July 23, 2024 |

BREAKING NEWS

- Advertisement -

सामाजिक न्याय समिति की रिपोर्ट लागू करना भाजपा के लिए सांप-छछूंदर की स्थिति जैसी

Sachchi Baten

 

बिहार के जातिगत आंकड़े आने के बाद भाजपा ओबीसी बंटवारा करने पर कर रही विचार

लखनऊ (सच्ची बातें)। सामाजिक न्याय समिति का गठन 2001 में तत्कालीन मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह ने हुकुम सिंह की अध्यक्षता में किया था। समिति ने अन्य पिछड़े वर्ग की मूल 79 जातियों को 3 श्रेणियों में विभाजित करने की सिफारिश की थी। इसे लागू करने में भारतीय जनता पार्टी की स्थिति सांप-छंछूदर जैसी हो गई है।

इस समिति ने पिछड़ा वर्ग में अहीर/यादव को 5 प्रतिशत, अति पिछड़ा वर्ग में कुर्मी, लोधी, कम्बोज, सोनार, कलवार, गोसाई,
जाट, गुर्जर को 9 प्रतिशत और मल्लाह, केवट, बिन्द, कहार, पाल, लोहार बढ़ई, बियार, कुम्हार, नाई, बारी, तेली, किसान, राजभर, नोनिया, मोमिन अंसारी, कसाई, फकीर, कुजड़ा, बंजारा, नायक, धीवर, मनिहार, माहीगिर हजाम आदि 70 सर्वाधिक पिछड़ी जातियों को 14 आरक्षण कोटा की सिफारिश की थी।

राजनाथ सिंह की सरकार ने सामाजिक न्याय समिति की सिफारिश को लागू करने की अधिसूचना जारी की, जिसे उन्हीं के मंत्रिमंडल के अशोक यादव ने विरोध करते हुए उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर दी।उच्च न्यायालय ने अधिसूचना पर स्थगन आदेश दे दिया। उत्तर प्रदेश सरकार ने उच्चतम न्यायालय में अपील दायरकी, जिसे उच्चतम न्यायालय ने खारिज कर दिया।

अगर पिछड़ा वर्ग में अहीर के साथ 1-2 और जातियों को रखा गया होता तो न्यायिक रोक नहीं लगी होती। 2002 में सत्ता परिवर्तन हुआ और मायावती मुख्यमंत्री बनीं। भाजपा को विधान सभा चुनाव में 88 सीटों पर संतोष करना पड़ा। 2003 में परोक्ष रूप से भाजपा की मदद से बसपा में तोड़ फोड़ कर सपा द्वारा सरकार बना ली गई। तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने ओबीसी के बँटवारे की माँग को बेअसर करने के लिए 17 अतिपिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने के लिए केन्द्र सरकार को 5 मार्च 2004 को सिफारिश पत्र भेजा। उस समय राष्ट्रीय निषाद संघ कर्पूरी ठाकुर आरक्षण फ़ार्मूला लागू करने या क्षेत्रीयता समाप्त कर निषाद, मल्लाह, केवट, बिन्द,धीवर,मांझी, राजभर, नोनिया, बियार आदि को अनुसूचित जाति का आरक्षण देने की माँग को लेकर आंदोलन चला रहा था।

इस वर्गाँष गांधी जयन्ती के अवसर पर बिहार सरकार द्वारा जातिगत आँकड़ों की घोषणा के बाद पूरे देश की राजनीति में एक नई हलचल शुरू हो गयी है। बैकपुट पर आयी भाजपा नफा-नुकसान के मंथन में जुटी हुई है। डैमेज कंट्रोल के लिए भाजपा गहन मंथन कर रही है। भाजपा को फर्श से अर्श पर पहुँचाने में गैर यादव पिछड़ी जातियों की अहम भूमिका रही है, सो आगामी लोकसभा में पिछड़ों को साथ बनाए रखने के लिए नई रणनीतियों पर विचार कर रही है। पार्टी सूत्रों की माने तो बिहार सरकार द्वारा जनगणना रिपोर्ट उजागर करने के बाद भाजपा के सामने दिक्कत खङी हुई है। ऐसे में उत्तर प्रदेश सरकार जस्टिस राघवेन्द्र कुमार समिति और केंद्र सरकार जस्टिस रोहिणी आयोग की सिफ़ारिश लागू करने का मन बना रही है।

