July 24, 2024 |

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काबिल-ए-गौरः भारतीय शिक्षा की यह दुर्दशा क्यों? पढ़िए विचारोत्तेजक निबंंध…

Sachchi Baten

The Plight of Indian Education System 

आजकल शैक्षणिक जगत में यह चर्चा है कि विश्व के सर्वोत्कृष्ट 200 विश्वविद्यालयों की सूची में एक भी भारतीय विश्वविद्यालय नहीं है। अर्थात भारत की उच्च शिक्षा यानि महाविद्यालयी एवं विश्वविद्यालयी शिक्षा भी गुणवत्तापूर्ण और उत्कृष्ट नहीं है। सामान्य शिक्षा की अवस्था तो सभी को ज्ञात है ही। तो आखिर उच्च शिक्षा के साथ ऐसा क्यों है? और यदि यह सही है, तो इसका समाधान क्या है?

अर्थात भारतीय विश्विविद्यालयों को उत्कृष्ट कैसे बनाया जाय? यह एक बहुत ही गंभीर एवं चिंतनीय विषय है। कैसे एक विश्व गुरु की यह दुर्दशा हो गई, हालाँकि यह प्रश्न अर्थात इस ‘कैसे’ का मूल्याङ्कन एक अलग विषय है, जो विषद भी है, गंभीर भी है, विचारोत्तेजक भी है, क्योंकि इसकी ऐतिहासिक शक्तियों और प्रक्रियाओं को समझना एवं जानना एक विस्तारित विषय है और इसीलिए इस विषय को कभी अलग से विश्लेषणात्मक मूल्याङ्कन करूंगा।

यदि विश्व के सभी देशों की शैक्षणिक स्थिति का तुलनात्मक अध्ययन किया जाय, तो इस स्पष्ट विभाजन का आधार भी सुस्पष्ट हो जाता है। इन सभी देशों को दो स्पष्ट अलग अलग वर्ग में रखा जा सकता है, जिसका आधार ‘सांस्कृतिक जड़ता’ (Cultural Inertia) और ‘सांस्कृतिक गतिशीलता’ (Cultural Dynamism) ही स्पष्ट होगा। अर्थात इन समाजों यानि इन राष्ट्रों यानि इन संस्कृतियों में या तो “सांस्कृतिक जड़ता” होगी, या “सांस्कृतिक गतिशीलता” होगी। “सांस्कृतिक जड़ता” का अर्थ है – तथाकथित महान सांस्कृतिक धरोहर एवं परम्परा के नाम पर आधुनिकता, वैज्ञानिकता, तार्किकता, मानवता, न्यायवादिता, समता (एवं समानता), स्वतन्त्रता, बंधुता का ही व्यवहारिक विरोध करना. लेकिन “सांस्कृतिक गतिशीलता” का अर्थ है –  सामाजिक गतिशीलता, तकनिकी विकास और बाजार की शक्तियों की अनिवार्यताओं एवं आवश्यकताओं के अनुरूप आधुनिकता, वैज्ञानिकता, तार्किकता, मानवता, न्यायवादिता, समता (एवं समानता), स्वतन्त्रता, बंधुता को वास्तविक समर्थन देना और उसे सशक्त करना होता है।

