July 23, 2024 |

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जानिए दलित-शोषितों के लिए लड़ने वाले बाबू रामचरण लाल निषाद के बारे में…

Sachchi Baten

15 सितंबर को जयंती पर विशेष


 

संघर्षों की आग में तपकर निकला पिछड़ों व वंचितों का योद्धा

बाबू रामचरणलाल निषाद का जन्म मोहल्ला ग्वालटोली, खलासी लाइन, कानपुर में एक मजदूर बस्ती में सन् 1888 ई. के 15 सितम्बर को इनकी मौसी घर हुआ था। वह परिवार भी इतना गरीब था कि उन्होंने कर्ज लेकर राय राम चरण की माता “श्रीमती मूला देवी” के लिए पथ्य तथा दवाई का इन्तजाम किया था । इनके पूर्वज लखनऊ निवासी थे। इसलिए माता इनको लेकर अपने गाँव चली आयीं और रामचरण जी का बचपन गाँव में ही बीता था। वीरमाता इनको लेकर लखनऊ के बरवलिया में नदी किनारे एक झोपड़ी में रहने लगीं।

बालक की पढ़ाई में इनके पिता कोई सहायता करने लायक नहीं थे और न करते ही थे । 1895 ई. में जब बालक 7 वर्ष का हुआ, तब स्कूल में बिठा दिया गया। वीरमाता दूसरे घरों में चक्की पीसकर बालक को पढ़ाने लगी । बालक होनहार था और उसने म्युनिसिपल बोर्ड की लालटेन के नीचे पढ़-पढ़ कर मिडिल पास कर लिए। 1902 ई. में धनाभाव के कारण हजरतगंज रेलवे आडिट ऑफिस, लखनऊ में 12 रुपये मासिक पर नौकरी करने लगे।

एक दिन की बात है जब इनका अधिकारी इनसे कुछ पूछ-ताछ करने लगा, जिस पर हमारे चरित्र नायक उससे बहस करने लगे। अधिकारी नाराज होकर कहने लगा कि ‘नौकरी करना है तो करो, बहस करना है तो वकालत करो जाकर’ । इस बात से इनको बहुत चोट लगी और इन्होंने 1908 में नौकरी छोड़ दी तथा बच्चों को घर पर पढ़ाने लगे और आगे की पढ़ाई जारी कर दिया। इन्होंने शार्ट हैन्ड व टाइप राइटिंग की परीक्षा प्राइवेट क्रिश्चियन कालेज लखनऊ से पास कर लिया और प्राइवेट हाई स्कूल परीक्ष भी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर ली।

इनके नाना कन्हई मल्लाह ही जब तब इनकी मदद करते थे। 1912 में रामचरण ने बीए की परीक्षा पास कर ली और एल. एल. बी. की शिक्षा लेने इलाहाबाद चले गये, जहाँ पढ़ाई के साथ-साथ बच्चों को पढ़ा कर कुछ खर्चा माँ को भेजते थे तथा स्वयं एक समय खाकर गुजर करते थे। उन्होंने अन्त में एलएलबी परीक्षा 1914 ई. में पास कर ली। आप संस्कृत के भी अच्छे विद्वान हो गये थे और लखनऊ आकर वकालत करने लगे तथा शीघ्र ही अपनी मेहनत व योग्यता के बल पर चीफ कोर्ट ऑफ अवध के चोटी के वकीलों में शामिल हो गये। इसी समय लखनऊ के  बरौलिया, कुतुबपुर, गोवार का पुरवा, मुकारिमनगर तथा मार्टिनपुरवा आदि की सारी जमीन को नजूल घोषित कर सरकार ने अपनी करार देकर कार्रवाई शुरू कर दी।

यहाँ अधिकतर दलित पिछड़े वर्ग के निवासी थे, जो स्वयं सरकार से मुकदमा नहीं लड़ सकते थे। हमारे एडवोकेट साहेब अपना पैसा लगाकर मुकदमा लड़े और जीत गये, जिससे उन्तालीस मोहल्लों की जमीन अधिकतर वहीं के निवासियों की हो गयी। इसके बाद इन्होंने मस्ता चमार को एक सेठ की हत्या के झूठे मुकदमें से बचाया और एक पैसा उससे नहीं लिया था। हमारे चरित्र नायक गरीबों के मुकदमें हमेशा बिना फीस के करते थे।