सामाजिक न्याय समिति के गठन के पीछे कारण
17 जनवरी,2001 को राष्ट्रीय निषाद संघ और निषादवंशीय अधिकारी/कर्मचारी परिषद का एक प्रतिनिधिमंडल पंचम तल पर मुख्यमंत्री राजननाथ सिंह से मिला और पश्चिम बंगाल, दिल्ली, उड़ीसा की तरह उत्तर प्रदेश के मल्लाह, केवट, बिन्द,कहार, धीवर, मांझी को एससी आरक्षण दिलाने की अपील की। साथ कुछ लोगों ने सर्वाधिक पिछड़ा वर्ग आयोग 1974-75 की रिपोर्ट को मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह के सामने रख दिया, मुख्यमंत्री ने इसी आधार पर समिति गठित करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की और कुछ दिनों बाद सामाजिक न्याय समिति-2001 का गठन कर दिया।

यूपी के तत्कालीन सीएम राजनाथ सिंह ने वर्ष 2002 में पिछड़ों के आरक्षण में बंटवारे की योजना बनायी थी। उस समय बीजेपी सरकार की मंशा थी कि जिन पिछड़ी जाति के लोगों को आरक्षण का अधिक लाभ मिला है, उन्हें अब कम प्रतिशत दिया जाए। लाभ से वंचित अन्य जातियों को आरक्षण का अधिक लाभ मिले। इससे पिछड़े वर्ग की सभी जातियों को आरक्षण का पूरा लाभ मिलेगा। बीजेपी सरकार जाने के बाद यूपी में सपा व बसपा का शासन था। इसलिए उस रिपोर्ट पर कभी चर्चा ही नहीं हुई। सीएम योगी आदित्यनाथ सरकार ने पिछड़ों में आरक्षण की स्थिति का पता लगाने के लिए समाजिक न्याय समिति का गठन किया था। जिसकी रिपोर्ट मिल चुकी है और लोकसभा चुनाव से पहले इसे लागू भी किया जा सकता है। क्योंकि इंडिया गठबंधन बनने के बाद भाजपा परेशान दिख रही है और वोटों को सहेजने की कवायद में जुटी हुई है।

यादव व कुर्मी जाति के लोगों को उठाना होगा नुकसान
समिति की रिपोर्ट के अनुसार पिछड़ों के आरक्षण का सबसे अधिक लाभ यादव व कुर्मी जाति के लोग ही उठाते आ रहे हैं। जस्टिस राघवेंद्र कुमार समिति के अनुसार समूह- क की नौकरी में कुर्मी पहले, यादव दूसरे और मौर्य कुशवाहा तीसरे नंबर पर हैं। दो तिहाई नौकरियों में इन्हीं जातियों का दबदबा है। भाजपा के सामने साँप-छछूंदर वाली स्थिति बन गयी है।उसे डर है कि कहीं उसका कोर वोटबैंक कुर्मी, जाट नाराज होकर कहीं भाजपा से दूर न चल जाए। भाजपा रणनीतिकार नफा नुकसान के मंथन में जुटे हुए हैं।

समिति ने यादव, कुर्मी, चौरसिया व पटेल जाति के लोगों को 27 प्रतिशत में से 7 प्रतिशत आरक्षण देने की वकालत की है। इन जातियों को पिछड़ा वर्ग में रखा गया है। यदि ऐसा होता है तो इन जातियों को 27 की जगह अब 7 प्रतिशत ही आरक्षण मिलेगा।

अति पिछड़ा वर्ग की जातियों को 11 प्रतिशत आरक्षण देने की वकालत
रिपोर्ट में अति पिछड़ी जातियों को 11 प्रतिशत आरक्षण देने की वकालत की गयी है। इन जातियों मेे गुर्जर, लोध, कुशवाहा, शाक्य, तेली, साहू, सैनी, माली,पाल, सोनार, कलवार,गिरि, नाई आदि शामिल हैं।

