July 24, 2024 |

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जानिए रामानंद संप्रदाय के पीठाधीश्वर ने चंपत राय को लेकर क्या कहा…

Sachchi Baten

राम मंदिर निर्माण में चंदा लिया गया आसाराम बापू से भी – रामनरेशाचार्य

-रामानंद संप्रदाय के पीठाधीश्वर ने कहाः राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के महासचिव चंपत राय बांट रहे हिंदुओं को

-प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर मंदिरों का व्यवसायीकरण करने का आरोप

22 जनवरी को अयोध्या में बन रहे भव्य मंदिर में श्री राम लला की प्रतिमा में प्राण प्रतिष्ठा होनी है। इसको लेकर कुछ विवाद भी सामने आ रहे हैं। चारो शंकराचार्यों ने इस आयोजन में जाने से मना कर दिया है। फिर श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास के महासचिव चंपत राय ने बोल दिया कि यह मंदिर न शैवों का है, न शाक्त का और न संन्यासियों का। यह मंदिर रामानंद संप्रदाय का है। इस पर रामानंद संप्रदाय के पीठाधीश्वर स्वामी रामनरेशाचार्य जी का क्या कहना है। यह जानने के लिए https://sachchibaten.com/ के प्रधान संपादक राजेश पटेल ने वाराणसी के पंचगंगा घाट पर स्थित रामानंद संप्रदाय के मुख्यालय जाकर स्वामी रामनरेशाचार्य जी से विस्तार से बातचीत की। आप भी पढ़िए स्वामी जी ने क्या कहा…

सवाल- श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास के अध्यक्ष चंपत राय ने कहा है कि अयोध्या में श्री राम का मंदिर शैव, शाक्त व संन्यासियों का नहीं है। यह मंदिर रामानंद संप्रदाय का है। रामानंद संप्रदाय के प्रमुख के रूप में आपकी प्रतिक्रिया क्या है।

जवाब- चंपत राय ने बहुत गलत कहा है। भगवान की सेवा जरूर रामानंद संप्रदाय के लोग करते हैं, लेकिन यह मंदिर सबका है। राम किसी एक के नहीं हैं, राम सबके हैं। चंपत राय को इस तरह के बयान से बचना चाहिए। ईश्वर को इस तरह से बांटना नहीं चाहिए। यह नहीं कहना चाहिए कि यहां वे आ सकते हैं, वे नहीं आ सकते। चारो शंकराचार्य सनातन धर्म के मुख्य स्तंभ हैं। यह कहना कि रामानंद संप्रदाय का ही मंदिर है, यह अंग्रेजों वाली नीति हो गई कि डिवाइड एंड रूल। बांटो और राज करो। श्री राम ने बांटो और राज करो का काम किया होता तो रामराज नहीं आता। यह मंदिर किसी संत विशेष का है, यह नहीं कहना चाहिए। जो आए, उसे आने देना चाहिए। रामभक्तों का मुख्य तीर्थ है अयोध्या। रामानंद संप्रदाय के लोग मंदिर के मुख्य सेवक हैं।

सवाल- रामानंद संप्रदाय का मंदिर है। आप इस संप्रदाय के पीठाधीश्वर हैं। आपको प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में बुलाया गया है या नहीं।

जवाब- मुझे अधिकृत रूप से कोई बुलावा नहीं है। मैं जाऊंगा भी नहीं। प्राण प्रतिष्ठा के बाद किसी दिन जाकर अपने भगवान का दर्शन पूजन करूंगा।

सवाल- प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम को लेकर जो वितंडा खड़ा किया जा रहा है। आप इसे कैसे देखते हैं। क्या विशुद्ध रूप से यह धार्मिक आयोजन राजनीतिक बनता जा रहा है।

जवाब- बिल्कुल, यह कार्यक्रम पूरी तरह से राजनीतिक हो चुका है। संभवतः इसीलिए चारो शंकराचार्यों ने इस आयोजन में आने से मना कर दिया। मैं खुद नहीं जाऊंगा। राजनीति चमकाने के लिए धर्म का इस्तेमाल जिस तरह से बढ़ रहा है, वह काफी चिंतनीय है।