देश में इस समय आर्य समाज तथा स्वराज्य पार्टी का जोर था । इन दोनों संगठनों में हमारे चरित्र नायक ने बड़ी लगन से कार्य किया था। कांग्रेस के अमृतसर के अधिवेशन में निषाद सभा की ओर से बाबू प्यारे लाल जी और महादेव लाल सदियापुर को भाग लेने 1920 में भेजा गया था।

किसान सभा की स्थापना जब पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने की थी, तब 1918 ई. में उन्होंने सारे दलितों को इसमें शामिल होने की अपील की थी। इन दोनों संगठनों में हमारे चरित्र नायक ने घोर जातिवाद का बोलबाला पाया । 1925 ई. में हमारे एडवोकेट साहेब की भेंट स्वामी बोधानन्द जी से हुई और वह इन संगठनों से अलग हो गये और वह इस निश्चित मत के हो गये कि सवर्ण हिन्दुओं द्वारा संचालित कोई भी दल शूद्रों का भला नहीं कर सकता; ‘दलितों को स्वयं ही गुलामी के विरुद्ध लड़ाई लड़नी पड़ेगी’।

इन आदि हिन्दू नेताओं ने सवर्णों के सुधारक नेताओं से साफ कहा कि पहले 99 प्रतिशत अपने अनुयायियों को ठीक करें, जिनमें अब भी बड़ी जाति में पैदा होने का अहंकार मौजूद है फिर इनके साथ दलित वर्ग कैसे सहयोग कर सकता है, विचार किया जाएगा। हमारे चरित्र नायक की खोज थी कि सदियों पहले किसान और जमीनदार जाति के आधार पर बनाये गये थे और किसानी और दूसरों की सेवा का कार्य शूद्रों को दिया गया था।

1925 ई. में आदि हिन्दू संगठन के जरिये इन्होंने समाज में सामाजिक एवं सांस्कृतिक क्रांति लाने की कोशिश की थी। दलितों में कार्य करने के लिये इन्होंने निषाद प्रिंटिंग प्रेस कायम किया तथा वहीं से आदि हिन्दू समाचार पत्रिका निकलती थी जिसके सम्पादक मंडल में सर्व श्री डा. आरएस जैसवारा,श्री एसडी चौरसिया एडवोकेट तथा जीएस राजपाल थे । आप शीघ्र ही 1926 में संयुक्त प्रान्त के विधान परिषद के सदस्य हो गये तथा कौंसिल के भीतर व बाहर दलित शोषितों के लिये लड़ते रहे। आदि हिन्दू सभा के आप शीघ्र ही संयुक्त प्रान्त के अध्यक्ष चुन लिये गए।

हमारे मेम्बर साहब शूद्रों और निषादों को एक ही मानते थे और इन सबको भारत के मूल निवासी समझते थे । अंग्रेजों के राज्य में भी उस समय शूद्र दीन हीन दशा को प्राप्त थे और उच्च वर्गों का बोलबाला था । इनकी लड़ाई थी कि तादाद के मुताबिक शूद्रों को सारे अधिकार दिये जायें।”

*लोथियन कमेटी/मताधिकार समिति के आने पर उत्तर प्रदेश के सात सदस्यों में आप भी एक सदस्य नियुक्त हुए थे । आप समस्त डिप्रेस्ड क्लास के समान अधिकार व वयस्क मताधिकार के पक्षधर थे, जबकि डॉ. अम्बेडकर सिर्फ़ अछूत पिछड़ो / अनटचेबल पिछड़ों के अधिकार, प्रतिनिधित्व व मताधिकार के हिमायती थे । अम्बेडकर कभी सम्पूर्ण पिछड़ों या पिछड़ी जातियों के हक अधिकार के पक्षधर नहीं रहे। सछूत शूद्रों के प्रति जैसी मनोवृत्ति सवर्णों की थी, वही मनोवृत्ति डाॅ.अम्बेडकर की भी थी।