27 प्रतिशत आरक्षण को तीन भागों में बाँटा गया। सामाजिक न्याय समिति ने पिछड़ों को 79 उपजातियों में वर्गीकरण कर यूपी सरकार को 2019 में रिपोर्ट सौंप दी थी। लोकसभा चुनाव 2024 में इंडिया को झटका देने के लिए यूपी सरकार इस रिपोर्ट को लागू करने पर मंथन कर रही है। रिपोर्ट के लागू होते ही सियासी तूफान आना तय है। चुनाव की सारी रणनीति बदल जायेगी और जाति कार्ड की सीटों का परिणाम तय करेगा।

सर्वाधिक पिछड़ी जातियों को 9 प्रतिशत कोटा की सिफारिश
सर्वाधिक पिछड़े वर्ग में चिन्हित जातियों को जस्टिस राघवेंद्र कुमार समिति ने सिफारिश किया है।इसमें मल्लाह, केवट, बिन्द,बियार,राजभर, बंजारा, किसान, नोनिया, धीवर, कहार, बारी, रंगरेज, मोमिन अंसार,कानू, माहिगिर,हज़ाम,मुस्लिम धोबी, मोची, कसाई, कुजड़ा, जुलाहा, गद्दी आदि शामिल हैं।

राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (एनसीबीसी) ने 27% आरक्षण के लिए केंद्रीय सूची में यूपी की 76 जातियों (156 उपनामों का उपयोग करके) को सूचीबद्ध किया है। 1980 में प्रस्तुत और 1994 में लागू की गई मंडल आयोग की रिपोर्ट में कहा गया कि ओबीसी भारत की आबादी का 52% थे। हालाँकि, अक्टूबर 2006 में जारी राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) के 61वें दौर की रिपोर्ट में इसे 41% बताया गया है। य़ह हिन्दू पिछड़ी जातियों की संख्या है। मण्डल कमीशन के अनुसार 52.10 प्रतिशत ओबीसी में 43.70 प्रतिशत हिन्दू और 8.40 मुस्लिम जातियों की संख्या थी।
यूपी में, 2001 में तत्कालीन मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह द्वारा गठित एक सामाजिक न्याय समिति ने अनुमान लगाया था कि ओबीसी 43.13% (ग्रामीण क्षेत्रों में 54.05%) हैं। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि ओबीसी में यादव 19.4%, कुर्मी 7.46%, काछी-कुशवाहा-शाक्य-मौर्य-सैनी-माली 6.69%, लोध 4.9%, जाट (जो यूपी में ओबीसी हैं) 3.6%, केवट (निषाद) 4.33% हैं। गडरिया-पाल-बघेल 4.43%, कहार-कश्यप 3.31%, और भर-राजभर 2.44%।
1931 के बाद से कोई जाति जनगणना नहीं हुई है, इसलिए ये संख्याएँ केवल अनुमान हैं। राजनीतिक दल अपने जमीनी कार्यकर्ताओं से सीटों के हिसाब से जातियों की जानकारी जुटाते हैं।

अक्टूबर 1975 में छेदीलाल साथी की अध्यक्षता में यूपी में पिछड़े वर्गों के लिए गठित एक आयोग ने ओबीसी के लिए 29.50% आरक्षण की सिफारिश की, जिसमें से 17% सबसे पिछड़े समुदायों को दिए जाने की सिफारिश की थी।

राम नरेश यादव की जनता पार्टी सरकार ने 1977 में यूपी में ओबीसी के लिए सरकारी नौकरियों में 15% आरक्षण लागू किया। 1994 में मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली सपा-बसपा सरकार ने इसे बढ़ाकर 27% कर दिया।

जून 2001 में राजनाथ सरकार द्वारा गठित सामाजिक न्याय समिति ने अगस्त में अपनी रिपोर्ट सौंपी। इसका उद्देश्य यादवों को अन्य ओबीसी जातियों से और जाटवों को अन्य एससी जातियों से अलग करना देखा गया। हुकुम सिंह की अध्यक्षता वाली एक समिति ने सिफारिश की कि अनुसूचित जाति के लिए 21% कोटा में 10% जाटव और शेष 65 एससी जातियों को 11% के बीच विभाजित किया जाना चाहिए। 27% ओबीसी कोटा में, यादवों का हिस्सा 5% रखे जाने की सिफारिश की। 9% आठ अन्य जातियों को दिया जाए, और बाकी 70 अन्य जातियों को 14% दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इस योजना को रद्द कर दिया और 2002 के चुनाव में बीजेपी विधानसभा की 403 सीटों में से 88 सीटों पर सीमित हो गयी।
शीतकालीन सत्र में रखी जा सकती है रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश विधानसभा के शीतकालीन सत्र में सामाजिक न्याय समिति की रिपोर्ट को रखा जा सकता है। जस्टिस राघवेन्द्र कमेटी ने गहन अध्ययन के बाद अपनी रिपोर्ट बनायी है। सीएम योगी आदित्यनाथ सरकार इस रिपोर्ट पर क्या निर्णय करती है यह तो समय ही बतायेगा। इतना तो साफ है कि रिपोर्ट को लागू कर दिया जायेगा तो राहुल गांधी, मायावती व अखिलेश यादव के महागठबंधन के वोटरों को तोड़ऩे में बीजेपी को सहुलियत हो सकती है।