सवाल- मंदिरों के पुराने स्वरूप को तोड़कर उनका नवीनीकरण करने का काम इस समय की केंद्र व प्रदेश की सरकार कर रही है। जैसे बनारस में काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, विंध्यवासिनी कॉरिडोर। इसको लेकर आपका क्या मत है।

जवाब- मोदी सरकार मंदिरों का व्यवसायीकरण कर रही है। काशी विश्वनाथ मंदिर में अब आस्था के कारण कम लोग जाते हैं, घूमने वाले ज्यादा। मंदिर परिसर में दुकानें खुल गई हैं। आवास बना दिए गए हैं। आवासों में शौचालय होंगे। मंदिर की पवित्रता के हिसाब से यह गलत है। दर्शन का रेट तय कर दिया गया। पहले मैं खुद साल भर में एक बार विद्वानों के साथ काशी विश्वनाथ मंदिर जाकर रुद्राभिषेक करता था, लेकिन अब वहां जाने का मन ही नहीं करता। कुछ यही हाल अयोध्या का भी होगा। सुनने में आया है कि राम मंदिर निर्माण में आसाराम बापू से भी चंदा लिया गया है। यह तो बहुत गलत है। आसाराम ने ऐसा काम कर दिया कि संत समाज का सिर शर्म से झुका हुआ है। मन में ग्लानि हो रही है कि इस तरह के व्यक्ति को इतना सम्मान कैसे मिल गया। यह तो संत समाज केइतिहास में सबसे गंदा पृष्ठ जुड़ गया। ऐसे आदमी से धन लेना ही नहीं चाहिए। आसाराम बापू का नाम भी वहां नहीं लेना चाहिए। धन भी मन को बहुत प्रभावित करता है, जैसे अन्न। गलत आदमी से धन नहीं लेना चाहिए। इस तरह के और भी कई लोगों से धन लिया गया है। यहां लगता है कि धन ही प्राथमिकता है।

मोदी जी एक बार किसी जैन मंदिर में भी पहुंच कर बोले कि इसे सुंदर बनाना है। वहां के महात्माओं ने अनशन कर दिया। कहा कि मंदिर को छूने तक नहीं देंगे। इसमें एक जैन साधु की मौत भी हो गई थी। उनके हाथ जहां-जहां लगे, वहां-वहां धन को ही प्राथमिकता दी गई। यह गिरावट का लक्षण है। मोदी के राज में धनवानों को प्राथमिकता है। बिना पैसे लिए मंदिरों में प्रवेश नहीं मिल रहा है। यह गलत हो रहा है। इसकी चर्चा समाज के एक बड़े हिस्से में है।

सवाल- किसी भी व्यवस्था को चलाने के लिए धन तो चाहिए ही। चाहे वह मंदिर ही क्यों न हो।

जवाब- आप सही कह रहे हैं, लेकिन धन उतना ही चाहिए, जिससे काम चल जाए। हमारे मठ का कोई आदमी रसीद लेकर किसी के यहां कभी नहीं जाता। जाते तो जरूर धन मिलता, लेकिन मेरा मानना है कि जब किसी से मांगे बिना ही व्यवस्था अच्छी चल रही है तो मांगना क्यों। मेरे मठ द्वारा कहीं भी कोई धार्मिक आयोजन किया जाता है तो किसी से धन नहीं मांगा जाता। हां, जो देने की इच्छा जाहिर करता है, उसके बारे में रिपोर्ट ली जाती है कि उसकी कमाई कैसी है। संतुष्ट होने पर ही उससे दान लिया जाता है।

पूरा इंटरव्यू देखने के लिए यूट्यूब के इस लिंक को खोलें…

 

 


Sachchi Baten

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1 Comment
  1. dinesh says

    Bahut Achcha Laga

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