जब साइमन कमीशन आया तो आप शोषितों के हितों के लिये उसके सामने 6 दिसम्बर 1928 ई. में गवाही देने गये थे । डिप्रेस्ड क्लासेज का जो प्रतिनिधि मंडल गवाही देने गया उसमें हमारे नायक मुख्य प्रवक्ता थे और उसमें बाबू खेमचन्द भू. पू.एमएलसी (सभापति अखिल भारतीय जाटव महासभा, आगरा), बाबू नानक चन्द धुसिया (सभापति आदि हिन्दू सभा यूपी), मुन्शी हरी टमटा (सदस्य म्युनिसिपल बोर्ड एवं जिला बोर्ड अलमोड़ा तथा चेयरमैन कुमाऊँ शिल्पकार सभा अलमोड़ा यूपी),भगत मुल्लू राम (सदस्य जिला बोर्ड फतेहपुर तथा प्रतिनिधि अखिल भारतीय आदि हिन्दू सभा कानपुर),बाबू शिवदयाल सिंह चौरसिया एडवोकेट लखनऊ, बाबू राम प्रसाद अहिर प्लीडर अवध कोर्ट, बाबू चेतराम(सदस्य म्युनिसिपल बोर्ड इलाहाबाद) तथा बाबू राजाराम (प्रतिनिधि कहार सुधारक महासभा कानपुर) शामिल थे।*

साइमन कमीशन के सामने इन्होंने इस पर जोर दिया कि शूद्र सारे पिछड़े दलित हैं और कमीशन के सदस्यों के पूछने पर निम्नलिखित तथ्य रखे जो सारे शूद्रों में तो पाई जाती हैं लेकिन सवर्ण हिन्दुओं में नहीं पाये जाते हैं –

1. बेवा की शादी शूद्रों में जायज रही है।
2. जो जनेऊ नहीं पहनते हैं (धार्मिक प्रथा से )।
3. पंचायत प्रथा।
4. कुल देवता की पूजा ।
5. फारखती जातीय पंचायत की राय से हो सकती है।
6. एक ही गोत्र में विवाह सम्बन्ध ।

इस प्रतिनिधि मण्डल ने सछूतों और अछूतों को अलग करने का विरोध किया था और बताया था कि शूद्र जातियों में
कहीं कोई अछूत है और कहीं कोई है। सवर्ण हिन्दओं ने सारे शूद्रों को दबाये रखा है और चुनावों में इनको जीतने नहीं दिया है। इन के नेताओं ने बताया था कि अब तक डिप्रेस्ड क्लास में सारे शूद्र समझे जाते हैं।

इन नेताओं ने माँग की थी कि सारे शूद्रों को पृथक मताधिकार दिया जाये और यदि पृथक मताधिकार अभी सम्भव नहीं है तो शूद्रों की सीटें धारा सभाओं आदि में सुरक्षित कर दी जायें। इन्होंने मनोनीत करने की जगह पृथक निर्वाचन की मांग की थी।

इस प्रतिनिधिमंडल का कहना था कि मनोनीत करने वाले अधिकारी भी जमींदार और महाजनों से प्रभावित होते हैं जो सही प्रतिनिधि मनोनीत नहीं करते हैं। इनकी राय थी कि सरकारी- ढाँचे में अब भी बड़े आदमियों का जोर है, लेकिन पिछड़े वर्ग के कुछ नेता ही इनका विरोध कर रहे थे जो नहीं चाहते थे कि उनको अछूतों के साथ रखा जाये तथा अछूतों के नेताओं ने भी पिछड़े वर्ग पर यह आरोप लगाया था कि यह भी सवर्णों की तरह उनसे छुआछूत करते हैं। सछूत व अछूत पिछड़ो या टचेबल व अनटचेबल डिप्रेस्ड क्लास में दूरी के कारण डॉ.अम्बेडकर ही थे, अन्यथा 1935 में शिक्षा व नौकरी तथा 1937 में राजनीतिक प्रतिनिधित्व का आरक्षण मिल गया होता।

1932, 1935 व 1937 में अम्बेडकर जी ने वहीं कार्य किया, जो सवर्ण व मनुवादी करते आ रहे थे। किसी न किसी दबाव में अम्बेडकर शूद्र वर्ग/डिप्रेस्ड क्लास का सछूत और अछूत शूद्र या टचेबल व अनटचेबल डिप्रेस्ड क्लासेज में विभाजन कर अछूत शूद्रों को नौकरी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए आरक्षण दिए।