जनसंख्या अनुपात में आरक्षण के बिना ओबीसी का उप वर्गीकरण न्यायोचित नहीं
भारतीय ओबीसी महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता लौटन राम निषाद ने कहा कि भाजपा ओबीसी की जातियों का वर्गीकरण के नाम पर इन्हें आपस में लड़ाने के षडयंत्र में जुटी हुई है। इंडिया गठबंधन से 2024 में हार को देखते हुए परेशान है। उन्होंने कहा कि जब तक ओबीसी को जनसंख्या अनुपात में आरक्षण कोटा बढ़ाया नहीं जाता, ओबीसी का 3 या 4 श्रेणियों में बँटवारा न्यायोचित नहीं है। लोकसभा चुनाव से पूर्व भाजपा एवं आरएसएस ओबीसी जातियों के बीच नफ़रत फैलाने के लिए कवायद में जुटी हुई है।उन्होंने कहा कि जब एससी और एसटी उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण कोटा दिया गया है तो 54 प्रतिशत से अधिक ओबीसी को मात्र 27 प्रतिशत कोटा दिया जाना कहाँ तक उचित है?उन्होंने कहा कि चुनावी लाभ के लिए भाजपा जातीय नफ़रत फैलाना चाहती है।उसका मकसद अतिपिछड़ी और अत्यन्त पिछड़ी जातियों को न्याय देना नहीं बल्कि अतिपिछड़ी जातियों का झूठा हमदर्द बनकर वोट की राजनीति करना चाहती है।

निषाद ने बताया कि 2 अक्तूबर 2017 में जस्टिस रोहिणी की अध्यक्षता में राष्ट्रीय ओबीसी उप वर्गीकरण जाँच आयोग का गठन किया गया।जिसका समय समय पर चुनावी लाभ के लिए 6-6 महीने का कार्यकाल बढ़ाया जाता रहा। 14 वें विस्तार के बाद 31 अगस्त को जस्टिस रोहिणी ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी हैं। जस्टिस रोहिणी आयोग ने ओबीसी को 4 उप वर्गों में बाँटने की सिफारिश की है। भाजपा सरकार ओबीसी का उप वर्गीकरण करने की बात तो कर रही है, पर जातिगत जनगणना कराने से सीधे तौर पर मना कर दी। जबकि हर दशक में केन्द्र सरकार को जातिगत जनगणना करानी चाहिए, इसका उल्लेख संविधान की 7 वीं अनुसूची के अनुच्छेद 246 में स्पष्ट उल्लेख है। अनुच्छेद 15(4), 16 (4), 16 (4-1) के अनुसार सभी वर्गों को समुचित प्रतिनिधित्व दिए जाने का स्पष्ट तौर पर उल्लेख है।

कई संगठन उप वर्गीकरण की करते रहे हैं माँग
राष्ट्रीय निषाद संघ के अतिरिक्त राष्ट्रीय उदय पार्टी के अध्यक्ष बाबूराम पाल, जनवादी पार्टी (सोशलिस्ट) के अध्यक्ष डॉ. संजय सिंह चौहान, सामाजिक महा परिवर्तन गठबंधन के संयोजक रामेश्वर ठाकुर और अति पिछड़ा महासभा के अध्यक्ष श्रीकांत पाल आदि अतिपिछड़ी जातियों को अलग से कोटा की माँग करते रहे हैं।


Sachchi Baten

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

Leave A Reply

Your email address will not be published.