हमें इन पिछड़े हुए अविकसित एवं तथाकथित विकासशील देशों अर्थात समाजों यानि संस्कृतियों को दृष्टि में रखते हुए एक व्यापक विश्लेष्णात्मक एवं आलोचनात्मक मूल्याङ्कन (Analytical n Critical Evaluation) करने की आवश्यकता है, लेकिन भारत को मुख्य सन्दर्भ में रखना होगा। भारत के सम्बन्ध में इससे भी ज्यादा दुखदायी यह है कि भारतीय तथाकथित विद्वानों की इसके सम्बन्ध में जो सोच है, जो दृष्टि है, जो नजरिया है, और जो समझ है, वह मान्यतावादी ज्यादा है, एवं तर्कवादी कम हैं। ये भारतीय विद्वान् सरकारी महकमों में उच्चस्थ पदों पर विद्यमान हैं, या हाल तक नीति नियंता रहे हैं। ऐसे कई भारतीय विद्वान् भारतीय विश्विद्यालयों, सम्बन्धित प्राधिकरणों में और शैक्षणिक जगत के तथाकथित स्थापित शैक्षणिक सलाहकार या प्राधिकार हैं| ये लच्छेदार अंग्रेजी लिखते बोलते हैं, इनके बच्चे भारतीय विश्विद्यालयों में नहीं, अपितु विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़ते हैं, और इनके उच्चस्थ पद इनकी योग्यता की अपेक्षा इनकी ‘सामाजिक पूंजी’ (Social Capital) का सह उत्पाद (By Product) होता है। अर्थात इनमे इनकी पद के अनुरूप योग्यता का स्थान बहुत ही कम होता है, और इनकी मुख्य योग्यता इनका सामाजिक सम्बन्ध है, जिसका मुख्य आधार सांस्कृतिक साम्राज्यवादी ढांचे में ही निहित होता है। ऐसी स्थिति सिर्फ भारत में ही नहीं है, अपितु सभी पिछड़े हुए संस्कृतियों में होता है।

दरअसल यही लोग भारतीय सहित सभी पिछड़े हुए देशों की शैक्षणिक दुर्दशा के मूल एवं मुख्य कारण हैं, जिसको वो कभी रेखांकित करना नहीं चाहते हैं, और कभी ऐसा करना भी नहीं चाहेंगे। इन तथाकथित शैक्षणिक विद्वानों को कभी भी अपनी ‘सांस्कृतिक साम्राज्यवादी जड़ता’ (Inertia of Cultural Imperialism) का अहसास ही नहीं होता है। इनको ‘इतिहास’ (History), ‘दर्शन’ (Philosophy), एवं ‘मनोविज्ञान’ (Psychology) की व्यवहारिक समझ ही नहीं होता है, और इसीलिए ऐसा अधपका विद्वान कभी सम्यक नीति निर्माता हो ही नहीं सकता। इनको ‘इतिहास’ के बदलते स्वरुप की समझ ही नहीं होती, इनको बाजार को क्रियान्वित करने वाली शक्तियों की क्रियाविधि की कोई जानकारी नहीं होती, और इसीलिए इनको ऐतिहासिक शक्तियों की विश्लेष्णात्मक मूल्याङ्कन का नहीं तो महत्त्व पता होता है, और नहीं ही इसको समझने स्तर होता है. अर्थात इन्हें “इतिहास के दर्शन” (Historiography) का ही समझ नहीं होता|और इसीलिए इन्हें शैक्षणिक जगत की गत्यातमकता पर ‘सांस्कृतिक साम्राज्यवादी जडता’ का प्रभाव का समझ ही नहीं होता।

इन तथाकथित शैक्षणिक (भारतीय सहित) विद्वानों को कभी भी अपनी ‘सांस्कृतिक साम्राज्यवादी की जड़ता’ की समझ नहीं होती, और इसीलिए इनकी शैक्षणिक नीतियाँ इस सांस्कृतिक साम्राज्यवादी की जड़ता में जड़ (Fix) हो गया है, और इसे समझने में कतई समर्थ नहीं हो सकते। ये राजनीतिक साम्राज्यवाद, वणिक साम्राज्यवाद, औद्योगिक साम्राज्यवाद आदि को जानते समझते हैं, परन्तु उन्हें ‘वित्तीय साम्राज्यवाद’ (Financial Imperialism), ‘डाटा साम्राज्यवाद’ (Data Imperialism) और ‘सांस्कृतिक साम्राज्यवाद’ (Cultural Imperialism) की कोई समझ ही नहीं होती। और ये शैक्षणिक नीतियों के नियामक, संचालक बन कर (भारत सहित) इन देशों यानि इन संस्कृतियों के भविष्य को गढ़ने वाले बने हुए हैं, और यही (भारत सहित) इनका दुर्भाग्य है।