हमारे चरित्रनायक बराबर इस मत के थे कि शूद्रों के दो टुकड़े नहीं हो सकते हैं और जो शूद्र जातियों में आपस में एक दूसरों को अपने से नीच समझने की भावना है वह सवर्ण हिन्दुओं की देन है। हमारे नेता का मत था कि शूद्र अलग-अलग उन्नति नहीं कर सकता है। लेकिन जब 1932 ई. में अछूतों के अधिकारों के संरक्षण की नीव पड़ गई । धारा सभाओं और लोकल बाडीज आदि में अछूतों की सीटें सुरक्षित कर दी गई थीं तथा डा.भीमराव अम्बेदकर जी ने जब अछूतों का एक अखिल भारतीय पैमाने पर संगठन स्थापित कर लिया जिसका नाम था “अखिल भारतीय डिप्रेस्ड क्लासेज फेडरेशन” और जिसके सभापति अम्बेडकर थे। तब हमारे चरित्रनायक ने भी अपने साथियों के साथ पिछड़े वर्ग का एक अलग संगठन बनाया था । इस संगठन का नाम “बैकवर्ड क्लासेज लीग” रखा गया था । इसके प्रथम सभापति हमारे चरित्रनायक चुने गये थे।

रामचरनलाल निषाद 80 फीसदी सछूत अछूत शूद्रों के सम्मिलित आन्दोलन के सदा पक्षपाती रहे। पाठक स्वयं जानते हैं कि (दक्षिण भारत के शूद्रों अनार्यों के संयुक्त आन्दोलन का ही फल है कि वहाँ 50-50 प्रतिशत तथा मैसूर में 75 प्रतिशत नौकरियां इन वर्गों के लिये सुरक्षित हैं तथा यहाँ अनार्य का आन्दोलन काफी हद तक सफल हो गया है और जो सवर्ण हिन्दुओं की अगुवाई में दल संरक्षण का विरोध करते थे, उन्हीं को मूल भारतवासियों ने विवश कर दिया है कि वह दक्षिण भारत भर में संरक्षण का समर्थन करें, लेकिन आज भी दक्षिण भारत छोड़ कर यही दल पिछड़े वर्ग के नौकरियों तक में संरक्षण के विरुद्ध हैं।

पिछड़े वर्ग को, हिन्द बैकवर्ड क्लासेज लीग के सभापति की हैसियत से हमारे नेता रामचरनलाल निषाद ने जो सन्देश जुलाई सन् 1936 ई. में दिया था, वह नीचे दिया जाता है-

इस बात को बहुत कम लोग जानते होंगे कि आगामी व्यवस्थापिका कौंसिलों में क्या-क्या नवीन बातें होंगी, कारण भी प्रत्यक्ष है । असलियत तो यह है कि हिन्दू पिछड़ी और दलित जातियों की ओर कोई ध्यान नहीं देता है, क्योंकि यह मालूम ही है कि जन-समुदाय के यह दोनों समुदाय शूद्र और अति शूद्र हैं । आप कहेंगे कि जिनको शूद्र और अति शूद्र कहते हैं उनमें से अधिकांश जातियाँ अपने को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य समझते हैं। यह सब ठीक है लेकिन प्रमाण तो वही सार्थक है जिसे द्विज लोग मान लें और उनके अनुसार इन जातियों से व्यवहार भी करें, परन्तु आप चाहे जितना खोजें कोई भी द्विज इन जातियों को व्यवहार में द्विज नहीं मानता है अथवा यों कहिये कि हमेशा से माने हुये ब्राह्मण न्यायी (नाई) ब्राह्मणों से रोटी बेटी का व्यवहार नहीं करेगा।

इसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्य को भी समझ लीजिये फिर इन प्रमाणों से इन जातियों को कोई लाभ नहीं होता है,बल्कि हानि ही होती है। यदि जनेऊ पहनते हैं तो वह भी प्रायः तोड़े जाते हैं। अलबत्ता नाम के आगे पुछल्ला लगा लीजिये और सरकार में लिखा भी दीजिये क्या होता है, हिन्दू द्विज आपको कदापि न मानेंगे। आप पूछ सकते हैं कि जब प्रमाण मिलते हैं तो हमको द्विज ही कहना चाहिये । मेरा उत्तर यह है कि मानिये लेकिन वह शक्ति भी तो ढूंढिये जिसके जरिये अपना द्विजत्व मनवा लीजिये, क्योंकि निर्बल को न्याय नहीं मिलता है । वह शक्ति क्या है? वह शक्ति है, राजनैतिक अधिकार। नई कौंसिलों में यह अधिकार मिलने का मौका है, यदि आप लेना चाहें। सरकार ने दलित या अछूत जाति को यह अधिकार दे दिये हैं। उनके प्रतिनिधि एक निश्चित संख्या में हर प्रान्त से कौंसिल असेम्बली में जायेंगे, परन्तु पिछड़ी जातियाँ नाई, बारी,  कहार, मल्लाह, कुम्हार, लुनिया, तेली, भर, बंजारा, जोगी, तम्बोली, सुनार, ठठेर, अहीर, कुर्मी, गड़रिया, मुराऊ, काछी, लोध, किसान,  माली, सैनी, कलवार, लोहार इत्यादि जातियों के लिये सरकार ने कोई सीट मुकर्रर नहीं की हैं।

ईश्वर जाने कि इनके प्रतिनिधि कैसे कौंसिलों में जायेंगे। आप कहेंगे कौंसिल में जाने से क्या लाभ है? सन 1937 ई. से जिन कौंसिलों का आरम्भ होगा, उनको पूर्ण अधिकार कानून बनाने का होगा। द्विज समुदाय अपने स्वत्वों की रक्षा अपने प्रति निधियों से करेंगे और दलित अछूत अपने स्वत्वों के लिये लड़ेंगे, लेकिन इन पिछड़े वर्ग के स्वत्वों की क्या गति होगी, अगर इनके प्रतिनिधि न पहुँचे । इसलिये प्रतिनिधियों का पहुँचाना एक मात्र उपाय है ।

अब प्रश्न है कि कैसे भेजें ? एक ओर धनी, चतुर प्रभावशाली द्विज मण्डल, दूसरी ओर धनहीन बिखरी हुई असंगठित जातियाँ जो हों, संगठन करना ही एक मात्र गति है । चुनाव में इन जातियों के वोट इतने अधिक होंगे कि चाहे तो कुल जनरल सीट ले लें और कहीं अछूतों से मित्रभाव पैदा करें और पारस्परिक सहायता करने को उद्यत हो जावें, तो कहना ही क्या है? भारतवर्ष में हिन्दू समुदाय के जन-संख्या में दो बटा तीन भाग से अधिक पिछड़ी और दलित जातियों का है और हमारे संयुक्त प्रान्त में तो इनकी संख्या 52 फीसदी सैकड़ा है और अछूत भाइयों को मिला कर 76 फीसदी सैकड़ा है।

इसलिये यदि आपको अपने ही देश में प्रतिष्ठा के साथ रहना है, यदि आपको अपने-अपने वैश्य, क्षत्रिय, ब्राह्मण होने के दावों को स्थापित करना है, तो घरेलू झगड़े को छोड़िये,जाति पाति के भेद-भाव को छोड़कर राजनैतिक क्षेत्र में शपथ ले लीजिये कि आगामी चुनावों में चाहे म्युनिसिपल बोर्ड के हों, चाहे डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के हों, चाहे प्रान्तीय असेम्बली के हों, चाहे कौंसिल के हों, चाहे फेडरल असेम्बली के हों, चाहे कौंसिल ऑफ स्टेट के हों, हम सिवाय पिछड़ी जाति के उम्मीदवार के और किसी को वोट न देंगे।

अछूत भाइयों से यह कहेंगे, कि आपके प्रतिनिधि तो नियत हो जायेंगे, लेकिन आपके सच्चे हितैषी प्रतिनिधि जो निडर होकर काम करेंगे, वह केवल पिछड़ी अथवा बैकवर्ड क्लास के वोटों की सहायता ही से भेजे जा सकते हैं। इसलिये आप अपना एक वोट अपने सच्चे उम्मीदवारों को दीजिये और दूसरा वोट पिछड़ी जातियों के उम्मीदवारों को दीजिये और उनका दूसरा वोट अपने उम्मीदवारों के लिये लीजिये।

इसी में दोनों समुदाय और देश का कल्याण है । स्वार्थान्ध द्विजाति भाई अभी इस बात को नहीं समझते हैं कि राष्ट्र के सब अंग पुष्ट होने पर राष्ट्र पुष्ट होगा। पिछड़ी और अछूत जातियों का सम्बन्ध भी घनिष्ठ है, दोनों ही समुदाय द्विजों के सताये हुये हैं, इस कारण भी इनका मेल उचित है।

