July 24, 2024 |

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कोतवाल धन सिंह गुर्जर का नारा थाः मरो या मारो-3

Sachchi Baten

1857 की पहली क्रांति

इतिहास लिखना होगा, नहीं तो पीढ़ियां भूल जाएंगी

मेरठ का वह कोतवाल जिसने अंग्रेजों की नींद हराम कर दी थी

साधू व कोतवाल धन सिंह गुर्जर ने छावनी में जाकर सैनिकों को अंग्रेजों से बगावत करने के लिए प्रेरित किया। साथ ही जेल में बंद कैदियों को कोतवाल ने अपने साथ क्रांति के लिए तैयार कर लिया। कोतवाल धन सिंह गुज्र ने अपने गांव को साथ साथ आसपास के सभी गांवों में गुप्तखाने यह संदेश भेजवा दिया कि अंग्रेजों के किलाफ दस मई की साम पांच बजे निर्णायक लड़ाई लड़ी जाएगी। सभी को मेरठ कोतवाली आना है।

हुआ भी यही। किसानों की घुटन ने लू में तपिश बढ़ा दी, सेनिकों के क्रोध ने दस मई की उस शाम को रौद्र रूप धारण कर लिया। जैसे मेरठ में गिरजाघर तथा घंटाघर के घंटे बजे, अंग्रेजों ने चर्च में जाकर प्रार्थना शुरू की, ठीक उसी समय मेरठ की कोतवाली में कोतवाल के नारे मारो या मरो के उद्घोष के साथ सदियों से गुलाम भारत की आजादी का विगुल बज उठा।

10 मई 1857 की क्रांतिकारी शाम

दस मई की वह सांझ कोई साधारण सांझ नहीं थी। बल्कि किसानों व सैनिकों की साझी सांझ थी, जिसमें वे अपने हक के लिए लड़ रहे थे। पराधीनता की रातों से लड़कर आने वाले कल की सुबह आजाद खुशहाल देखना चाहते थे।

यह शाम हिंदू व मुसलमान की साझी शाम थी, जब दोनों समुदायों ने कंधे से कंधा मिलातक इस जन क्रांति में बढ़-चढ़कर भाग लिया। कोतवाली में क्रांति की पहली चिनगारी फूटी। कोतवाल ने अपने सिपाहियों से क्रांति के लिए आह्वान किया। जो साथ नहीं आए, उनको अंदर जाकर चुप बैठने की हिदायत दी गई। बाकी को साथ लेकर मेरठ के कारागार में बंद कैदियों के क्रांति में शामिल होने की शर्त पर ताला तोड़कर 850 कैदियों को रिहा कर दिया। उनके बीच कोतवाली के हथियार बांट दिए। इस प्रकार कोतवाली से कोतवाल धन सिंह गुर्जर के नेतृत्व में यह टुकड़ी मुक्तिवाहिनी बन गई।

मेरठ कैंट में पहुंचकर वहां भारतीय सैनिकों ने जबरदस्त विरोध कर दिया। व मारो फिरंगियों को मारो गोरों को नारों के साथ अंग्रेज अधिकारियों को मारने लगे। उनके बच्चों व महिलाओं को सुरक्षित चर्चों में भी पहुंचा दिया। गांवों से किसानों ने कूच करना शुरू किया। ले लो ले लो जैसे जोशीले नारों से आकाश गूंज उठा। उसी दिन किसान, पुलिस सिपाही, बागी व सैनिकों का समूह जो मुक्तिवाहिनी का रूप ले चुका था, कोतवाल धन सिंह गुर्जर के नेतृत्व में दिल्ली की ओर कूच कर गया।…जारी

(‘1857 के क्रांतिनायक कोतवाल धन सिंह गुर्जर’ पुस्तक से।)

 

 


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