मैंने देखा है कि भारतीय शैक्षणिक विद्वान् अपनी बातों में ‘Academic Excellence’ (अकादमिक उत्कृष्टता), ‘Industry Partnership’ (वाणिज्यिक सहभागिता), ‘Digital Technological Support’ (डिजीटल तकनिकी समर्थन), ‘Strong Financial Support’ (मजबूत वित्तीय समर्थन) एवं ‘Robust Services Support’ (जबरदस्त सेवा सहयोग) के अभाव का रोना रोते रहते हैं। ऐसा करते हुए वे अपनी शैक्षणिक मौलिक एवं मुलभुत समझ के अभाव और दूरदृष्टि के अभाव को ढके रहेंगे, लेकिन मूल और मौलिक समस्या की जड़ों पर जाने से बचें रहेंगे। ये ‘Interactive Digital Learning PlatformContribution of less percentage of GDPSocial Impact InitiativeDiverse Inclusive Campusआदि आदि आकर्षक, आधुनिक, तकनीकी एवं नवोन्मेषी (Innovative) शब्दों का उल्लेख अपनी बातों में अवश्य करेंगे, जिसे वे विदेशी अंग्रेजी अखबारों में पढ़ लेते हैं। इससे वे अपने को ज्ञानी होने का आभास देते हैं, लेकिन वे चिन्तन विहीन रट्टू तोता होते हैं। इन्हें अपनी सांस्कृतिक जड़ता की समझ की जिक्र करने की जरुरत नहीं है, ऐसा यह अज्ञानतावश करते हैं, या जान बूझकर करते हैं, ताकि इन्हें अपनी ‘परंपरागत संस्कृति जड़ता’ का लाभांश (Dividend) मिलता रहे।  चूँकि ये अपने ‘सामाजिक पूँजी’ के बदौलत शैक्षणिक नीति नियामक बने रहते हैं, इसीलिए इनमे योग्यता की सापेक्षिक कमी होती है। चूँकि इनमे (भारतीय सहित) अन्य देशों में यानि इन्हें अपनी संस्कृतियों एवं पारिस्थितिक परिस्थियों के अनुरूप चिंतन सामर्थ्य नहीं होता, इसीलिए इन्हें अपनी बातों में आकर्षक एवं आदर्शात्मक शब्दावली को अनावश्यक रूप से रखते हैं।

यदि आप विश्व के सर्वोत्कृष्ट विश्विविद्यालयों की सूची का अवलोकन करेंगे, तो एक ही बात सबमें सामान्य (Common) यानि सबमे शामिल है, और वह यह है कि इन सभी विकसित राष्ट्रों यानी समाजों की संस्कृति आधुनिक, वैज्ञानिक, तार्किक, न्यायिक एवं मानवतावादी है। इन समाजों की संस्कृति में ढोंग, पाखण्ड, अंधविश्वास और अनावश्यक कर्मकांड का सर्वथा अभाव रहता है| इन देशों में यानि इन समाजों में वैज्ञानिक मानसिकता (Scientific Temper) होती है, ‘आस्था’ (Devotion) के स्थान पर ‘प्रश्नों’ (शंकाओं) को सम्मान मिलता है, व्यक्ति एवं समाज के अस्तित्व का संतुलन होता है, तार्किकता (Logic) एवं विवेकशीलता (Rationality) होती है,  स्वतन्त्रता एवं समता तथा समानता (Equality n Equity) होती है, और राजनेताओं एवं नीति नियामकों की ‘बातों’, ‘विचारों’, ‘भावनाओं’, एवं ‘व्यवहारों’ में “अखंडता’ (Integrity) अवश्य रहती है। अर्थात पिछड़े देशों यानि संस्कृतियों में इन सभी मूल और मौलिक तत्वों की स्थिति उलटा होती है। अत: स्पष्ट है कि शासन का ईश्वर के किसी स्वरुप में आस्था नहीं होता, आत्मा एवं पुनर्जन्म और कर्मवाद के अवैज्ञानिक अमानवीय सिद्धांतों को कोई मान्यता नहीं होता। इन्ही बातों का ध्यान शिक्षा के मूल में होना अनिवार्य है, जिसे पिछड़े हुए देश नहीं अपनाते हैं। अर्थात शिक्षा में आलोचनात्मक चिंतन और विश्लेषण होगा, प्रश्न पूछने एवं शंकाओं को सम्मान मिलेगा, वैज्ञानिकता से किसी की भी परम्परागत भावनाओं को खंडित किया जा सकता है, तर्कवादिता के साथ साथ विवेकशीलता महत्वपूर्ण होता है।

