधन गत वर्ष हो गया था। इन्होंने अखिल भारतीय कुर्मी क्षत्रिय महासभा के अध्यक्ष पद को सुशोभित किया। इसके अलावा देश की आध्यात्मिक राजधानी बनारस के हृदयस्थल में सरदार पटेल स्मारक बनवाया। इसकी रजत जयंती पर तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह भी आए थे।

इसका विस्तार करते हुए डॉ. सिंह ने विंध्याचल में भव्य धर्मशाला का निर्माण कराया। इसकी खासियत यह है कि चंदा किसी कारपोरेट से नहीं लिया गया। अन्न उत्पादकों ने थोड़ा-थोड़ा योगदान करके काशी व विंध्याचल में सरदार पटेल के नाम पर धर्मशाला का निर्माण कराया तथा अखंड भारत के शिल्पी की प्रतिमा लगवाई। इसी गांव के कालिका सिंह व राधे सिंह भी थे। आसपास किसी भी गांव में कोई विवाद होता था तो पंचायत के लिए इन दोनों विभूतियों को बुलाया जाता था। कई वर्षों तक यहां के प्रधान रहने वाले बलदाऊ सिंह का अलग ही व्यक्तित्व था। कवि व शिक्षक वंशीधर पांडेय नाटक व कविताएं लिखते थे।

  • ओड़ी के ही निवासी डॉ. बलिराम सिंह ने अगुवाई की थी इस भव्य पटेल स्मारक के निर्माण की        

राष्ट्रीय एकता की पहचान वाला स्मारक मंदिरों के शहर में बनवाना उस समय आसान बात नहीं थी। करीब पचास साल पहले उनकी सोच क्या रही होगी, यह विचार करने वाली बात है। जिस संस्था के अध्यक्ष छत्रपति शाहुजी महाराज व सरदार पटेल के भाई विट्ठलभाई पटेल ने जिस पद को सुशोभित किया, वह कालांतर में डॉ. बलिराम सिंह को मिला, जो ओड़ी गांव के ही थे। डॉ. सिंह ने सिर्फ सरदार के नाम पर सिर्फ स्मारक नहीं बनवाए, उनके विचारों का भी समाज के बीच प्रचार-प्रसार किया।

  • बच्चियों को फिटनेस के गुर सिखाते केशव सिंह

इसी गांव के निवासी केशव सिंह फिजिकल फिटनेस के धनी व्यक्ति हैं। केशव सिंह 75 साल के हैं। स्पोर्ट्समैन हैं। वे इस उम्र में भी दौड़ के मामले में जवानों को पीछे छोड़ देते हैं। वरिष्ठ नागरिकों के लिए होने वाली खेलों में भाग लेने के लिए देश भर में ही नहीं, विदेशों में भी जाते हैं। और कोई न कोई मेडल लेकर ही आते हैं। पेंटिंग के मामले में भी केशव सिंह का जनपद में कोई सानी नहीं है।

यहां के लोग व्यापार में भी पीछे नहीं हैं। जय सिंह बेकरी का कारखाना इस गांव में है। होटल व्यवसाय में भी हैं। राजेंद्र सिंह का सीड प्लांट है। मछली पालन होता है। बागवानी के शौकीन यहां के लोग हैं। आसपास की अपेक्षा यहां के आम बड़े और स्वादिष्ट होते हैं। खेती भी यहां के किसान शिद्दत से करते हैं। इस गांव में जाने के बाद यहां के संस्कार और संपन्नता की झलक खुद-ब-खुद दिख जाती है।

सभ्य समाज की अगुवाई करने वाला इसलिए इस गांव को कहा जाता है कि यहां पर लड़कियों की शादी के लिए पहले जब बारात आती थी तो तीन समय का खाना व नाश्ता बरातियों को मुहैया कराया जाता था। इसके कारण जिसके घर बरात आती थी, वह परेशान हो जाता था। इस गांव के लोगों ने यह परम्परा शुरू की कि शादी के अगले दिन दोपहर का भोजन बरातियों को लड़की वाले के घर नहीं करना है। कुछ-कुछ बरातियों को गांव के लोग बांट लेते थे। और अपने-अपने घर उनके भोजन की व्यवस्था करते थे। यह परम्परा धीरे-धीरे इलाके के अन्य गांवों में ही फैल गई। अब तो एक ही टाइम की बरात ही होती है।

  •          क्रांतिवीर स्व. यदुनाथ सिंह के साथ बैठे नवल किशोर सिंह (फाइल फोटो)

राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के चेयरमैन रहे जस्टिस रामसूरत सिंह के प्रपौत्र नवल किशोर सिंह इस गांव में स्थित राजकीय बालिका उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के प्रबंधक हैं। उन्होंने कहा कि इस गांव की महानता है कि मुझ जैसे दूसरे गांव के निवासी को विद्यालय का प्रबंधक बनाया। यहां की परम्परा, शिक्षा, संपन्नता, संस्कार आदि काबिलेतारीफ है। दूसरे गांव में यहां का उदाहरण दिया जाता है। स्वतंत्रदेव सिंह पर यहां की मिट्टी का खासा असर है। क्योंकि व अपनी किशोरावस्था तक यहीं रहे। इस गांव का संस्कार ही तो है कि यहां से बुंदेलखंड में जाकर अपनी राजनैतिक तपस्या शुरू की और आज सफलता की सीढ़ियों को निरंतर चढ़ते जा रहे हैं।

प्रस्तुति – राजेश पटेल,  प्रधान संपादक sachchibaten.com

 


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