जब पिछड़ी और अछूत जातियों के वोटर यह संकल्प करेंगे, तो बड़ी जाति वाले कहेंगे, कि भाई यह सब तोड़ फोड़ वाली बातें हैं। क्या बड़ी जाति के हिन्दू पिछड़ी जातियों का भला नहीं चाहते हैं तो आप उनसे पूछिये कि अगर आप पिछड़ी जातियों का भला चाहते हैं तो बताइये कि आपके प्रतिनिधियों ने पिछड़ी जातियों के लिये सीटें आरक्षित क्यों नहीं कराई ।

भंगी तक को तो आपने फेडरल असेम्बली का मेम्बर बनने की संभावना पक्की कर दी, लेकिन पिछड़ी जातियों के किसी आदमी को म्युनिसिपल बोर्ड तक पहुँचने की आशा न दिलवायी । वाह रे आपकी हितैषिता ! बस, यही काफी जवाब है।
1935 ई. के ऐक्ट के मुताविक जब आम चुनाव हुये तो हमारे चरित्रनायक पिछड़े वर्ग के वसूलों के प्रसार के लिये चुनाव लड़े थे लेकिन इनको हराया गया था। इस हार से व डाॅ.अम्बेडकर के व्यवहार से हमारे चरित्रनायक का मनोबल नहीं टूटा और यह दलित तथा पीड़ित समाज के लिये अन्त तक लड़ते रहे।

रामचरणलाल निषाद का कोई धनी व्यक्ति साथी न था, सब विरोधी थे और जिस कौम की यह वकालत करते थे वह भी अधिकतर निरीह और मूक थी । बचपन से ही हमारे नायक को कुछ सवर्ण हिन्दुओं द्वारा अपमानित किया गया था। जब यह पढ़ने जाते थे तब क्षेत्र के कुछ उच्च हिन्दू इनसे कहते थे- नाव चलाओ जा कर पढ़ कर क्या करोगे? यह 1907 ई. से ही निषादों व दलितों के बीच काम करने लगे थे।

आपने कुओं में अछूतों को पानी भरने के लिये लड़ाइयाँ लड़ी और इनके कार्य क्षेत्र में सवर्ण हिन्दू किसी भी कुआँ से पानी भरने से अछूतों को रोक नहीं सके थे। यह स्वयं उन मन्दिरों में नहीं जाते थे जिनमें अछूतों को जाना मना था। जब रैदास मन्दिर लखनऊ पर कुछ सवर्ण हिन्द नागाओं ने कब्जा करना चाहा तो यह पूरे दल के साथ वहाँ गये थे तथा नागाओं को मन्दिर से निकलवा दिया था। इनकी प्रतिभा का लोहा काफी सवर्ण हिन्दू भी मानते थे और यही कारण था कि जिस गाँव में आप चले जाते, वहाँ के जमींदार आदि घबरा जाते थे।

इनकी प्रतिभा का लोहा काफी सवर्ण हिन्दू भी मानते थे और यही कारण था कि जिस गाँव में आप चले जाते वहाँ के जमींदार आदि घबरा जाते थे और वहाँ के दलित जुल्म से छुटकारा पा जाते थे। आपको वीर बहादुर मूल भारतवासी बहुत प्यारे थे। जब कोई दलित अपने मान-सम्मान की रक्षा के लिये अत्याचारियों से लड़ते, उसकी सहायता करने यह दौड़ जाते थे।

लखनऊ तथा प्रान्त के कुछ जिलों में कुछ जमींदार होली में जबरदस्ती शूद्रों के गाँवों में जाकर उनकी महिलाओं पर रंग छोड़ते थे और उनका अपमान करते थे, ऐसे करीब-करीब हर गाँव में कुछ जमींदार होली में जबरदस्ती शूद्रों के गाँवों में जाकर उनकी महिलाओं पर रंग छोड़ते थे और उनका अपमान करते थे,इसका बाबू रामचरनलाल निषाद जी ने जमकर विरोध किया। आपका असामयिक निधन 7 जनवरी 1938 को 50 वर्ष ही उम्र में हो गया।

-लौटन राम निषाद


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