लेकिन भारत सहित सभी पिछड़े हुए देशों यानि संस्कृतियों में इन अवैज्ञानिक एवं अमानवीय सिद्धांतों को सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मान्यता प्राप्त है, जो स्वयं मध्ययुगीन उत्पत्ति है। इनके पुरातनता का यानी प्राचीन काल के होने का कोई पुरातत्विक प्रमाण या प्राथमिक प्रमाणिक प्रमाण नहीं है| यह सांस्कृतिक साम्राज्यवाद एक वैश्विक घटना थी, जो वैश्विक सामंतवाद का क्षेत्रीय सांस्कृतिक उत्पाद था। इस सांस्कृतिक साम्राज्यवाद को यूरोप ने पुनर्जागरण आन्दोलन के द्वारा और रूस एवं चीन ने अपनी सांस्कृतिक बदलाव (क्रांति) के द्वारा समाप्त कर दिया। लेकिन इस मध्यवर्ती सांस्कृतिक साम्राज्यवाद को सभी पिछड़े हुए देशों में ‘सांस्कृतिक आवरण’ (Cultural Veil) में सुरक्षित रखते हुए आधुनिकता लाने का महज तमाशा किया जाता है। इस पर खुले दिमाग से औए राष्ट्र हित में एक व्यापक विमर्श की आवश्यकता है, यदि वास्तव में भारत को फिर से वैश्विक गुरु बनाना है।

याद रहे कि आप भारत के सन्दर्भ में सही और सम्यक साबित हो सकते हैं, लेकिन वैश्विक परिदृश्य में आप अलग थलग नहीं रह सकते हैं। इस ‘वैश्विक गाँव’ (Global Village) में कोई भी एक देश आज उस ‘वैश्विक गाँव’ का एकमात्र टोला (Tola) बन कर रह गया है| हमलोग अवैज्ञानिक, अतार्किक, अविवेकी और अलोकतांत्रिक मानवता विरोधी सांस्कृतिक यथास्थितिवाद को मजबूत रखते हुए आज वैश्विक सन्दर्भ में पिछड़ते जा रहे हैं। आज भारत विश्व के सबसे बड़ी आबादी होने के कारण विश्व का सबसे बड़ा बाजार है, और भारत की आबादी के खाने और इसे पचा लेने की क्षमता के कारण को अपनी वैश्विक पूछ के कारण का कोई अन्य अर्थ मत निकाले।

शिक्षा ही शांति, समृद्धि, विकास आदि का सबसे महत्वपूर्ण साधन है, प्रक्रिया है, क्रियाविधि है, और इसीलिए शिक्षा को उत्कृष्ट, सान्दर्भिक, वैज्ञानिक, तर्कशील एवं विवेकशील होना चाहिए एवं बदलती आवश्यकता के कदम से कदम मिलाता हुआ होना चाहिए| उत्कृष्ट शिक्षा ही ईश्वर, आत्मा, पुनर्जन्म और कर्मवाद के ढोंग, पाखंड, अंधविश्वास एवं अनावश्यक कर्मकांड को खंडित करते हुए उत्कृष्टता पर छा गए धुन्ध को मिटा सकता है और इस तरह विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी को मौलिक और मूलभूत आधार दे सकता है। शिक्षा में अनिवार्य रुप से सांस्कृतिक जड़ता दूर कर सांस्कृतिक गतिशीलता लानी ही होगी। इन सभी पर ठहर कर और गंभीर होकर आप भी विचार करें| इस आलेख को एक से अधिक बार पढ़ा जाय।

-आचार्य निरंजन सिन्हा   (सिन्हा जी के अन्य आलेख https://niranjan2020.blogspot.com/ पर भी पढ़ सकते हैं। 


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