July 20, 2024 |

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लालबहादुर शास्त्रीः आपदा को अवसर में बदलने वाले पांच फीट के प्रधानमंत्री का इकबाल…

Sachchi Baten

रोने वाला नहीं था भारत माता का यह सपूत, न कभी सीने की माप बताई

 

कुमार दुर्गेश

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आपदा को अवसर में बदलने वाले लोग संघर्ष की धूप में तप कर निखरते हैं। उन्हें न तो आत्मप्रचार की जरूरत होती है और न ही छाती की माप बतानी पड़ती है। भूतपूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ऐसे ही शख्स थे, जिनके जैसा संघर्ष किसी भी प्रधानमंत्री को नहीं करना पड़ा है। शास्त्री जी ने निजी जिंदगी में कभी जिम्मेदारियों का त्याग नहीं किया और जब समय आया तो अमेरिका के राष्ट्रपति लिंडन जॉन्सन से लेकर पाकिस्तानी जनरल अयूब खान तक को ठेंगे पर रखा।

शास्त्री जी एक साल के थे तो पिता चल बसे, परवरिश के लिए नाना के यहां रहना पड़ा। मगर यह क्या चंद दिनों में ही विपत्ति ने नाना को भी छीन लिया। अब मंझले नाना पर जिम्मेदारी आ पड़ी। लेकिन नियति को यह भी गंवारा न हुआ। एक बरस होते-होते उनके दूसरे नाना दरबारी लाल भी स्वर्ग सिधार गए। अब मामा बिन्देश्वरी प्रसाद की देखरेख में शास्त्री जी बड़े हो रहे थे।

माध्यमिक शिक्षा के लिए आठ किलोमीटर पैदल जाना होता था। रास्ते में नदी पार करने के लिए नाविक को दो पैसे किराया लगता, मगर जेब में फूटी कौड़ी न होती। शास्त्री जी रोज तैरकर नदी पार कर काशी के हरिश्चन्द्र उच्च विद्यालय में पढ़ने के लिए पहुँचते थे।

एक दिन शिक्षक ने डांट लगाई कि किताब नहीं है.. कल से किताब के साथ ही आना। शास्त्री जी के पास पैसे नहीं थे। शास्त्री जी ने दोस्त से किताब मांगी और बिजली के खम्भा पर टंगे बल्ब की रोशनी में कापी पर ही किताब को हूबहू उतार डाला। अगले दिन टीचर ने जब शास्त्री जी की जिजीविषा के पन्नों को देखा तो रो पड़ा.. आशीर्वाद मिला कि एक दिन तू देश के लिए फख्र का कारण बनेगा।

शास्त्री जी ने कभी अपनी गरीबी, संघर्ष का रोना नहीं रोया। 1965 के युद्ध में लोगों से एक पहर भूखे रहने का आह्वान किया.. लोग भूखे रहने लगे। अमेरिका से पीएल 480 अनाज समझौते के तहत सुअरों के खाने के लायक लाल गेहूं का कड़वा स्वाद से लदे अमेरिकी जहाज भारतीय समुंद्री सीमा में आकर लौट गए। क्योंकि शास्त्री जी ने अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन जॉन्सन के दबाव में पाकिस्तान के विरुद्ध युद्ध में पीछे हटने से इनकार कर दिया।

पंडित नेहरू की मौत के बाद अकाल ग्रस्त, कंगाल भारत के प्रधानमंत्री बने लाल बहादुर शास्त्री ने हरित क्रांति का आह्वान किया। जय जवान- जय किसान का नारा दिया। स्वयं प्रधानमंत्री निवास में हल चलाकर खेती की। गेहूं की उन्नत नस्ल के बीजों को भारत में प्रयोग करने, गाँव-गाँव के खेतों तक बिजली के खम्भे पहुँचाने के लिए आह्वान किया। जिसका नतीजा यह हुआ कि भारत खाद्दान को लेकर आत्मनिर्भर बना।

आपदा को अवसर में बदलने की तस्वीर क्या होती है। यह जानने के लिए इन आंकड़ों पर गौर करे। 1964 में गेहूं का कुल उत्पादन 120 लाख टन था, शास्त्री जी के निर्णय लेने की क्षमता के कारण मैक्सिको से उन्नत नस्ल के गेहूं के बीज लाने के कारण 1970 में भारत का गेहूं उत्पादन 170 लाख टन हो चुका था। तमाम झंझावातों से तपकर आए त्याग और साहस से भरे भारत के इस लाल जैसा दूसरा कोई न हुआ, जिसने आपदा को अवसर में बदला हो।

आज के नेता महानायकों की सूची में जगह बनाने की तमन्ना लिए मरे जा रहे हैं। लेकिन इसमें छल-प्रपंच, आत्मप्रचार और धन के जोर से जगह नहीं मिलती है। न्याय, साहस, कुशल नीति, त्याग, तपस्या और जनोन्मुखी कर्तव्यनिष्ठ सियासतदां ही महानायक बनने के लिए माकूल होते हैं।

उन्हें न तो निजी जिंदगी की सादगी का प्रचार करना पड़ता है और न ही रूपमती का स्वांग करना पड़ता है। हीरो को पीढ़ियों बाद भी लोग पलट कर उसे तलाश करते हैं। खुद से अपनी छवि गढ़ने का प्रपंच हिटलर, पुतिन जैसे लोगों को करना पड़ता है.. जिनके लिए सेवा नहीं सत्ता प्राथमिकता होती है। इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों में नाम तो उनका लिखा जाता है, जिनके लिए सेवा प्राथमिकता होती है।

विरोधियों के प्रति निर्दयी, नीतियों के प्रति आत्मकेंद्रित शासकों को इतिहास में खलनायक के रूप में देखा जाता है। लाल बहादुर शास्त्री जैसी सदाशयता और साहस वाले अब लोग कहाँ.. जो आपदा को अवसर में बदल दें।

अब तो बचपन में मगरमच्छ पकड़ने, नाले से रसोई गैस निकालने, बादलों में रडार के काम नहीं करने के ज्ञान की शेखी बघारने वाले, निजी महत्वकांक्षा के लिए गृहत्याग करने वाले लफ्फाज हैं। जिसके अभिमान की चासनी में लिपटे हुए मूर्खतापूर्ण फैसलों और कारपोरेट की गुलामी के कारण देश में भयावह आर्थिक संकट आ पड़ा है। मजदूर-किसान, जवान और नौकरी पेशे वाले लोग उसकी प्राथमिकता नहीं हैं।

(लेखक सामाजिक चिंतक हैं)

 


Sachchi Baten

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